Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 246

प्रद्युम्न का वैराग्य। यमपाल का संयम। बीज रक्षण। धन्वन्तरि और विश्वानुलोम।

7 सूत्र

सन्त लेटे-लेटे आतेहैं, और बैठे-बैठे जाते हैं, और श्रावक लेटे-लेटे आते हैं, और लेटे-लेटे ही जाते हैं, उनकी अर्थी कफन से इसलिए ढकी होती है, कि उन्होंने जीवन में संयम नहीं पाला इसलिए मुँह दिखाने लायक नही हैं, सन्त की अर्थी खुली होती है और वे बैठे-बैठे जाते हैं।
संयम
वज्रदन्त चक्रवर्ती–वज्रदन्त चक्रवर्ती को माली ने सहस्रदल कमल भेंट किया, उसके अन्दर भौंरा मरा पड़ा था, देखकर सोचने लगे ओ हो! घ्राण इन्द्रिय के वशीभूत होकर मर गया। इससे चक्रवर्ती को वैराग्य हो गया, बड़े बेटे से कहा कि राज सम्भालो हम दीक्षा लेंगे, बेटा कहता है पिताजी राज अच्छा है या बुरा यदि अच्छा है तो आप क्यों छोड़ रहे हो, बुरा है तो प्यारे बेटे को क्यों दे रहे हो, हजार बेटों में से किसी ने भी राज नही लिया। गर्भस्थ शिशु को राज देकर सभी ने दीक्षा ले ली।
अनासक्ति
साधु ने एक व्यक्ति को पारस मणि चार माह के लिए दिया, जितना सोना बनाना चाहो बना लो, वह बाजार में लोहा खरीदने गया, आज महँगा हैं कल खरीदेंगे, यह कहते कहते चार माह में लोहा नहीं खरीद सका, साधु ने अपना मणि वापस ले लिया, हमें भी नर भव रूपी मणि मिला, संयम का पालन कल करेंगे, ऐसा सोचकर सारा जीवन खो देते हैं।
पुरुषार्थ
प्रद्युम्न का वैराग्य– द्वारकाधीश कृष्णजी ने नेमिनाथ भगवान् से पूँछा, भगवन्! ये द्वारका नगरी क्या हमेशा ऐसी ही हरी-भरी बनी रहेगी? भगवान् ने कहा हे कृष्ण! बारह वर्ष के बाद इस नगरी का द्वीपायन के द्वारा विनाश हो जायेगा, सुनकर बहुत लोगों ने दीक्षा ले ली, प्रद्युम्नजी को भी वैराग्य हो गया, प्रद्युम्नजी वसुदेव से आज्ञा लेने जाते हैं, वे कहते है बेटा! अभी तुम्हारे भोग भोगने के दिन हैं न कि वैराग्य धारण करने के, प्रद्युम्नजी ने कहा आप तो संसार के स्तम्भ बने रहो, मैं तो दीक्षा लेता हूँ, स्त्री से कहा प्रिय! मैं दीक्षा लेने जाता हूँ, स्त्री कहती है वैरागी ने प्रिय सम्बोधन कैसे किया? आप लो या न लो मैं तो दीक्षा लेने जाती हूँ, और प्रद्युम्न से पहले उनकी पत्नी दीक्षित हो गयी।
अनासक्ति
यमपाल का संयम– राजा ने अष्टान्हिक में सभी को हिंसा न करने का आदेश दिया, राजकुमार ने राजाज्ञा का उल्लङ्घन करके एक भेड़ को मारकर खा लिया, राजा को पता चला, तो राजा ने राजकुमार को फाँसी की सजा देने का आदेश दिया, चाण्डाल ने चतुर्दशी के दिन हिंसा का त्याग किया था जिसके कारण फाँसी देने से मना कर दिया, राजा ने दोनों को बाँधकर तालाब में फैकने का आदेश दिया, चाण्डाल के चतुर्दशी को हिंसा के त्याग के नियम के प्रभाव से, देवों ने सिंहासन की रचना की एवं राज कुमार को जल जन्तु खा गये।
अहिंसा
पिता ने बेटों को बीज दिये और कहा सम्भाल के रखना, एक लड़के ने बेंच दिये, दूसरे ने तिजोरी में रख दिए, तीसरे ने खेत में बो कर सैकड़ों बोरा अनाज बना दिया, कुछ वर्षों बाद पिता ने बेटों से बीज माँगे, तो पहला बाजार दौड़ा, दूसरा तिजोरी में देखने गया तो सड़ गए थे, तीसरे ने खेत में से लाकर पिता का मन जीत लिया, इसी तरह धर्म रूपी बीज को संयम रूपी खेत में बो दो तो अनन्त गुना फलता है।
पुरुषार्थ
धन्वन्तरि और विश्वानुलोम–धन्वन्तरि और विश्वानुलोम दोनों मित्र थे, एक जैन और एक जैनेत्तर, विश्वानुलोम ने सुन रखा था कि हाथी कुचल दे तो भी जैन मन्दिर मे नहीं जाना चाहिए, जबकि जैनेत्तर शास्त्र में जन मन्दिर पाठ था, जिसका अर्थ 'वेश्यालय अथवा मदिरालय' होता है, बाद में लोगों ने ईर्ष्या द्वेष के वश 'ज' के ऊपर दो मात्राएँ चढ़ा दीं, जिसका अर्थ जैन मन्दिर हो गया, जिससे लोग वेश्यालय और मदिरालय से तो परहेज करते नहीं हैं, जैन मन्दिर से परहेज करते हैं, इसलिए जब भी वह जैन मन्दिर के सामने से निकलता तब कानों में अङ्गुलि लगा लेता जिससे कोई शब्द कान मे न पढ़ जाए, एक बार उसे पैर में ठोकर लग गई जिससे उसके कान की अङ्गुलियाँ निकल गईं, तो 'देवों कि परछाई नहीं होती' यह शब्द कान मे पढ़ गया, उसकी पत्नी को कोई अदृश्य होकर परेशान करता था, उसने देखा तो उसकी परछाई थी, इसलिए उसने घर मे धुआँ करके उसके आँखों का अञ्जन दूर कर दिया और अपराधी को राजा के लिए सौंप दिया, वह विपत्ति से छूट गया, तब से उसका जैन मन्दिर के प्रति द्वेष दूर हो गया और वह मन्दिर जाकर दर्शन करने लगा और प्रवचन सुनने लगा, प्रवचन के बाद सबने नियम लिया तो उसने भी नियम लिया 'विना सात कदम पीछे हटे गलत काम नहीं करेंगे'। एक बार रात को बारह बजे जुआ खेलकर लौटा तो देखता है कि मेरी पत्नि किसी पुरुष के साथ सो रही है, तुरन्त तलवार निकाल कर मारने के लिए तैयार हुआ तो तुरन्त उसे याद आया कि 'सात कदम पीछे हटने के बाद ही गलत काम करना है' जैसे ही पीछे हुआ कि वहाँ से आबाज आई माँ पीछे खिसको गर्मी लग रही है, समीप आकर देखा तो वे सास बहु थीं, उस रात वे नाटक दिखाने गईं थीं और वेश-भूषा बदले विना ही सो गई थीं, उसकी पत्नी गर्भवती थी, अतः तीन प्राणियों कि रक्षा हो गई जिससे उसकी श्रद्धा और बढ़ गई।
भक्ति