अपनी पीड़ा को शांति से सह लेना और दूसरों को पीड़ा न पहुँचाना ही तपस्या का स्वरूप है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो विनय से सहित है, गुण शील से युक्त है तथा जिनका चित्त तप में संलग्न है वे मनुष्य निःसन्देह स्वर्गगामी होते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पंचमकाल के मुनि की एक वर्ष की तपस्या और चतुर्थकाल के मुनि की एक हजार वर्ष की तपस्या बराबर होती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो चार ज्ञान से युक्त हैं देवार्चित हैं, निश्चित ही मुक्ति के स्वामी हैं, ऐसे तीर्थंकर भी जब तप करते हैं तब अन्य लोगों को भी तप करना ही चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिन्होंने काम भोगों से वैराग्य धारण कर तप और चारित्र की सिद्धि के लिए शरीर को कृश किया है उन्होंने इस शरीर को सफल किया है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हे मित्र! मुक्ति रूपी लक्ष्मी के चित्त को प्रसन्न करने वाली जिनदीक्षा को धारण कर यौवन में समीचीन कठोर तप को करो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पूजा-दान, तप, धर्म, ज्ञान, चारित्र आदि का पालन युवावस्था में भलीभाँति हो सकता है वृद्धावस्था में नहीं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
तप धर्म आदिक में सम्यग्ज्ञान के अध्यापन दान-पूजा और सद्गुरुओं की सेवा में कभी संतोष नहीं करना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
शरीर दुर्बल होने पर भी जो बुद्धिमान मनुष्य अपने आत्मबल को प्रकट कर तप करते हैं, वे उत्तम पुरुष प्रशंसनीय हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो हिंसादि घर व्यापार को छोड़कर एक भी उपवास करता हैं वह शुद्ध बुद्धि वाला पुरुष चिरकाल के संचित पापों को नष्ट करता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
तपस्वी जितने बड़े कष्टों को सहता है, उसके उतने ही अधिक आत्मिक भाव निर्मल होते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सुखिया स्वभावी को विद्या कहाँ से मिल सकती है और विद्यार्थी को सुख कहाँ से मिल सकता है, सुखिया स्वभावी विद्या को छोड़ देता है और विद्यार्थी सुख छोड़ देता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
ज्ञान और धन पुरूषार्थ पर निर्भर है, जैसे खोदने से पानी निकलता है वैसे ही रटने से विद्या आती है व पुरुषार्थ से धन आता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
दुधारु गाय भी बिना दुहे दूध नहीं देती, इसी प्रकार आत्मा में ज्ञान है किन्तु बिना अभ्यास के अपना ज्ञान प्रकट नहीं होता। पुरुषार्थ 0 – भेजें
ज्ञान की जड़ कड़वी होती है पर ज्ञान का फल मीठा होता है, अत: ज्ञान प्राप्त करते समय कष्ट होता है प्राप्त हो जाने पर सुख होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
चिकित्सक बनने वाले को पढ़ाई के लिये चौबीस घण्टे कम पढ़ते हैं, तब कुशल चिकित्सक बनता है उसी प्रकार दस मिनिट स्वध्याय करने वाले कुशल आत्मज्ञ कैसे बन सकते हैं? पुरुषार्थ 0 – भेजें
मोहल्ले वाले बहकाते हैं पर पुरुषार्थ से लड़की की शादी होकर रहती है, उसी प्रकार आत्महित में विघ्न आते हैं लेकिन पुरुषार्थ से कार्य सिद्धि होकर रहती है, अत: दूसरे से राग-द्वेष नहीं करना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
मूर्ख बेटे से पिता ने बार-बार कहा कि तू व्यापार नहीं कर सकता, न मजदूरी न भीख माँग सकता है, अत: वेद पढ़ेविना तेरा जीवन बेकार है, वह घर से भागा गङ्गा किनारे जाकर बैठ गया, बोला हे गङ्गा मैया जब तक मैं विद्वान नहीं बन जाऊँगा तब तक आहार जल का त्याग है, कई दिन हो गये, इन्द्र का आसन कम्पायमान हुआ, इन्द्र ने अप्सराओं को भेजा, अप्सराएं विप्र का वेश बनाकर मुट्ठी में रेत भरकर गङ्गा में फेंकने लगी, लड़के ने देखा पूछा ये क्या कर रही हो? अप्सराओं ने कहा हमें गङ्गा पार जाना है इसलिये पुल बना रहे हैं, उसने कहा ऐसे पुल नहीं बनता तो अप्सराओं ने कहा उसी प्रकार कोई भोजन छोड़कर विद्वान नहीं बनता अक्षर-अक्षर रटता पढ़ता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अजगर करे न चाकरी,पञ्छी करे न काम। दास मलूका कह गए सब के दाता राम।। ऐसा मानकर आलसी बने रहना अच्छा नहीं है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
तपस्वी साधु के इच्छित कार्य को सिद्ध करने वाली जो शक्ति, कान्ति, द्युति और धृति होती है, वह इन्द्र के भी नहीं होती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
तीनों लोकों में ऐसा कोई भी न हुआ, न है, और न होगा, जिसके कार्य में विघ्न न आये हों और कार्य निर्विघ्न हुआ हो क्योंकि भाग्य पुरुषार्थ की परीक्षा किया ही करता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिन्दगी की दौड़ में वो लोग पीछे रह गये, जो कभी दौड़े ही नहीं, 'दौड़ेंगे' कहते-कहते रह गये। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अन्धकार को कोसने से अन्धकार नहीं मिटता किन्तु एक छोटा सा दीपक जला देने से अन्धकार मिट जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हाथ की रेखाएं टेडी हैं तो निराश मत होइए, अपने नजरिये को बेहतर बनाइए हस्त रेखाएं स्वतः अनुकूल हो जायेंगी। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सफल व्यक्ति कोई महान काम नहीं करते किन्तु वे छोटे-छोटे कामों को भी महान ढंग से करते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आप अपने भाग्य के निर्माता हैं- जीवन के प्रति स्वयं को जिम्मेदार समझना चाहिए, क्योंकि विचार, शब्द और कार्य ही आपके भविष्य के आधार हैं, जीवन के प्रति आपका सही दृष्टिकोण मुख्य परिवर्तन ला सकता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
महापुरुषों की कार्यसिद्धि धैर्यगुण (पुरुषार्थ) में निवास करती है, केवल उपकरण या साधन-सामग्री में नहीं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हीन भाव से दूर रहें जो काम दूसरे लोग कर सकते हैं वह आप भी कर सकते हैं बस सोई हुयी शक्तियों को जगाना है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सदैव आशावादी बनिए- आप किसी कार्य को करने में चाहे कितनी बार असफल हो चुके हैं, आपके द्वारा किया गया छोटे से छोटा प्रयत्न व्यर्थ नहीं जाता है, हमेशा परमात्मा का स्मरण कीजिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
टालने की आदत से बचें- सफल व्यक्ति वें होते हैं, जो अपनी कुर्सी से उठ कर तत्काल कार्य करते हैं, किसी चीज को शुरू करने का सही समय बस यही है, कल पर नहीं टालिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पहल आपको ही करना होगी- सजग नागरिक होने के नाते अन्याय, अव्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाना अधिकार भी है, और कर्तव्य भी है, संसार को बदलने के लिए स्वयं को बदलिए, उसका प्रभाव निश्चित ही दूसरों पर पड़ता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
भविष्य जानने के उत्सुक न हो- क्योंकि पूरा भाग्य निश्चित नहीं, आप अच्छे प्रयत्न से भाग्य बदल सकते हैं, जीवन जीने का सही तरीका अपनी जीवन यात्रा में जो कुछ सामने आये उसका सकारात्मक मन और साहस से सामना कीजिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
निरन्तर विकास करिये- मूल लक्ष्य शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास करना होना चाहिए, क्योंकि वही सदैव साथ रहने वाली वस्तुएं हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
छः अवसरों में साहस- पद से गिर जाने पर, बीमारी में, नुकसान में, यात्रा में, निःसन्तान होने पर, व्रतों में परेशानी आने पर साहस रखना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आदर्शवादी के तनाव से बचिए- गलतियों से शिक्षा लेते हुये हम निरन्तर अपना ज्ञान बढ़ाकर और अभ्यास करके अपनी अपूर्णता को कम कर सकते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आकांक्षा लेखन- अपने ध्येय को लिखें, सन्त, पण्डित या वक्ता जो भी बनना चाहते हैं उसे अनेक स्थानों पर लिखें। पुरुषार्थ 0 – भेजें
निर्णय शुभ घड़ी का- हजारों मील लम्बी यात्रा का शुभारम्भ मात्र एक कदम से होता है, अतः शुभ घड़ी में सोच विचार कर कार्य प्रारम्भ कर देना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
एक समय में मात्र एक ही उद्देश्य 'श्रेष्ठ ध्येय' आपको निर्धारित करना है, और जुट जाना है, पूरी शक्ति से उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, फिर आपका ध्येय निश्चित ही आपके जेब में होगा। पुरुषार्थ 0 – भेजें
खोजिये अपनी महान कमजोरी- अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को ढूँढकर और उसमें अपेक्षित सुधारकर व्यक्ति उस स्थान पर खड़ा हो सकता है, जहाँ की एक गञ्जे व्यक्ति को भी कङ्घी खरीदने के लिए मजबूर कर सकता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कीजिए विकास सर्वाधिक अपेक्षित गुण का- वक्ता बनने के लिए दर्पण में देखकर पहले एकान्त में अभ्यास करें। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अपनी कमियों का केवल प्रलाप ही न करते रहें, इस प्रलाप को त्याग कर नई वैकल्पिक दिशा खोजने के प्रयास में जुट जाइये। पुरुषार्थ 0 – भेजें
रुचि के चयनित क्षेत्र में प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य कीजिए, पत्रिकाएँ पढ़िए, व्यवहारिक प्रयोग कीजिये, जो आपके लिए तो लाभप्रद हो, साथ ही आपके समाज एवं राष्ट्र के गौरव में भी अपना कुछ योग दान दे सकें, तभी आप सिर ऊँचा उठाकर गर्व की अनुभूति कर सकेंगे। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आत्म विश्वास हो आपकी नींव- आत्म विश्वास वह सञ्जीवनी बूटी है, जो व्यक्ति के घोर तम निराशा जन्य, मरणासन्न हृदय में भी नवीन जीवन सञ्चार करने की क्षमता रखती है, आत्म विश्वास ही आपकी वह नींव है जिसका सम्बल पाकर आप विश्व विजय जैसा अति महत्त्वाकाङ्क्षी स्वप्न देखने का भी साहस कर सकते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अधिकांश सफल व्यक्तियों ने जो भी कार्य प्रारम्भ किया, इस दृढ़ विचार से प्रारम्भ किया कि असफलता शब्द उनके लिए बना ही नहीं। आत्मविश्वास ही सफलता की प्राप्ति का महामन्त्र है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अपनी कमजोरियों की कभी भी अन्य व्यक्ति के शक्तिशाली बिन्दुओं से तुलना न करें, बल्कि आप ही श्रेष्ठ हैं, यह धारणा अपने मन में अमिट बनाइए। अपनी कमियों एवं अक्षमताओं को अधिक महत्त्व न दीजिए, बल्कि उनमें गुणात्मक सुधार करने का प्रयास जारी रखिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आप सफल तभी बनते हैं जब आप भी उस सङ्गठन का एक हिस्सा बन जाते हैं, उसके कार्यों में बढ़कर हाथ बँटाते हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि आप मात्र हाथ बाँधे ही न खड़े रहें और अन्य लोग सङ्गठन के कार्यों को करते हुए वहाँ उपस्थित जनसमुदाय के आकर्षण का केन्द्र बन जायें। उन कार्यों को करने का अनुभव अर्जित कीजिए, यही अनुभव आपकी सफलता को शीघ्रता प्रदान करता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जहाँ चाह वहाँ राह- एक बार में मात्र एक ही कार्य करें और उसकी सफलता के लिए पूरी लगन, सम्पूर्ण साधन और सम्पूर्ण शक्ति लगा दें। आकांक्षा पूर्ति में सर्वाधिक सहायक साहित्य का अध्ययन करें। जो भी पढ़ें पूरे मनोयोग से धीरे-धीरे बड़े ही मनन पूर्वक और प्रत्येक वाक्य को आत्मसात करते हुए पढ़िए एवं उद्देश्य पूर्ण रुचि अपनाइए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अद्वितीय प्रतिभा आपकी- साहसी व्यक्ति अकेला ही आगे बढ़ने का साहस करते हुए महासाहसी बन अद्वितीय सफलता अर्जित करता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो भी सीखें उसका अभ्यास अवश्य करें, अभ्यास ही व्यक्ति को परिपूर्ण बनाता है, 'करत-करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान'। पुरुषार्थ 0 – भेजें
रखिए सुनिश्चित ध्येय- आपका उत्तम व्यवहार सौभाग्य को आकर्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जो अकेले चलते हैं वे तेजी से आगे बढ़ते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
उत्कृष्ट आकाङ्क्षा- सफलता प्राप्ति के लिए दृढ़ विश्वास रखिए, लाभ में अधिक लालच कष्टों को आमन्त्रित करता है, यह कहावत सत्य है और दुर्भाग्य की पोषक है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कैसा भी छोटा मौका मिले उसे हाथ से न जाने दें, बढ़ना ही चाहते हो तो नीचे से प्रारम्भ करो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
क्षणिक या अल्प कालीन उपलब्धियाँ केवल अल्पकालीन प्रसन्नता ही प्रदान करती हैं, साहस में ही लक्ष्मी निवास करती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सर्वश्रेष्ठ को ही लक्ष्य बनाकर चलें, प्रत्येक दिन अपना कार्य पहले दिन से कुछ अच्छा करने का प्रयत्न करें। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आँसू न बहाइये दुर्भाग्य पर- चींटियाँ कभी आँसू नहीं बहातीं, बल्कि पुरुषार्थ करके सफलता प्राप्त करती हैं, तराजू के एक पलड़े पर अरबों चींटियां दूसरी ओर मनुष्य, अर्थात् मनुष्य में अरबों चींटियों से ज्यादा बल है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पुरुषार्थ, साहस, धैर्य, आत्मबल, बुद्धि और शारीरिक बल, ये छह जिसके पास हैं देव भी उसके आज्ञाकारी होते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें