Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Charity

दान

491 सूत्र · पृष्ठ 3 / 7

कंजूस अर्थात् कम-जूस जिसमें होता है, वह कंजूस है।
दान
कंजूस का उद्देश्य—रिश्ता भाई भाई का, हिसाब पाई पाई का।
दान
कंजूस परमात्मा से नहीं, पैसे से प्यार करता है।
दान
कंजूस दान कोड़ियों का करता है, संग्रह करोड़ो का करता है।
दान
कंजूस को राम से नहीं, दाम से प्रयोजन है क्योंकि उसने सुन रखा है— दाम करे सब काम, ये सोचे आठों याम।
दान
कंजूस धन का रक्षक होता है उसका जीवन गाय चराने वाले चरवाहा की तरह होता है, जो दिन भर गाय चराता है रात भर मच्छर उड़ाता है।
दान
कंजूस व्यक्ति प्याले का आकार देखता है, रसिक व्यक्ति प्याले का पदार्थ देखता है।
दान
अतिथि सत्कार से इंकार सबसे बड़ी दरिद्रता है।
दान
नियत दान देने वालों के आवश्यक खर्चों में कभी कमी नहीं आती है।
दान
तुम्हारे द्वारा यदि दूसरों को लाभ होता हो, उसमें उनका भविष्य व सौभाग्य अन्तरंग कारण समझो, एहसान का भाव मत रखो।
दान
निःस्वार्थ सेवा में तत्पर रहने से लोक प्रियता आती है।
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सुख देने वाले को स्वार्थ का त्याग करने पर ही पुण्य की प्राप्ति होती है।
दान
जो प्राप्त करना चाहते हो वह देना शुरू करो।
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जो आहार दान करके भोजन करता है उसको भूख की बीमारी कभी नहीं होती है।
दान
उपहार का मूल्य नहीं, उसके पीछे की दृष्टि ही तौली जाती है।
दान
निर्धनों को धन न दिए जाने से दरिद्रता बहुत बढ़ गई है और दरिद्रता के बहुत बढ़ जाने से चोरी बहुत बढ़ गई है।
दान
मंदिर की द्रव्य से पूजा करके होटल की कचौरी बराबर भी पैसा दान नहीं देते हैं।
दान
उदारता पापों को ऐसे बदल देती है, जैसे पारस पत्थर लोहे को छूते ही बदल देता है।
दान
दूसरे का भला करने के समान कोई धर्म नहीं है दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है।
दान
धर्म को समझने के लिए मंदिर जाना अनिवार्य नहीं, अपितु दूसरों के दुःखों को समझना सबसे पहले अनिवार्य है क्योंकि प्राणी सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।
दान
नदी, वृक्ष, बादल, समुद्र, विन्ध्याचल, मलयाचल, गाय, सूर्य, सज्जन सभी निःस्वार्थ परोपकार करते हैं।
दान
जिनका मुख प्रसन्नता का घर है, हृदय दया से परिपूर्ण हैं, वाणी अमृत की वर्षा करती है और कार्य परोपकार हैं, वे किसके द्वारा वंदनीय नहीं होते हैं?
दान
उपकार करने का साहसी स्वभाव होने के कारण गुणी लोग अपनी हानि की भी चिन्ता नहीं करते हैं, दीपक की लौ अपना अंग जलाकर ही प्रकाश उत्पन्न करती है।
दान
दुःखियों का दुःख शान्त करना ही उत्तम लोगों की सम्पत्ति का एकमात्र फल है।
दान
बिना किसी के गुण-दोष की ओर ध्यान दिये परोपकार करना सज्जनों का एक व्यसन ही होता है। सत्पुरुष प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं करते हैं।
दान
अमूल्य हीरे के कण से दूसरे के लिए गिराया गया रक्त कण ज्यादा कीमती है।
दान
सज्जनों का लेना भी देने के लिए होता है जैसे-बादलों का जल लेना देने के लिए होता है।
दान
मुझे राज्य की कामना नहीं है, न स्वर्ग की न मोक्ष की, मैं दुःखों से पीड़ित प्राणियों के कष्टों के निवारण की कामना करता हूँ।
दान
वह कर्म सबसे उत्तम है जो अधिकतम लोगों को अधिकतम प्रसन्नता प्रदान करता है।
दान
जो लोग खेती करके जीविका चलाते हैं, वे केवल यही नहीं कि स्वयं कभी भीख न मागेंगे, बल्कि दूसरे भीख माँगने वालों को कभी इंकार किए बिना दान भी दे सकेंगे।
दान
स्वार्थ की कीचड़ गंदगी फैलाती है और निःस्वार्थ की गंगा गंदगी को मिटाती है।
दान
पौष्टिकता के बिना भोजन व्यर्थ है, सुपात्र के बिना दिया गया दान व्यर्थ है, पुत्र की सच्ची शिक्षा के बिना मातृत्व व्यर्थ है उसी प्रकार परोपकार में खर्च किए बिना अपार धन सम्पत्ति व्यर्थ है।
दान
जब हम नेकी करके उसका एहसान जताने लगते हैं, तो वहीं जिसके साथ हमने नेकी की थी वह हमारा शत्रु हो जाता है और अगर वही नेकी करने वालों के दिल में रहे तो नेकी है, बाहर निकल आए तो बदी है।
दान
सज्जन पुरुष बिना कहे दूसरों की आशा पूर्ण कर देते हैं, जैसे सूर्य स्वयं ही घर–घर प्रकाश फैला देता है।
दान
अपने सुख के लिए उद्योग करना दु:ख को निमन्त्रण देना है और दूसरों के सुख के लिए उद्योग करना आनन्द को निमन्त्रण देना है।
दान
ज्यों–ज्यों परोपकार के लिए रुपयों की थैली खाली होती है, त्यों–त्यों हमारा हृदय पुण्य से भरता जाता है।
दान
यदि मनुष्य परोपकारी नहीं है तो उसमें और दीवार पर लगे चित्र में क्या फर्क है।
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परस्पर उपकार करते हुए जीना ही वास्तविक जीना है।
दान
सबसे उत्तम दानी वे हैं, जो अपने संपर्क में आए हुए व्यक्तियों को इस योग्य बना दें कि उन्हें जीवन में कभी दान–दक्षिणा लेने की आवश्यकता न पड़े।
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जब आप किसी को भौतिक पदार्थ देने में असमर्थ हों तो भी अपनी सद्भावनाएँ और शुभकामनाएँ दूसरों को देते रहिए।
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अपने लिए सुख चाहने से नाशवान् सुख मिलता है और दूसरों को सुख पहुँचाने से अविनाशी सुख मिलता है।
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अपनी पीड़ा तो पशु–पक्षी भी अनुभव करते हैं, मनुष्य तो वही है जो दूसरों की वेदना को महसूस करें।
दान
नेचरोपैथी, एलोपैथी और होम्योपैथी जहाँ काम नहीं करती वहाँ सिम्पैथी काम करती है।
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भलाई जितनी अधिक की जाती है उतनी ही अधिक फैलती है।
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नेकी का उपहार नेकी है। दूसरों का भला करने से अपना ही भला होता है।
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संसार में सबसे बड़ा अधिकार सेवा और त्याग से प्राप्त होता है।
दान
दु:ख में आँसू बहाकर मन हल्का करना अच्छा है, लेकिन दूसरों के आँसू पोंछकर उन्हें हल्का करना बहुत अच्छा है।
दान
संसार में सबसे कठिन कार्य व्यक्ति में आत्मविश्वास के भावों को जागृत करना है। भोजन करते समय भूखे प्राणी को न भूलना भव्य जीव की पहचान है।
दान
उपकार करने वाले के सभी अपराध माफ कर दिये जाते हैं।
दान
दूसरों को सुख पहुँचाने और भलाई करने से ही पुण्य का सृजन होता है इसीलिए परोपकार ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।
दान
यदि मनुष्य निरंतर सुखी रहना चाहता है तो उसे परोपकार के लिए जीवित रहना चाहिए।
दान
उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता है।
दान
उपकार करने वाले में स्वार्थ की भावना नहीं होनी चाहिए।
दान
गरीब लोग प्रेम और सहानुभूति के भूखे होते हैं।
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जिनके हृदय में सदैव परोपकार की भावना होती है, उनकी आपदाएँ समाप्त हो जाती हैं और पग–पग पर धन की प्राप्ति होती है।
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उदारता में चुम्बक जैसा आकर्षण होता है।
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जब कोई दूसरों की जिंदगी को खुशहाल बनाता है, तब उसकी जिंदगी अपने आप खुशहाल बन जाती है।
दान
पेट तो एक है और हाथ दो, यदि आप चाहें तो दोनों हाथों का उपयोग करके अपने साथ दूसरों का भी पेट भर सकते हैं।
दान
सच्चा प्रेम स्तुति से प्रकट नहीं होता सेवा से प्रकट होता है।
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जो मेरे साथ भलाई करता है वह मुझे भला होना सिखा देता है।
दान
अपनी भलाई चाहते हो तो दूसरों का भी भला करो।
दान
कुलीन सत्पुरुष किसी का उपकार करके उसका दिग्दर्शन न करते हुए मौन रहते हैं।
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जब मनुष्य पर विपत्ति आवे तब उसे अत्यधिक उपदेश के स्थान पर सहानुभूति और सहायता की आवश्यकता होती है।
दान
आप भविष्य में भी गरीबों का ख्याल रखते रहें भगवान् आपका ख्याल रखेगा।
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महान् पुरुष जो उपकार करते हैं उसका बदला नहीं चाहते हैं।
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सज्जन पुरुष की सम्पत्ति दूसरों के कल्याणार्थ होती है।
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आप बेसहारों का सहारा बनिये आपको सहारा अपने आप मिल जाएगा।
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आप राजमार्ग न बन सकें तो पगडंडी ही बनिए। सूरज न बन सकें तो तारा ही बनिए। ज्यादा सहयोग न कर सकें तो कुछ ही करें।
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इस दुनिया में किसी दु:खी व्यक्ति के लिए थोड़ी–सी भी सहायता ढेरों उपदेशों से कहीं अधिक अच्छी हैं।
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साधक की साधना में सहायक होना ही सच्ची वैय्यावृत्ति है।
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सेवा करने वाले के हाथ स्तुति करने वाले के मुँह से अधिक पवित्र होते हैं।
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सेवा हृदय और आत्मा को पवित्र करती है। सेवा से अनुभव प्राप्त होता है और यही जीवन का लक्ष्य है।
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सेवा तो मूक होनी चाहिए, जिसने अपनी सेवा का ढिंढोरा पीटा वह मानो अपने–आपको समाप्त कर चुका है।
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सेवा मानव–वृत्तियों में सबसे ऊँची और महान् वृत्ति है।
दान
सेवा से बढ़कर व्यक्ति को द्रवित करने वाली और कोई चीज संसार में नहीं हैं।
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