Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 41

दाम करे सब काम

17 सूत्र

निर्माल्य को (देव-शास्त्र-गुरु के द्रव्य को) जो स्वीकृत करता है वह वंशच्छेद को प्राप्त कर बाद में दुर्गति को प्राप्त करता है।
कर्म
प्राणों का परित्याग करना अच्छा है परन्तु व्रतादि का भंग करना श्रेष्ठ नहीं है, गुरु तथा देव की आज्ञा का लोप करने से यह जीव नरक एवं तिर्यञ्च गति को प्राप्त होता है।
धर्म
धर्म-धर्मात्मा का सदा पक्ष लेना चाहिए।
धर्म
जो पुरुष मनुष्य भव में समीचीन धर्म को छोड़कर संसार में उत्पन्न सुख को भोगता है वह अमृत को छोड़कर महाविष को ग्रहण करता है।
धर्म
जो मनुष्य सहधर्मी भाई के साथ राग-द्वेष करते हैं, उन्हें दुष्ट अभिप्राय वाले महा निन्दनीय, मिथ्यादृष्टि अधम जानना चाहिए।
संगति
निंदा करना और सुनना दोनों पाप हैं।
वाणी
अपनी निंदा सहने वाला व्यक्ति मानों विश्व पर विजय प्राप्त कर लेता है।
विनम्रता
प्रत्येक कि निंदा सुनो किन्तु अपना फैसला गुप्त रखो।
विवेक
उपहास मृत्यु से अधिक कटु है।
वाणी
तुम चाहे गाय के लिए पानी ही क्यों न माँगो, फिर भी जिह्वा के लिए याचना सूचक शब्दों को उच्चारण करने से बढ़कर अपमान जनक बात और कोई नहीं है।
विनम्रता
पहले कपड़ों में गरीबी, आचरण में अमीरी होती थी, आज आचरण में गरीबी है, कपड़ों में अमीरी है।
चरित्र
मनुष्य तभी तक वास्तविक गुणों का घर है, बुद्धिमान, सज्जन, प्रिय, शूरवीर, चरित्रवान, कलंकरहित, स्वाभिमानी, कृतज्ञ, पंडित, चतुर, धर्मरत, शील गुण सहित और प्रतिष्ठा से युक्त रहता है जब तक निष्ठुर वज्रपात के समान 'देहि' याचना का वचन नहीं कहता है।
चरित्र
भीख माँगने से नहीं, लाभान्तराय के क्षयोपशम से मिलती है।
कर्म
संसार में मनुष्य की दरिद्रता ही मृत्यु है और धन ही आयु है।
धन
निर्धनता मनुष्य में चिंता उत्पन्न करती है, दूसरों से अपमान कराती है शत्रुता उत्पन्न करती है, मित्रों से घृणा का पात्र बनाती है और आत्मीय जनों से विरोध कराती है, निर्धन व्यक्ति की घर छोड़कर वन जाने की इच्छा होती है, उसे स्त्री से भी अपमान सहना पड़ता है, हृदय स्थित शोकाग्नि एक बार ही जला नहीं डालती अपितु संतप्त करती रहती है।
धन
गरीब वह नहीं है, जिसके पास कम है, बल्कि वह है जो अधिक चाहता है।
संतोष
सत्यानाशनी दरिद्रता इस जन्म के सुखों की तो शत्रु है ही, पर साथ ही साथ दूसरे जन्म के सुखोपभोग की भी घातक है।
धन