Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 61

सच्चा जीवन साथी ज्ञान है

107 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

स्वार्थ जितना सांसारिक होगा, उतना ही वह दुःख, संताप, शोक, विषाद तथा भय उत्पन्न करेगा।
अनासक्ति
पुष्प भले ही अपने वृक्ष का नामोल्लेख न करें किन्तु उसकी सुगन्ध उसके उत्पादक वृक्ष का नामोल्लेख कर देती है उसी प्रकार व्यक्ति का व्यवहार उसके कुल का परिचय दे देता है। भले और बुरे का पता उसकी सन्तान से चलता है।
चरित्र
श्रवण शक्ति होने पर भी वे कान बहरें हैं, जिनको उपदेश सुनने का अभ्यास नहीं है।
ज्ञान
उन बातों से सदा दूर रहो जो तुम्हें नीचे गिरा देंगी, चाहे वे प्राण रक्षा के लिए अनिवार्य रूप से ही आवश्यक क्यों न हों।
चरित्र
ग्रन्थ ऐसे अध्यापक हैं जो बिना बेंत मारे, बिना कटु शब्द बोले, बिना क्रोध किए, बिना वस्त्र व धन के हमें शिक्षा प्रदान करते हैं।
ज्ञान
धर्म, विद्या और धन का प्रतिदिन लेशमात्र भी संग्रह करते रहने से वे समुद्र से भी अधिक हो जाते हैं।
पुरुषार्थ
दान से भोग प्राप्त होते हैं, तप से परम इन्द्रत्व तथा ज्ञान से जन्म-जरा-मरण से रहित मोक्ष पद प्राप्त होता है।
ज्ञान
बोध का आगमन ही वासना का विसर्जन बन जाता है।
ज्ञान
अज्ञान और अभिमान का मतलब इधर कुँआ तो उधर खाई।
ज्ञान
शिष्य में तीन चीजें जरूर होनी चाहिए–आदर, आज्ञा और अनुशासन पालन।
धर्म
पुस्तक का मूल्य रत्नों से भी अधिक है क्योंकि रत्न बाहरी चमक दिखाते हैं जबकि पुस्तकें अन्तःकरण को उज्ज्वल बनाती हैं।
ज्ञान
पुस्तक प्रेमी सबसे अधिक धनी और सुखी हैं।
ज्ञान
देव पूजा नौकरों से करवाने वाला नहीं स्वयं पूजा करने वाला देव बनता है।
भक्ति
जिसने व्याकरण नहीं पढ़ा वह जन्मान्ध है क्योंकि वह जैसे श्वजन (कुक्कुर समूह) स्वजन (आत्मीजन), सकृत (एकबार), शकृत (विष्टा), सकल (सम्पूर्ण) शकल (खण्ड) आदि को नहीं समझ पाएगा। जो न्यायशास्त्र से रहित है वह गूंगा है, जो साहित्य से रहित है वह लंगड़ा है और जो कोष रहित है वह निर्धन है।
ज्ञान
थोड़ा पढ़ना, अधिक सोचना, कम बोलना, अधिक सुनना-यह बुद्धिमान बनने के उपाय है।
ज्ञान
विद्यारूपी धन को चोर चुरा नहीं सकता, राजा दण्ड के रूप में वसूल नहीं कर सकता, भाई हिस्से में बाँट नहीं सकता, विद्या का कोई बोझ नहीं होता, दान करने से वह बढ़ती है, विद्या सब धनों में श्रेष्ठ है।
ज्ञान
सत्य, ज्ञान, तप, अहिंसा, विद्वान् के प्रति नम्रभाव और सुशीलता को जो धारण करता है वह विद्वान् है न कि जो पढ़ता-पढ़ाता है, वह विद्वान् है।
ज्ञान
विवेक और बुद्धि विद्या की सन्तान है।
ज्ञान
व्यक्ति की कीमत शक्ल से नहीं उसकी अक्ल से होती है।
ज्ञान
ज्ञानी शस्त्र का नहीं शास्त्र का प्रयोग करता है।
ज्ञान
दया, करुणा व अहिंसा से विहीन शास्त्र नहीं शस्त्र हैं।
अहिंसा
जो शास्त्र का अर्थ अपनी स्वार्थ बुद्धि से निकालता है, वह शास्त्र को शस्त्र बना लेता है।
ज्ञान
सच्चा शास्त्र (ग्रन्थ) वह है जो आत्मा की ग्रन्थियों को खोलकर निर्ग्रन्थ पद प्राप्त कराता है।
ज्ञान
शिक्षा एक दूध देने वाली गाय के समान है जो हमेशा मनुष्य को ज्ञान देती रहती है।
ज्ञान
शिक्षा एक गुप्त धन के समान है इसलिए शिक्षा को अवश्य प्राप्त करो।
ज्ञान
जिस आदमी को पढ़ने का शौक होता है वह मूर्ख नहीं रहता है।
ज्ञान
जिनकी बुद्धि शास्त्र के अनुसार चलती है वे सम्यग्दृष्टि हैं और जो अपनी बुद्धि के अनुसार शास्त्र को चलाते हैं वे मिथ्यादृष्टि है।
धर्म
स्वाध्याय से ज्ञान की वृद्धि होती है, ज्ञानवृद्धि होने से वैराग्य बढ़ता है, वैराग्य बढ़ने से संसार का त्याग होता है और संसार त्याग से जीव मोक्ष (सिद्धि) प्राप्त करता है।
ज्ञान
काम से अधिक बुरा कोई रोग नहीं है और ज्ञान के समान कोई विश्वसनीय मित्र नहीं है।
ज्ञान
धन की रक्षा तुम्हें करना पड़ती है, मगर ज्ञान तुम्हारी रक्षा करता है।
ज्ञान
जीवन के कुरुक्षेत्र को जीतने के लिए पुस्तकों से बेहतर कोई अस्त्र नहीं है।
ज्ञान
अज्ञान के अतिरिक्त आत्मा के और किसी रोग का मुझे पता नहीं है।
ज्ञान
अनुकरण से मुक्ति नहीं मिलती, मुक्ति मिलती है ज्ञान से।
ज्ञान
विचार का चिराग बुझ जाने से आचार अंधा हो जाता है।
ज्ञान
अज्ञान विष वृक्ष है अज्ञानी पर ही विपत्ती आती है और वही दुःख पाता है।
ज्ञान
अज्ञान की सन्तान मोह और मोह की सन्तान दुःख है।
ज्ञान
अज्ञानी मनुष्य का तो जीवन ही व्यर्थ है।
ज्ञान
विद्या के सामने दूसरी तरह की दौलत कुछ भी नहीं है।
ज्ञान
जिसके पास विद्या रूपी नेत्र नहीं है वह अंधे के समान हैं।
ज्ञान
मानव का सच्चा जीवन साथी विद्या है, जिसके कारण वह विद्वान् कहलाता है।
ज्ञान
ज्ञान मुक्त करता है, पर ज्ञान का अभिमान नरकों में ले जाता है।
ज्ञान
विद्या और धन का महत्त्व सदुपयोग करने में है, संचय करने में उतना नहीं।
ज्ञान
काव्य का ध्येय मनोरंजन न होकर संवर्धन और राष्ट्र निर्माण होना चाहिए।
ज्ञान
काव्य वही है जो मानव हृदय को काबू में कर ले।
ज्ञान
वही काव्य और वही साहित्य चिरंजीवी रहेगा, जिसे लोग सुगमता से पा सकेंगे, जिसे लोग आसानी से पचा सकेंगे।
ज्ञान
'पुस्तकें' ज्ञान-प्रसार के लिए अमूल्य और सुगम साधन हैं।
ज्ञान
जीवन की सार्थकता भोग में नहीं है, उसकी सार्थकता अनुभव के द्वारा ज्ञान हासिल करने में है।
ज्ञान
सुनने की इच्छा का अभाव, सेवा का अभाव, उतावलापन और आत्म-प्रशंसा; ये चार विद्या के शत्रु हैं।
ज्ञान
विद्या से अलंकृत होने पर भी दुष्ट त्याज्य है, जैसे मणि से भूषित भयंकर सर्प।
संगति
किसी भी दोष का ज्ञान न होना ही सबसे बड़ा दोष है।
विवेक
उस मानव का ज्ञान निन्द्य है, जिसकी चित्तवृत्ति विद्या के गर्व से दूषित है।
विनम्रता
अतीत के महापुरुषों के जीवन से अपरिचित रहना जीवनभर निरंतर बाल्यावस्था में रहना है।
ज्ञान
जिन वचन महापुण्य के उदय से मिलते हैं व उनके रहस्य का ज्ञान महापुरुषार्थ से होता है।
धर्म
अच्छी पुस्तकें सदैव अच्छे मित्र हैं।
ज्ञान
विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र हैं।
ज्ञान
पुस्तकें मन के लिए साबुन का कार्य करती हैं।
ज्ञान
गंदी पुस्तकों का पढ़ना विष पीने के समान है।
ज्ञान
मैं नरक में भी अच्छी पुस्तकों का स्वागत करूँगा क्योंकि उनमें वह शक्ति है कि जहाँ होंगी वहीं स्वर्ग बन जाएगा।
ज्ञान
विकृत भोजन से जैसे शरीर रुग्ण हो जाता है, उसी तरह विकृत साहित्य से मस्तिष्क भी विकारग्रस्त होकर रुग्ण हो जाता है।
ज्ञान
वचन से बढ़कर लेख को प्रमाण माना जाता है क्योंकि लेख की प्रमाणिकता होती है, वचन तो भले ही बृहस्पति के द्वारा ही क्यों न कहे गये हो फिर भी प्रतिष्ठा नहीं होती है। ज्ञान राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।
ज्ञान