मनुष्य पर्याय को धर्मरूपी भूमि में बोना आम चूसकर गुठली खेत में गाड़ देने जैसा है और मनुष्य पर्याय को भोगों में खोना गुठली सेक कर खा लेने जैसा है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिन्हें मोक्ष की उत्कृष्ट भावना है वे द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव का विचार कर उग्रकाय क्लेश तप करें। पुरुषार्थ 0 – भेजें
रोटी के दोनों पहलू अच्छी तरह सिक जाते हैं तब वह सिकी कहलाती है, उसीप्रकार जो दोनों तप को तपता है वही तपस्वी कहलाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
व्यक्ति साधना के बारे में बहुत सोचता है, वासना के बारे में विना सोचे पुरूषार्थ करता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
संसारी व्यक्ति ज्योतिष के चक्कर में पढ़ता है, आध्यात्मिक व्यक्ति मन की गति पकड़ता है, हस्त रेखाएं नहीं भुजाएँ देखो 'अर्थात् पुरुषार्थ करो'। पुरुषार्थ 0 – भेजें
अमीर बनने के लिए पाँच साल की साधना चाहिए, विद्वान् बनने के लिए दस साल, डॉ. बनने के लिए पन्द्रह साल, वैज्ञानिक बनने के लिए बीस साल तथा मन को जीतकर भगवान् महावीर और बाहुबली बनने के लिए जन्म जन्मान्तरों की साधना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
तप चाहे सुरराय, करम शिखर को वज्र है। द्वादश विधि सुख दाय, क्यों न करे निज सकति सम॥ पुरुषार्थ 0 – भेजें
आप हर मञ्जिल को मुश्किल समझते हैं, हम हर मुश्किल को मञ्जिल समझते हैं। बड़ा फर्क है हमारे और आपके नजरिये में, आप दिल को दर्द और हम दर्द को दिल समझते हैं॥ पुरुषार्थ 0 – भेजें
पाषाण से प्रतिमा- प्रतिमा की पूजा देख पाषाण खण्ड बोला, बहिन लोग बड़े पक्षपाती हैं तुम्हारा और हमारा अंश और वंश एक है, लोग तुम्हे पूजते हैं, और हमसे टिककर बैठते हैं, प्रतिमा ने कहा तुमने हमारी साधना और समर्पण नहीं देखा, हमारी छाती पर बैठकर छैनी-हथौड़ा से अनावश्यक कलेवर निकाला गया, तब आज हमारी पूजा हो रही है, पूज्य बनने के लिए साधना आवश्यक है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
विद्यार्थी सोलह से बीस वर्ष तक अध्ययन की कठोर साधना करता है तब सर्विस मिलती हैं, स्त्री नौ माह गर्भ सम्भालती है, तब पुत्र का मुख देखने को मिलता है, किसान चार माह तप करता है तब फसल मिलती है, दुकान दार दुकान पर बैठकर दिन भर मेहनत करता है तब पेटी भरती है, इसी प्रकार साधक वर्षों वीतरागता की साधना करते हैं तब परमात्मा बनते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जो भी कार्य करो पहले दृढ़ सङ्कल्पी बनो, साधनों का संग्रह करो, बाधक कारणों का परित्याग करो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
मनुष्य पर्याय दुर्लभता से प्राप्त हुयी है, लेकिन अज्ञानी जन सुलभता से नष्ट कर देते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सोना गर्मी पाकर आभूषण बनता है और पाषाण चोट खाकर भव्य मूर्ति बनता है, उसी तरह जीवन में जितने सङ्घर्ष आते हैं, आदमी उतना ही अधिक अनुभवी एवं मूल्यवान बनता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
शक्ति से अधिक करने से ख्याति, पूजा, लाभादि की चाह सिद्ध होती है और शक्ति छिपाकर करने से श्रद्धा की न्यूनता सिद्ध होती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
हे आत्मन्! हमेशा ऐसी भावना हो कि मैं आत्म गुणों की दीवाली मनाना चाहता हूँ, और कर्मों की होली जलाना चाहता हूँ, अर्थात् गुणों को ग्रहण करने की और दोषों को छोड़ने की भावना होना चाहिए। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पवनञ्जय के पास रावण का पत्र आया, वरूण से युद्ध हो रहा है, पवनञ्जय ने हनुमान से कहा, बेटा तुम राज्य सम्भालो, मैं युद्ध को जा रहा हूँ, हनुमान ने कहा पिता जी, आप घर पर रहो मैं युद्ध को जाऊँगा, पिता ने कहा बेटा, तुमने कभी युद्ध देखा नहीं, तुम मत जाओ, तब हनुमान ने कहा! पिताजी क्या कोई पहले मोक्ष को देखकर आता है बाद में मोक्ष जाता है? पुरुषार्थ 0 – भेजें
तेरहवें गुणस्थान वाले जीव उत्कृष्ट आराधना के स्वामी हैं, ये उसी भव से मोक्ष जाते हैं, मध्यम आराधना वाले सात-आठ भव में मोक्ष जाते हैं, परिषहों से डरने वाले, सङ्क्लेश परिणाम वाले सम्यग्दृष्टि जघन्य आराधना वाले संख्यात-असंख्यात भव में मोक्ष जाते हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
ट्रेफिक भरे रास्ते से गुजरना है तो धीरे-धीरे हार्न बजाते हुये चले जाते हैं तो रास्ता अपने आप निकल आता है, इसी प्रकार कितना भी तीव्र कर्म का उदय हो, तत्त्वाभ्यास से रास्ता मिल ही जाता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
गुरु के आशीर्वाद मात्र से विना बीज बोये फसल नहीं मिलती, उसी प्रकार भगवान् ने कहा 'तीसरे भव में मोक्ष होगा' तो भी चुपचाप घर में बैठने से नहीं तपस्या करने से ही मोक्ष होगा। पुरुषार्थ 0 – भेजें
छह माह का उपवास लेकर ध्यान में स्थित रहे, इसके बाद सात माह सात दिन अर्थात् तेरह महीने सात दिन में आहार चर्या हुई थी। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जिन्होनें समस्त साम्राज्य को तृण की तरह छोड़कर के निर्वाण के लिए तपस्या की थी, वे भगवान् भी दीन की तरह भोजन के लिए दूसरों के घरों में जाते रहे, लेकिन भोजन नहीं मिला और क्षुधा परीषह सहना पड़ा, फिर दूसरों को तो अपनी कार्य की सिद्धि के लिए परीषह सहन करना ही चाहिये। पुरुषार्थ 0 – भेजें
चार माह की उपयोगिता- अषाढ़ में धर्म की बाढ़, सावन में पावन, भाद्रपद में भद्रता हो जाती है, इससे जो वञ्चित है वह कुवाँर में कोरा, कार्तिक में कायर, होकर पलायन कर जाता है, चार माह कायर होने के नहीं वीर होने के हैं। पुरुषार्थ 0 – भेजें
सन्त और सैनिक को कभी सोने मत देना, सन्त सो गये तो उन्नति रुक जायेगी, सैनिक सो गये तो सुरक्षा कठिन हो जायेगी। पुरुषार्थ 0 – भेजें
आचार्य ज्ञानसागर जी ने कजोड़ीमल जी से पूँछा विधाधर पढ़ता है या नहीं? रात में देखा तो पूरी रात पढ़ते ही मिले। पुरुषार्थ 0 – भेजें
कठोरता- नेमावर में भारी वर्षा सामने दिख रही थी, फिर भी आर्यिकाओं का विहार करा दिया, शिष्यों की दृढ़ता की परीक्षा कठोरता पूर्वक ली। पुरुषार्थ 0 – भेजें
संस्मरण- खुरई में विद्वान् से पढ़ने की भावना व्यक्त की, उन्होंने पूँछा जैन क्यों बनना चाहते हो? वर्णीजी ने कहा विशेषता यह है कि जैन लोग पानी छान कर पीते हैं, रात्रि में भोजन नहीं करते, शुद्ध भोजन करते हैं, देवदर्शन करते हैं आदि, तब पण्डित जी बोले- यहाँ अच्छा-अच्छा खाने को मिलता है, इसलिये जैन बनना चाहते हो, वचन रूपी बाण हृदय में लगे, लेकिन सङ्कल्प लिया कि पढ़कर ही मिलूंगा। पुरुषार्थ 0 – भेजें
व्रतों का पालन करते हुए ज्ञानार्जन करो, जैन धर्म संसार से पार उतरने की नौका है, इसे पाकर प्रमादी मत बनो। पुरुषार्थ 0 – भेजें
पुरुषार्थी- पण्डित गोपालदास जी का स्वास्थ खराब था, बम्बई से प्रवचनार्थ निमन्त्रण आया, पण्डित जी जाने को तैयार हो गये लोगों ने रोका मत जाओं, तब पण्डितजी ने कहा- जैसे युद्ध में शूर और जुआ में जुआरी को निमन्त्रण मिलने पर रुकता नहीं, ऐसा ही विद्वान् भी होता है। पुरुषार्थ 0 – भेजें