Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 81

भाग्य और पुरुषार्थ।

16 सूत्र

अबुद्धि पूर्वक होने वाले इष्टानिष्ट में अपना भाग्य प्रधान होता है, बुद्धि पूर्वक होने वाले इष्टानिष्ट में अपना पुरुषार्थ प्रधान होता है।
पुरुषार्थ
पङ्क के विना पङ्कज उग नहीं सकता, पङ्ख के विना पक्षी उड़ नहीं सकता। पुण्य को भी पाप की तरह हेय समझने वालों, पुण्य के विना तीर्थंङ्कर पद मिल नहीं सकता।।
कर्म
विश्व का कल्याण धन से नहीं धर्म से होता है, धन का विकास पाप से नहीं पुण्य से होता है। धन को धर्म से श्रेष्ठ मानने वाले रे मानव!, धर्म का कार्य धन से नहीं तन मन से होता है।।
धन
कहीं पर भूख तड़फन की, कहीं पर मौज उड़ते हैं, कहीं पर दूध कुत्ते को, कहीं बालक बिलखते हैं। किसी की देह नज्झी है, कहीं परदे लटकते हैं, कहीं सूती नहीं मिलता, कहीं सिलकन पहनते हैं। किसी का चैन से सोना, किसी का रात भर रोना, किसी को सुध न ऊठने की, किसी का काम वश रहना। कहीं पर चैन की वंशी, कहीं अरमान के टुकडे, कहीं हर अङ्ग पर जेवर, कहीं पर बाल भी बिखरे। कहीं हैं धूल कालिख तो कहीं पावडर महकते हैं, कहीं पर होंठ में लाली, कहीं पर दिल धधकते हैं। कहीं अर्थी निकलती है, कहीं तबला ठनकता है, कहीं रोना सदा जुट कर, कहीं अट्टहास होता है।।
कर्म
न जाने कैसे खेल खिलाती है जिन्दगी, पल में हँसे तो पल में रूलाती है जिन्दगी। शीशे का बनाया था मैंने सपने में महल, पर चोट पत्थरों की दिलाती है जिन्दगी। सोचा था मैंने अब न किसी को सताऊँगा, पर गलतियों पे गलति कराती है जिन्दगी। प्यासा दौड़ता है मृग पानी की चाह में, बालू को भी पानी सा दिखाती है जिन्दगी। रे मन! जिसे तू चाहता वो मिल नहीं सकता, सपनों को सदा झूठा बनाती है जिन्दगी।।
कर्म
पुरुषार्थ से ही कार्य सिद्ध होते हैं सङ्कल्प करने मात्र से नहीं, जिस प्रकार सोये हुए सिंह के मुख में मृग अपने आप प्रवेश नहीं कर जाते हैं किन्तु सिंह को पुरुषार्थ करना पड़ता है।
पुरुषार्थ
कथनी बिन करनी करे, ज्ञानीजन दिन रात। निजी बढ़ाई के विना, जैसे मुह में दाँत।।
विनम्रता
उद्यम साहस धीरता, पराक्रमी मतिमान। एते गुण जो पुरूष में, सो निरभै बलवान।।
पुरुषार्थ
जीवन है अनमोल, इसे जो व्यर्थ गमाया करते हैं, अपना कर्तव्य भुलाकर, वे पीछे पछताया करते हैं। जो धर्म निभाते हैं अपना, सदा सुख पाया करते हैं, वो सच्चे अर्थों में जीवन को सफल बनाया करते हैं।।
पुरुषार्थ
जिन्दगी सिर्फ अपने ही दम पर जी जाती है, दूसरों के कन्धे पर तो अर्थी ही जाती है।
पुरुषार्थ
ईश्वर से आशीर्वाद ले लिया भरपूर फसल होगी, बीज बोया नहीं, फसल काटने गया तो कुछ नहीं मिला, आशीर्वाद के साथ पुरूषार्थ आवश्यक है, जैसे पुत्र माँगा पर ब्रह्मचर्य ले लिया तो सन्तान नहीं होती है।
पुरुषार्थ
सीरियल= सी-देखो, रियल-वास्तविक, उसे देखो जिसके देखने से पाप का बन्ध न हो।
विवेक
इम्पोसिबल= यानी आई एम पोसिबल, अर्थात् असम्भव कुछ भी नहीं है।
पुरुषार्थ
नारद की उत्पत्ति कुलिझ्झी तापस से होती है, जो कलहप्रिय, धर्मप्रिय होते हैं, इनके माता-पिता को भाग्य से मुनिराज का उपदेश मिल जाता है, बच्चे को अकेला छोड़ मोक्षमार्ग में लग जाते हैं।
कर्म
प्रत्येक वस्तु किराये की हो सकती है, पर विवेक किराये से नहीं मिलता, वह तो निजी ही होना चाहिए।
विवेक
हाथी के कान, पीपल के पत्ते, हवा, पानी ये सदा चञ्चल होते हैं, उसी प्रकार धनादि से मन सदा चञ्चल होता है।
मन