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जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संतोष

330 सूत्र · पृष्ठ 5 / 5

तीन थान सन्तोष कर, धन भोजन अरु दार। तीन तोष न कीजिये, दान पठन तपाचार।।
संतोष
प्रभु जी इतना दीजिये, जामे कुटुम्ब समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय।।
संतोष
आतम को हित है सुख, सो सुख आकुलता विन कहिये। विषयभोग धन बिन नहीं याते, धन ही धन उपजइये।।
संतोष
धर हिरदय सन्तोष करहु तपस्या देह सो। शौच सदा निर्दोष, धरम बड़ो संसार में।।
संतोष
गोधन गजधन बाजधन, और रतन धन–धान। जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूलि समान।।
संतोष
चाह गयी चिन्ता गयी, मनुआ बेपरवाह। जिन्हें कछु नहीं चाहिये, वे शाहन के शाह।।
संतोष
छोटी सी जिन्दगी बड़े–बड़े अरमान। पूरे न हो पायेंगे निकल जायेगें प्राण।।
संतोष
प्रत्येक प्राणी के हृदय में तृष्णा रूपी गड्ढा इतना बड़ा है, कि तीन लोक की सम्पत्ति एक प्राणी के गड्ढे में डाल दी जाए तो वह परमाणु के बराबर दिखेगी तब किसको क्या और कितना मिलेगा अतः विषयों की आशा व्यर्थ है।
संतोष
विना भाग्य के मत दौड़ो, मत दौड़ो, दौड़ना लक्ष्मी प्राप्ति का साधन नहीं है, यदि दौड़ने से लक्ष्मी मिलती तो फिर दौड़ने वाले कुत्ते को भी लक्ष्मी मिलना चाहिए।
संतोष
शरीर शिथिल हो गया है, बाल सफेद हो गए हैं, सारे दाँत गिर गए हैं, वृद्धावस्था आ गई है, हाथ में डण्डा ले रखा है फिर भी तृष्णा पीछा नहीं छोड़ती है।
संतोष
तृष्णा जीर्ण नहीं हुई हम ही जीर्ण हो गए, काल बीता नहीं हम ही बीत गए, भोग नहीं भोगे हम ही भुक्त हो गए, तप नहीं तपा हम ही सन्तप्त हुये।
संतोष
एक व्यापारी ने रायचन्द्र जी से हीरा– जवाहरात का सौदा तय किया, तब भाव गिर गया, व्यापारी अत्यन्त दुःखी होकर मरने लगा तब रायचन्द्र जी ने लोभ छोड़कर व्यापारी को बचाया, और उसका बयाना वापस कर दिया।
संतोष
एक सेठ अपनी सम्पत्ति का लेखा जोखा कर रहा था, तो सातपीढ़ी तक के लिए सम्पत्ति थी, पर आठवीं पीढ़ी की चिन्ता में सेठ मूर्च्छित हो गया, मूर्छा समाप्त होने पर किसी ने कहा कि अपने गाँव के ब्राह्मण को भोजन सामग्री दे आओ, तो तुम्हारी आठवीं पीढ़ी की चिन्ता समाप्त हो जायेगी, वह भोजन सामग्री देने गया, तो ब्राह्मण बोला की आज के लिए तो मेरे पास भोजन है, तो सेठ बोला कल के लिए काम आएगा, साधु ने कहा! कल पीठ पीछे है, कल के लिए सङ्ग्रह करना पाप है। तब सेठ की आँखें खुली, ये तो कल की चिन्ता नहीं करता और मैं आठवीं पीढ़ी की चिन्ता कर रहा हूँ।
संतोष
लोभी अपमान सहन करता है, कुछ मिलने की आशा हो तो गालियां भी सुनता है, वास्तव में सन्तोषी ही धनी है।
संतोष
फल से उदर पूर्ति सम्भव है, फूल से तृष्णा की प्यास बढ़ती है, संसारिक सुख फूल की गंध के समान तृष्णा बढ़ाता है और मोक्ष का सुख फल की तरह तृप्ति कारक है।
संतोष
जग के सारे पदार्थ यदि हमारी इच्छानुसार परिणमन करें तो हमें सुख हो पर ऐसा नहीं हो सकता, अपने शरीर तक को अपने अनूकूल नहीं परिणमा सकते तो पर को अपने अनुकूल कैसे परिणमा सकते हैं?
संतोष
सुख साधनों से नहीं साधना से मिलता है।
संतोष
आशा गर्त को भरने का एक ही उपाय 'त्याग' है।
संतोष
हे धान के पौधे! मैं छोटा हूँ ऐसा मानकर तू खेद-खिन्न क्यों होता है? सारा जगत तेरी बदौलत ही जीवित है इसलिए समस्त भू-भाग पर तू ही धन्य है, यहाँ पर धान्य के पौधे के माध्यम से अल्प धनवान को समझाया गया है कि हे भाई मेरे पास कम धन है ऐसा मानकर तू क्यों दुःखी होता है? क्योंकि जितना भी है तेरा धन दूसरों के काम तो आता है, इसलिए पृथ्वी पर तू धन्य है, अर्थात् जिनका तन-मन-धन किसी के काम नहीं आता उनसे तो तू अच्छा है।
संतोष
जिसके पास कुछ भी नहीं है, जितेन्द्रिय है, शान्त है, समता धारी है, सदा सन्तुष्ट रहता है उसके लिए सभी दिशाएं सुखकारी हैं।
संतोष
तृष्णा की खाई खूब भरी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही।
संतोष
नींद हराम- एक व्यक्ति ने मन्त्र जाप किया, विद्या सिद्ध हो गयी, विद्या ने कहा जो चाहो सो माँग लो, तो उसने कहा कल माँगेंगे, घर जाकर रात भर सोचता रहा घर, नौकर धन, या स्वयं तहसील दार, कलेक्टर, मुख्यमन्त्री या प्रधान मन्त्री क्या माँगे? रात भर सोचता रहा सो नहीं सका, सुबह विद्या से कहा कि अभी धन हमारे पास आया नहीं, तब नींद उड़ गयी, आने पर क्या होगा, इसलिए उसने कहा हमें कुछ नहीं चाहिए।
संतोष
छछ पीकर घी जोड़ा- श्मश्रु नवनीत ने पहले धनार्जन किया, चोरों ने लूट लिया, गरीब हो गया, तो ग्वालों के यहाँ रहने लगा, वहाँ से मठा लाता था पीकर दिन निकालता, मूँछों में जो नवनीत लग जाता उसको निकाल कर इकट्ठा कर लेता था, कुछ महिनों में एक मटकी भरली और आशा के महल बनाने लगा, कि व्यापार करते-करते राजा चक्रवर्ती आदि बनूंगा, रानियाँ पैर दबायेंगी तो मैं कहूँगा तुमसे पैर दबाते नहीं बनता, और पैर छुड़ा लूँगा, उसने सपने में पैर झटकारा जैसे ही पैर मटकी में लगा, नवनीत अग्नि में गिरा, आग भड़की घास की झोपड़ी जल गयी और वह जल कर मर गया।
संतोष
झगड़े और दुःख भी फ्री में नहीं आते, इन को भी संसारी प्राणी पैसे देकर खरीदता है, जैसे टी.वी. पर अलग-अलग चैनल देखने के लिए बच्चे झगड़ते हैं, मोबाइल की वजह से शान्ति से नहीं बैठ पाते, प्रत्येक बच्चे को अलग-अलग गाड़ी चाहिए एवं गाड़ी रखने की समस्या आदि।
संतोष
पेट और पाप से दुनिया परेशान है, हर वस्तु पर 'कर' है, पर पेट और पाप पर कोई 'कर' नहीं है, यदि 'कर' लगने लगे, तो स्वास्थ और अर्थ व्यवस्था स्वयं सुधर जायेगी।
संतोष
ट्यूब में हवा एक सीमा तक भरी जाती है, अधिक होने पर ट्यूब फट जाता है, इसी प्रकार धन की सीमा होना जरूरी है अन्यथा नरक की ही तैयारी होती है।
संतोष
दिगम्बर साधु लोभ का नाश करने के लिए सन्तोष को, सुख-शान्ति के लिए धैर्य को और उत्तम तप की वृद्धि के लिए ज्ञान को धारण करते हैं।
संतोष
श्रावक का साधु के कमण्डलु की भांति आय का श्रोत बड़ा एवं टोंटी की भांति व्यय का श्रोत छोटा होना चाहिए तभी गृहस्थ जीवन धर्ममय हो सकता है।
संतोष
इच्छाओं का अभाव ही शान्ति का मार्ग है।
संतोष
सन्तोषी- पण्डित गोपालदास जी धर्म प्रचार के लिये जाते थे, तो समाज से भेंट या परिश्रम नहीं लेते थे, मात्र मार्ग व्यय लेते थे, उसमें भी ज्यादा आ जाता तो मनि ऑर्डर से वापस कर देते थे।
संतोष