Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 83

स्वाध्याय

30 सूत्र

अच्छी पुस्तकें हीरा-मोती से ज्यादा कीमती हैं क्योंकि हीरा-मोती बाहर को चमकाते हैं, पुस्तकें हृदय को चमकाती हैं।
ज्ञान
सत्य और समाज के प्रति निर्भीक होकर स्वतन्त्र जीने का नाम संन्यास है।
धर्म
अच्छे (नेक) बनने में सारी आयु लग जाती है, बदनाम होने में एक दिन भी नहीं लगता है।
चरित्र
अच्छा सम्मान पाने की राह यह है कि आप जैसा प्रतीत होने की भावना करते हो वैसा करने का प्रयत्न करो।
चरित्र
वर्दी (वेश) की गरिमा को दाग न लगने दें।
चरित्र
संसार में समाज का सम्मान झूठा है क्योंकि समाज की निगाहें बदलते वक्त नहीं लगता है लोग जिस मुख से प्रशंसा करते है उसी मुख से निंदा करने लगते हैं।
समृद्धि
जैसे लोग फिल्म देखकर नायक-नायिका की नकल करते हैं, उसी प्रकार भगवान् के गुण गाते-गाते भक्त भी उन जैसे गुणों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है।
भक्ति
जो देश व समाज के लिए जीते हैं उनका अभिनंदन होना चाहिए, उनका शरीर चले या न चले उनका यश चलता है, वे जिंदा रहे या न रहे उनका यश जिंदा रहता है।
समृद्धि
अपने प्राण अथवा धन देकर यश की रक्षा करना चाहिए।
चरित्र
मनुष्य के लिए इससे बढ़कर सुयश और कोई नहीं है कि लोगों में उसकी प्रसिद्धि हो कि वह झूठ बोलना जानता ही नहीं अर्थात् ऐसा पुरुष अपने शरीर को कष्ट दिये बिना ही सब तरह की सिद्धियों को पा जाता है।
सत्य
जो राजा प्रीति के साथ दान देता है और प्रेम के साथ शासन करता है उसका यश सारे जगत् में फैल जाता है।
समृद्धि
जिन लोगों को अपनी कीर्ति प्यारी है, वे अपने दोष को राई के समान छोटा होने पर भी ताड़वृक्ष के बराबर समझते हैं।
चरित्र
जिनेन्द्र भगवान् ने एक बूँद जल में जो जीव बतलाये हैं, वे यदि कबूतर के बराबर होकर उड़े तो जम्बूद्वीप में न समायें अत: रोग और हिंसा से बचने के लिए पानी छानकर पियें।
अहिंसा
राजा, प्रधान श्रावक और साधु का मरण होने पर, ग्रहण आदि के समय तथा पर्व के दिनों में सिद्धान्त ग्रन्थों को नहीं बांचना चाहिए। अमावस्या और पूर्णिमा का पाठ गुरु घातक है, चतुर्दशी का पाठ शिष्य घातक है, अष्टमी का पाठ दोनों का घातक है और प्रतिपदा पाठ का घात करने वाली है।
ज्ञान
जिस समय आप खुद को खुश करने के लिए किसी का 'अपमान' कर रहे होते हैं सच आप उस समय अपना सम्मान खो रहे होते हैं।
विनम्रता
जितना पुण्य धन-धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी का दान में देने से मिलता है उससे अधिक पुण्य स्वाध्याय करने से मिलता है।
ज्ञान
स्वाध्याय का परित्याग कर देने से उत्तम कुल भी नीच कुल हो जाते हैं।
ज्ञान
स्वाध्याय वाणी का तप है।
ज्ञान
संसार में बहुत से बड़े आदमी स्वाध्याय के बल पर ही ऊँचे चढ़े हैं, स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई तो निमित्त मात्र है।
ज्ञान
स्वाध्याय हमें मनोबल प्रदान करता है एवं हतोत्साहित होने पर रामबाण दवा का काम करता है।
ज्ञान
स्वाध्याय यानि स्व का स्व के लिए स्व के द्वारा अध्ययन करना स्वाध्याय है।
ज्ञान
स्वाध्याय परमतप है गुणश्रेणी निर्जरा का कारण है।
ज्ञान
स्वाध्याय करने से सदाचार का पालन होता है, इन्द्रियों का दमन होता है, राग-द्वेष आदि विकारों की मंदता होती है, मन की चंचलता रुकती है, सद्गुणों का विकास होता है, वैराग्य दृढ़ होता है, परिणामों में निर्मलता होती है, आत्मा में विशुद्धि बढ़ती है और मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है। ''स्वाध्याय का फल शान्ति धारण करना है।''
ज्ञान
स्वाध्याय करना कभी बंद मत कर देना क्योंकि समाधि के समय अंतिम श्वासों तक स्वाध्याय ही काम आयेगा।
ज्ञान
पंचमकाल में परिणामों को वश में करने वाली विद्या तो सिर्फ स्वाध्याय है।
ज्ञान
स्वाध्याय करने वाला कभी अनाचारी नहीं होता, आँखों को अक्षरों में और मन को अर्थ निकालने में लगा देने से अनर्थ होना बंद हो जाता है।
ज्ञान
अज्ञानी के दो-चार-पाँच-छह-आठ आदि उपवास करने में जितनी विशुद्धि कर्म निर्जरा होती है, उससे बहुगुणी विशुद्धि निर्जरा भोजन करते हुए शास्त्र पढ़ने से होती है।
ज्ञान
जो आत्मा के स्वरूप को जानने में कुशल व निपुण है, उनके तप व संयम होता है, समभावी के वैराग्य होता है, शास्त्र पढ़ने वाले के तप, संयम, वैराग्य; तीनों होते हैं, अत: शास्त्र अवश्य पढ़ना चाहिए।
ज्ञान
जहाँ पर अच्छी पुस्तकें हैं, वहाँ से व्यसन, पाप, कषाय, राग-द्वेष आदि विकारों व रोगों को भगाना कठिन नहीं है।
ज्ञान
किसी भी सामाजिक संस्था की कुछ खास बातें– १. आप कुछ नहीं करेंगे तो आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। २. अगर आप सक्रिय हैं तो आप पर अँगुलियाँ उठेंगी। ३. अगर आप यह नहीं सोचेंगे कि श्रेय किसको मिलेगा तो आप बहुत कुछ कर सकते हैं। ४. आपके जितने विरोधी होंगे आपका उतना ज्यादा सम्मान होगा। ५. आप जितना ज्यादा काम करेंगे आपको उतना ज्यादा और काम करना पड़ेगा। ६. जिम्मेदारी उसी की तरफ खिंची आती है, जो उठाना चाहता है। ७. आप अपने मन में जो भी प्रोजेक्ट सोचेंगे उसकी सफलता का श्रेय संस्था को मिलेगा और असफलता की जवाबदेही आपकी होगी? ८. जो आपका सबसे अच्छा हितैषी हैं, वो आपके मुँह पर आपकी आलोचना करेगा। ९. आपको प्रशंसा तब मिलेगी जब आप उसकी उपेक्षा करें। १०. आप लोकप्रिय तब बनेंगे जब अपने साथियों को सराहेंगे और उनके काम में उत्साह बढ़ायेंगे। ११. आप कब सही थे कोई याद नहीं रखेगा, आप कब गलत थे कोई नहीं भूलेगा। १२. आप जितना नियम मान कर चलेंगे आप पर उतना ज्यादा नियम मानने का दबाव बनाया जायेगा। सबसे खास बात सामाजिक कार्यों का उद्देश्य मन की संतुष्टि होती है और इसके लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है और आत्मसंतुष्टि से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
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