Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 259

सेठ को मुक्ति चाहिए।

16 सूत्र

व्युत्सर्ग-निश्चित समय के लिए समस्त प्रवृत्ति का एवं शरीर से ममत्व का त्याग करना व्युत्सर्ग तप कहलाता हैं।
अनासक्ति
सेठ को मुक्ति चाहिए- एक सेठ भगवान् की प्रतिदिन भक्ति करता एवं भगवान् के कान में निवेदन करता, कि भगवान् मुझे मुक्ति चाहिए, एक दिन एक देव ने आकर उसकी परीक्षा की, और कहा कि हम आपको आज से दसवे दिन मोक्ष ले चलेंगे, सेठ ने कहा दसवे दिन क्यों? देव ने कहा दस दिन में आपके दस लड़कों का एवं दस कारखानों का वियोग होगा, आप हलके हो जायेंगे, तब हम आपको मोक्ष ले जायेंगे, सेठ ने कहा यह तो टेड़ी खीर है, हमारे गले में नहीं उतरेगी, कोई दूसरी किस्म का मोक्ष हो तो आप आना, अन्यथा कष्ट नहीं करना।
अनासक्ति
ध्यान के भेद- दुर्ध्यान, स्वार्थ ध्यान, परार्थ ध्यान, विशुद्ध ध्यान। !!प्रवचन कार इनकी व्याख्या करें!!
ध्यान
आर्त और रौद्र ध्यान नरक और तिर्यञ्च, कुदेव और कुमनुष्यों में उत्पन्न कराते हैं, धर्म और शुक्लध्यान सुदेव, सुमनुष्य और मुक्ति प्रदान कराते हैं।
ध्यान
आत्मध्यान से बढ़कर सुख नहीं है, आत्मध्यान से बढ़कर तप नहीं है और आत्मध्यान से बढ़कर कहीं कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है।
ध्यान
पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत के भेद से धर्म्यध्यान के चार भेद हैं, 1.शरीर में स्थित स्वात्मा का चिन्तन करना पिण्डस्थध्यान है, 2.मन्त्र तथा आगम के वाक्यों का चिन्तन करना पदस्थध्यान है, 3.समवसरण में स्थित चैतन्यरूप अरहन्त परमेष्ठी का ध्यान करना रूपस्थध्यान है, 4.द्रव्यकर्म-भावकर्म-नोकर्म से रहित सिद्ध परमेष्ठी का ध्यान करना रूपातीत ध्यान है।
ध्यान
64 वर्णों में ईकाई 4, दहाई 6 को गुणा करने पर 24 तीर्थंङ्कर हो जाते हैं, इनका चिन्तन करना रूपस्थ ध्यान कहलाता है।
ध्यान
ध्यान में शास्त्रों के विषय का, तीर्थों की प्रतिमाओं का, मन्त्र के माहात्म्य का, आचार्यों के नाम व आचरण का चिन्तन करना चाहिए।
ध्यान
जिस प्रकार राग-द्वेष मोह और ज्ञान, दर्शन मय आत्मा भिन्न-भिन्न हो जाय वैसा करना तप है।
अनासक्ति
पाँच समितियों का पालना, मन-वचन-काय को चलायमान नहीं होने देना, रागद्वेष रहित आत्मानुभव करना तप है।
संयम
वैराग्य, तत्त्वज्ञान, निर्ग्रन्थ अवस्था, एकाग्रता और परीषह विजय के होने पर ध्यान होता है।
ध्यान
परिग्रह का त्याग, कषायों का निग्रह, व्रतों का धारण, मन और इन्द्रियों की विजय, ध्यान की उत्पत्ति में निमित्त होते हैं।
ध्यान
उत्कृष्ट ध्यान की सिद्धि के लिए इष्ट-अनिष्ट पदार्थों में राग-द्वेष मोह मत करो।
ध्यान
जो शरीर से भिन्न अविनाशी आत्मा को नहीं जनता है और घोर तपस्या करता है, तो भी उसे मोक्ष नहीं मिलता है।
ज्ञान
सब जीवों की हिंसा का त्याग करना तप है और शान्तिपूर्वक सब दुःखों का सहना भी तप है।
अहिंसा
रागी वन में रहकर के भी पाप करता है और घर में भी पञ्चेन्द्रियों के निग्रह से तप होता है। रागरहित (राम के भाई भरत की तरह) निष्पाप मार्ग में चलने वाले के लिए घर ही तपोवन होता है।
अनासक्ति