Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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संतोष

330 सूत्र · पृष्ठ 4 / 5

जीवन में छोटी-छोटी बातों से आनंद लेना चाहिए क्योंकि बड़ी-बड़ी बातें तो कुछ ही होती हैं।
संतोष
जिसका पुत्र आज्ञाकारी हो, जिसकी पत्नी उसकी इच्छा के अनुरूप व्यवहार करती हो और जिसे अपने धन पर सन्तोष हो, वह व्यक्ति सबसे सुखी है। सुखी होना है तो पर का कर्त्तापन छोड़ दें।
संतोष
शान्ति चाहिए तो अपने काम से काम रखें एवं लोक प्रियता से बचें।
संतोष
वह व्यक्ति बुद्धिमान है, जो उन वस्तुओं के लिए दुःखी नहीं होता, जो उसके पास नहीं है, बल्कि उनसे प्रसन्न होता है जो उसके पास है।
संतोष
दिनों के फेर से तु खट्टा होकर मत बैठ क्योंकि संतोष रूपी अमृत से संतुष्ट मनुष्य के लिए सतत् सुख और शान्ति के द्वार खुले रहते हैं एवं सतोष स्वर्ग प्राप्ति से बढ़कर है।
संतोष
चाहे राजा हो या किसान, जो अपने घर में शान्ति पाता है वही सबसे सुखी है।
संतोष
सुख संतोष में मिलता है विलासता में कभी नहीं मिल सकता है।
संतोष
आवश्यकताएँ सीमित किन्तु आकांक्षाएँ असीमित होती हैं।
संतोष
संसार में खुश रहने के लिए एक ही उपाय है अपनी आवश्यकताओं को कम रखें।
संतोष
आदमी की आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो सकती है, परन्तु आकांक्षाओं की नहीं।
संतोष
गरीब वह है जिसका खर्च आमदनी से ज्यादा है।
संतोष
इच्छा से पहले संतोष नहीं है अन्यथा इच्छा ही क्यों होती है? इच्छा के समय भी संतोष नहीं अन्यथा संतप्त क्यों होता? इच्छा के बाद भी संतोष नहीं अन्यथा चेष्टा करके व्याकुल नहीं होता, इच्छा के पूर्व, वर्तमान व भावी तीनों रूप दुःखदायी है, अतः इच्छा त्यागो।
संतोष
सुखी रहने के लिए हमें अपनी जरूरतों को रेखांकित करना होगा और जो है उसमें संतोष करना होगा।
संतोष
सुख परिग्रह के बाहुल्य में नहीं, हृदय की विशालता से बढ़ता है।
संतोष
अगर सेवक सुख चाहें, भिखारी मान चाहें, व्यसनी धन की इच्छा करें, व्यभिचारी शुभ गति चाहें, लोभी यश चाहें तो समझो कि ये लोग आकाश से दूध दुहना चाह रहे हैं।
संतोष
आपके दु:खों का कारण संसार में रहकर सुख की माँग है।
संतोष
याचना करने वाला कौन व्यक्ति लघु नहीं गिना जाता? अर्थात् सभी।
संतोष
जैसे ही हम माँगते हैं हमारा हृदय सिकुड़ जाता है और चेतना के द्वार तत्काल बंद हो जाते हैं।
संतोष
गरीबी कुछ ही चीजें माँगती है, विलासता बहुत-सी किन्तु मोह समस्त चीजें चाहता है।
संतोष
कामना का सर्वदा त्याग कर दें, तो आवश्यक वस्तुएँ स्वत: प्राप्त होंगी क्योंकि वस्तुएँ निष्काम पुरुषों के पास आने के लिए लालायित रहती हैं।
संतोष
जो मुनि तप चारित्र सद्गुणों के द्वारा मेरु के समान गुरुत्व को प्राप्त हुआ है वह भी याचना के द्वारा आक की रूई के समान लघु हो जाता है।
संतोष
वस्तुयें ऐसी इस्तेमाल करें जो कम दाम की हों, पूरे काम की हों और होने का अभिमान न हो और खोने का भय न हो।
संतोष
जहाँ समुद्रों का पानी पीने से प्यास नहीं बुझी, तो क्या ओस की बूँद चाटने से बुझ सकती है? स्वर्ग के सुख से सुखी नहीं हुये तब मनुष्य पर्याय के भोगों से कैसे सुखी होंगे?
संतोष
सब वचनों में 'देदो' वचन कष्ट देने वाला है, 'नहीं है' यह वचन उससे भी अधिक कष्ट देने वाला है, 'लेलो' यह वचन सब वचनों में राजा है और 'नहीं चाहिए' यह वचन सब वचनों में राजाधिराज है।
संतोष
दूसरों की सन्तुष्टि से पहले आत्म सन्तुष्टि होना चाहिए- ध्यान रखिये आपके लिए यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि आप अपने सम्बन्ध में क्या विचार रखते हैं, बजाय इसके कि दूसरे आपके सम्बन्ध में क्या विचार रखते हैं, आपके बारे में दूसरे का निर्णय आवश्यक नहीं कि सही हो, क्योंकि निर्णय उसके मानसिक स्तर के अनुसार होता है, इसकी चिन्ता किये विना कि दूसरे आप के बारे में क्या विचार रखते हैं, सदा सरल-सुन्दर जीवन शैली से जीवन जीते हुए अपनी स्वभाविक स्थिति में रहिए और दूसरों को कृत्रिम रूप से प्रभावित करने का प्रयत्न मत कीजिए, आप जो नहीं है वैसा दिखाने का प्रयत्न करना मानसिक तनाव का सबसे बड़ा कारण होता है।
संतोष
महापुराणों के ज्ञाता सत्पुरुष प्रिय पदार्थ के चले जाने पर विषाद नहीं करते हैं और आ जाने पर हर्ष नहीं करते हैं क्योंकि ज्ञान का फल सन्तोष है।
संतोष
जो होने वाला है वह होता ही है और जो नहीं होने वाला है वह नहीं होता है, इस प्रकार की निश्चित बुद्धि वाले मनुष्यों को चिन्ता कहीं बाधा नहीं पहुँचाती है।
संतोष
संसारी प्राणी ने जगत में नारायण, प्रतिनारायण, चक्रवर्ती, सौधर्में न्द्रादि दक्षिणेन्द्र पद, लोकपाल, सौधर्मेन्द्र की शची, पञ्चानुत्तरवासी देव और लौकन्तिकदेव के सुखों को प्राप्त नहीं किया, बाकी सब सुख प्राप्त किये हैं।
संतोष
लालच छोड़िये- हर वस्तु आपके लिए नहीं है, दूसरों का भी ख्याल रखिये।
संतोष
कूड़े-करकट को फेंकते रहिए, एक अन्दर और एक बाहर का फार्मूला घर को साफ रखता है, एक नयी वस्तु लाओ तो पुरानी वस्तु बाहर कर दो। कुछ भी बरबाद न कीजिए कपडा, पानी, कागज, बिजली आदि।
संतोष
दूसरों को प्रभावित करने के चक्कर में मत पड़िए- दूसरों को प्रभावित करने के प्रयत्न और उससे खुशी पाने के चक्कर में आप अपनी प्रसन्नता की कुञ्जी अपरोक्ष रूप से दूसरों को सौंप देते हैं। कोई भी कार्य मुख्य रूप से आत्म सन्तोष पाने की दृष्टि से करना चाहिए। दूसरों की सराहना का इन्तजार नहीं करना चाहिए।
संतोष
प्रत्येक क्षण का आनन्द लीजिए- कुछ लोग बाद में सुखी रहने के लिए पहले संघर्ष करते हैं, पर शायद वह क्षण आये ही न, अतः प्रत्येक कार्य में आनन्द लीजिए, आनन्द मन में है अतः वस्तुओं के न होने पर भी सुखी रहिए।
संतोष
सुखी होने के दस उपाय- 1.अनावश्यक चीजें न खरीदें, 2.कभी-कभी न बोलना भी सीखें, 3.सबकी राय से निर्णय लें, 4.अपनी गलती स्वीकारें, 5.सम्मान से बुलावें, 6.सदैव व्यस्त रहें, 7.पहले लिखें बाद में उधार दें, 8.व्यवहारिक बनें, 9.सोचें फिर बोलें, 10.बहुत कम बोलें।
संतोष
तुलना न करें- आपके पास जो है, उससे अधिकतम सन्तोष पाने का प्रयत्न कीजिए, इस परिवर्तनशील संसार में एक के बाद एक बढ़िया और आकर्षक चीजें आती रहेंगी उनका कोई अन्त नहीं है।
संतोष
व्यक्ति के पास नब्बे रुपये हैं, तो दस रुपये का आभाव खटकता है, सौ रुपये के चक्कर में रहता है, नब्बे रुपये का सुख नहीं भोग पाता है।
संतोष
मन तो भिखारी का पात्र है जो कभी भरता ही नहीं है।
संतोष
जो आशा के दास हैं वे समस्त संसार के दास हैं, इसके विपरीत आशा जिनकी दासी है समस्त संसार उनका दास है।
संतोष
क्रोध यमराज है, तृष्णा नरक की वैतरणी नदी की तरह दुखदाई है, विद्या कामधेनु गाय है और सन्तोष इन्द्र का नन्दनवन है।
संतोष
उदार बनो उड़ाऊ न बनो अर्थात् बर्बाद करने वाले नहीं, 'आय के अनुसार होगा व्यय, तो कभी न होगा क्षय'।
संतोष
जीवन में सुखी होने के लिये दूसरों से तुलना करना और दूसरों से अपेक्षा रखना छोड़ें।
संतोष
अपेक्षा हर सुख की मिठास को फीका कर देती है।
संतोष
निर्लोभी व्यक्ति का सिर सदा ऊँचा रहता है, स्वभाव की नीचता वर्षों में भी मालूम नहीं होती है।
संतोष
सन्तोष स्वभाविक धन है, विलासता कृत्रिम दरिद्रता है सफलता संयोग से नहीं समर्पण से मिलती है।
संतोष
हम रोते हैं कि हमारे पास जूते नहीं हैं, जरा उनके बारे में सोचो जिसके पास पैर ही नहीं हैं।
संतोष
यदि तुम आय से कम में निर्वाह कर सकते हो, तो सोना बनाने का पत्थर तुम्हारे पास है।
संतोष
अपनी आँख करोड़ों में नहीं दोगे फिर गरीब कैसे हो?
संतोष
आकाङ्क्षा, कम करो, उपलब्धियाँ बढ़ जाएँगी।
संतोष
आवश्यकता से ज्यादा सङ्ग्रह और उपयोगिता से ज्यादा आकांक्षा जीवन और जीविका के बीच असन्तुलन पैदा करते हैं।
संतोष
जो असुर और सुरेन्द्रों के भोगों से तृप्त नहीं हुआ वह मनुष्यों के अल्प भोगों से किस प्रकार तृप्त हो सकता है? समुद्र का जल पीने से जो सन्तुष्ट नहीं हो सका, वह तृण के अग्रभाग पर स्थित पानी के पीने से क्या तृप्त हो सकता है?
संतोष
जिसे सोने के लिये गोली नहीं खाना पड़ती हो और उठने के लिये अलार्म की जरूरत नहीं पड़ती हो वह सबसे सुखी आदमी है।
संतोष
जहाँ आज तक सन्तोष नहीं मिला अज्ञानी प्राणी वहीं खोज रहा है।
संतोष
आशा का गड्ढा सन्तोष रूपी जल से भरेगा, विश्व की सम्पदा से नहीं।
संतोष
अधिक लालच कष्टों को आमन्त्रित करता है।
संतोष
दुर्भाग्य पर आँसू बहाकर अपने को दीन हीन न बनायें।
संतोष
क्या आप अपना खाना विना शिकायत के चुपचाप खा लेते हैं?
संतोष
क्या कभी आप अपने को अकेलेपन में खुश रख लेते हैं?
संतोष
क्या आप धन या अधिकार की तृष्णा से रहित हैं?
संतोष
जो चाहत दुःख से बचे, करो न पर की चाह। पर पदार्थ की चाह से, मिटे न मन की दाह।।
संतोष
पहले आदमी जङ्गली था, तब कन्दमूल खाता था, फिर थोड़ा समझदार हुआ तो अन्न खाने लगा, और आधुनिक हुआ तो रुपया कमाने लगा, ध्यान रखना पेट रुपयों से नहीं रोटी से भरेगा।
संतोष
लोभी और मात्सर्य- एक व्यक्ति पर देवी प्रसन्न हो गयी, प्रकट होकर बोली जो मांगना हो मांग लो, जो माँगोगे उससे दूना नहीं माँगने वाले पड़ोसी को मिलेगा, पहले अब कौन मांगे, जो माँगे वो घाटे में, ईर्ष्यालु बोला मेरी एक आँख फूट जाय, और मेरे आँगन में एक कुँआ खुद जाय, विना माँगने वाले की दोनों आँखें फूट गयी, दो कुआं खुद गये, बेचारा अन्धा कुए में गिर कर मर गया, दूसरों को दुःखी करने से हम दुःख उठाते हैं।
संतोष
दुनिया कुछ अच्छी दिख रही है तो इसका श्रेय पढ़े लिखे लोगों को नहीं प्रसन्न लोगों को जाता है।
संतोष
देवरानी जिठानी को पन्द्रह लड्डुओं ने श्मशान तक भेज दिया- एक बार देवरानी जिठानी ने पन्द्रह लड्डू बनाये, उनमें से एक को सात एक को आठ मिल रहे थे, उनमें से कोई सात लड्डू लेने को तैयार नहीं था तब निर्णय लिया, कि कल जो सुबह पहले उठकर मौन खोलेगा वह सात लड्डू लेगा दूसरे दिन दोनो नहीं उठीं, लोगों ने सोचा की दोनों मर गई, तब एक ही अर्थी पर दोनों को श्मशान ले गये, जैसे ही आग लगाने को तैयार हुए तब एक बोली 'तू आठ खा लेना हम सात खा लेंगे' जो लोग जलाने ले गये थे वे भी पन्द्रह लोग थे, लोगों ने समझा की दोनों मरकर डाकिनी-शाकिनी बन गयी हैं अतः हम लोगों को खाने को कह रहीं हैं, इसलिए लोग भागे, पीछे-पीछे दोनों भाग रहीं थीं, सारे नगर में अशान्ति फैल गयी, लोगों को वास्तविकता का पता चलने पर दोनों बहुत शर्मिन्दा हुईं।
संतोष
अप्रसिद्धि में बड़ा ही आराम है, अपनी ही सुबह अपनी ही शाम है। प्रसिद्धि में मिलता नहीं आराम है, होती कहीं सुबह और होती कहीं शाम है।।
संतोष
सोने को देख कर मन तो भर सकता है, पर पेट नहीं।
संतोष
सन्तोष रूपी जल से जो लोभ रूपी मल को धोता है और भोजन में लालसा रहित होता है, वह शौचधर्म को प्राप्त होता है।
संतोष
तृष्णा की खाई खूब भरी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही।
संतोष
गरीबी नहीं, तृष्णा दुष्कर्मों की जननी है।
संतोष
जो दस बीस पचास भये, शत लक्ष करोड़ की चाह लगेगी, अरब खरब लो उदय भये तो, धरापति होने की आश लगेगी। उदय अस्त तक राज्य भयो, पर तृष्णा और ही ओर बढ़ेगी, सुन्दर एक सन्तोष विना नर, तेरी तो भूख कबहुँ न मिटेगी।।
संतोष
जीवन की विसङ्गति को नियंत्रित करना चाहते हो तो लोभ को नियन्त्रित करो।
संतोष
सन्तोष ही उन्नत धन है।
संतोष
पेट भर सकता है, पेटी नहीं।
संतोष
लाभ के बाद लोभ होता हैं, इसलिए सन्तोष रुपी अमृत का पान करना चाहिए।
संतोष
समय से पहले किस्मत से ज्यादा किसी को नहीं मिलता हैं।
संतोष
लोभ की तासीर आशाओं के बढ़ाने की होती है।
संतोष
काया तो बूढ़ी भई, तृष्णा भयी जवान। ऐसे में कैसे बने, निज आतम कल्याण।।
संतोष