Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 61

सच्चा जीवन साथी ज्ञान है

107 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

जिस प्रकार शरीर का खाद्य भोजनीय पदार्थ है, उसी प्रकार मस्तिष्क का खाद्य साहित्य है।
ज्ञान
पुस्तकें विश्वस्त दर्पण हैं, जो विद्वानों के मस्तिष्क का परावर्तन हमारे मस्तिष्क पर करती हैं।
ज्ञान
जो पुस्तकें हमें सबसे अधिक सोचने के लिए विवश करती हैं वे हमारी सबसे बड़ी सहायक हैं।
ज्ञान
जिसे शास्त्र (पुस्तक) पढ़ने का शौक है वह सब जगह सुखी रह सकता है।
ज्ञान
शास्त्र (पुस्तक) समय के विशाल समुद्र में प्रकाश स्तंभ के समान हैं।
ज्ञान
आज के लिए और सदा के लिए पुस्तक सबसे बड़ी मित्र है।
ज्ञान
पुस्तक का एक सद्विचार आपको युगपत गुणों का, सुगंध का, ज्ञान का और आत्मा का अमरत्व प्रदान करता है।
ज्ञान
अपनी ही पूजा कराने में खोए हुए लोग मन के अंधे और हृदय के बहरे होते हैं।
विनम्रता
संसार में लाखों ईसा, मुहम्मद, बुद्ध, महावीर या राम जन्म लें तो भी तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकते, जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने के लिए कटिबद्ध नहीं होते, तब तक तुम्हारा कोई उद्धार नहीं कर सकता इसलिए दूसरों का भरोसा मत करो।
ज्ञान
जैसे अंधे प्राणी के लिए संसार अंधकारमय है और आँखों वाले के लिए प्रकाशमय वैसे ही अज्ञानी के लिए यह संसार दुःखों का समूह है और ज्ञानी के लिए आनंदमय है।
ज्ञान
एक-एक क्षण का सदुपयोग कर विद्या का और एक-एक कण की सुरक्षा कर धन का संचय करना चाहिए क्योंकि क्षण का त्याग करने से विद्या कैसे प्राप्त हो सकती है और कण का त्याग करने पर धन कैसे प्राप्त हो सकता है ?
समय
अज्ञानी का वैराग्य धारण करना, तपस्वी का काम सेवन करना, दरिद्र का श्रृंगार करना, नौकर का आज्ञाकारी न होना ये किसके लिए सिर दर्द नहीं होता अर्थात् सभी को दुःख जनक होता है।
विवेक
जिसमें बुद्धि नहीं है, उसको बिना सींग का पशु समझना चाहिए।
ज्ञान
आप जितने बुद्धिमान होंगे उतनी ही आपको अधिक सन्तुष्टि मिलेगी।
संतोष
ज्ञानी पुरुषों को ही इस संसार में भय नहीं होता है।
ज्ञान
जिसका मन धर्मशास्त्र सुनने में सदा लालसायुक्त रहता है, वही इस जगत् में परमार्थ को अच्छी तरह जानता है, अन्य नहीं।
धर्म
मस्तिष्क के लिए अध्ययन की उतनी ही आवश्यकता है जितनी शरीर को व्यायाम की।
ज्ञान
चाहे सैकड़ों सूर्य उदित हों, चाहे सैकड़ों चंद्रमा अंतःकरण का अंधकार विद्वानों के वचनों के बिना नष्ट नहीं होता है।
ज्ञान
विद्वान् अकल का थोक विक्रेता होता है।
ज्ञान
सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ? विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ? सुख की चाह हो तो विद्या छोड़ दे और विद्या की चाह हो तो सुख का त्याग करें।
ज्ञान
विद्यावान व्यक्ति का सम्मान धनवान और चरित्रवान भी करते हैं।
ज्ञान
विद्या से युक्त व्यक्ति को कोई मूर्ख नहीं बना सकता है।
ज्ञान
विद्या विधाता से मिलन का सर्वश्रेष्ठ विधान है।
ज्ञान
जिसके पास विद्या है उसके पास कुछ न होकर भी सब कुछ है।
ज्ञान
जिस नई बात या ज्ञान का पता विद्यार्थियों को चले, तो उसे वह अपनी मातृभाषा में लिख लें और भविष्य में यथा समय और यथा अवसर पर उसका उपयोग करें।
ज्ञान
विद्यार्थी को तो आलस्य छूना ही नहीं चाहिए।
पुरुषार्थ
विद्वान् होकर शांत रहना, कल्याण कारी है।
ज्ञान
वह सभा वनस्थली है जिसमें विद्वान् नहीं हैं।
ज्ञान
समाचारपत्र साधारण जनता के शिक्षक हैं।
ज्ञान
सम्यग्ज्ञान से बढ़कर प्रकाश और अज्ञान से बढ़कर अंधकार कोई नहीं है।
ज्ञान
सुख के लिए सामग्री नहीं संतोष चाहिए और संतोष भी तत्त्व ज्ञान बिना संभव नहीं है।
संतोष
सम्यग्ज्ञान की अंतिम मंजिल मोक्ष है।
ज्ञान
आध्यात्मिक जीवन जीने की कला है शास्त्र स्वाध्याय।
धर्म
स्वाध्याय ही प्रगति का द्वार है।
ज्ञान
शास्त्र स्वाध्याय शिवपुर पहुँचाने वाला वायुयान है।
धर्म
स्वाध्याय के बिना मानसिक विकास नहीं हो सकता है।
ज्ञान
स्वाध्याय से बढ़कर सज्जनों के लिए कोई अच्छी आदत नहीं हो सकती है।
ज्ञान
सिर्फ शास्त्र को पढ़ लेने से आत्मा पवित्र नहीं होती है, जैसे सन्दूक में साबुन बन्द रखने से कपड़ा साफ नहीं होता है, अतः जैसे साबुन का प्रयोग करना अनिवार्य है वैसे ही शास्त्रों के सूत्रों को आचरण में उतारना अनिवार्य होता है।
धर्म
नीति और सिद्धान्तों का अनुग्रहण और अनुपालन शास्त्रों के स्वाध्याय बिना असम्भव है।
धर्म
ज्ञान का मूल्य बहुमूल्य रत्न से भी अधिक है ज्ञान का निरादर अपने ही मस्तिष्क का अपमान है।
ज्ञान
सच्चे ज्ञान की एकमात्र पहचान है सिखाने की शक्ति।
ज्ञान
सच्चा ज्ञान वही है, जो आपको अहित से रोके और कष्टों में भी मुस्कुराहट पैदा करा दे। ज्ञान का मद ही अज्ञान का प्रदर्शन है।
ज्ञान
ज्ञान के साथ चरित्र अमृत का पान है और ज्ञान के साथ भोग विष के सामन हैं।
ज्ञान
कोरा चरित्र खतरनाक नहीं होता है, कोरा ज्ञान खतरनाक होता है।
ज्ञान
ज्ञान से वैराग्य की रक्षा करो तथा ध्यान से आत्मा की शुद्धि करो।
ध्यान
सच्चा ज्ञान त्याग कराता है और सत्संग की प्यास जगाता है।
ज्ञान
सम्यग्ज्ञान पदार्थों को छोड़ने की बात करता है।
ज्ञान