Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 3 / 15

आदर्शों की होली जलाकर दूसरों की कृपा पर जीना तथा स्वार्थ के लिए अन्याय से समझौता करना चापलूसी है।
चरित्र
ज्ञान बिना भी चरित्र पूज्य और हितकारी है।
चरित्र
सभी मेहमानों में से किसी को देखकर, किसी को मुस्कुराकर, किसी को हँसकर और किसी को सम्मान/भेंट देकर प्रसन्न किया जाता है।
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व्यसनी व्यक्ति को व्यसनों की तृप्ति के लिए अत्यधिक धन की आवश्यकता पड़ती है जिससे वह अन्याय, अनीति और अधर्म से धनोपार्जन करता है।
चरित्र
जुआरी; धनहीन, वस्त्रहीन, भाग्यहीन, कुबुद्धि और धर्म से रहित देखे जाते हैं।
चरित्र
बुद्धिमान व्यक्तियों की प्रशंसा की जाती है, धनवान से ईर्ष्या की जाती है बलशाली व्यक्तियों से डरा जाता है लेकिन विश्वास सिर्फ चारित्रवान व्यक्तियों पर ही किया जाता है।
चरित्र
मीठे शब्दों पर नहीं अच्छे आचरण पर विश्वास करो।
चरित्र
चंदन की अपेक्षा वंदन शीतल होता है, भोगी होने की बजाय उपयोगी होना ज्यादा अच्छा है।
चरित्र
'प्रभाव' अच्छा होने की बजाय 'स्वभाव' अच्छा होना ज्यादा अच्छा है।
चरित्र
वस्त्र, धन, भोजन, यश और विद्या; ये पाँच जुए में हाथ डालने वाले के पास नहीं आयेंगे।
चरित्र
समृद्धि के क्षणों में पिच्छी जैसी मृदुता और विपत्ति के क्षणों में कमण्डलु जैसी कठोरता होनी चाहिए, मयूर-पिच्छी को देखकर जिसका मन मयूर नाच उठे कमण्डलु को देखकर आभामण्डल चमक उठे वही श्रावक है।
चरित्र
माना दुनिया बुरी है पर आपको अच्छा बनने से किसने रोका है।
चरित्र
बुरी आदतें अगर वक्त पर न बदली जायें तो वे आपका वक्त बदल देंगी।
चरित्र
इंसान चेहरा तो साफ रखता है जिस पर लोगों की नजर रहती है, पर दिल को साफ नहीं रखता जिस पर ऊपर वाले की नजर रहती है।
चरित्र
जमीं पर मकान बनाना सरल, दूसरे के दिल में जगह बनाने में जिन्दगी गुजर जाती है।
चरित्र
स्त्री आलिंगन किसी अन्य का करती है, वचन से किसी अन्य को बहलाती है, किसी अन्य को देखती है, किसी अन्य के कारण रोती है, किसी अन्य को शपथों द्वारा अभिप्राय प्रकट करती है, किसी को वरती है, किसी अन्य के साथ शयन करती है, शयन को प्राप्त होकर भी किसी अन्य का चिंतन करती हैं।
चरित्र
प्रसन्न मुख, निर्मल दृष्टि, वार्तालाप में प्रीति, मधुर वाणी स्नेह का अधिक प्रकट होना तथा आदरपूर्वक देखना ये सदा अनुराग रखने वाले पुरुष के चिह्न हैं।
चरित्र
यदि आपको किसी एक से शिकायत है तो उससे कहिए, यदि अधिकतर या सभी लोगों से शिकायत है तो अपने आपसे कहिए और यदि किसी से भी शिकायत नहीं है तो शायद आप सन्त हैं।
चरित्र
सहज, सरल, मृदु, विनयी, सदाचार ही सच्चे संत के गुण हैं।
चरित्र
संत वही है जिसे देखकर असंत की दुर्जनता पलायन कर जाये।
चरित्र
दो ही पुरुष अपने विपरीत कर्म के कारण शोभा नहीं पाते–अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपंच में लगा हुआ संन्यासी।
चरित्र
दोष का प्रायश्चित्त, उन्नति मार्ग में ही लग जाना है।
चरित्र
फूलों की सुगंध केवल एक दिशा में फैलती है लेकिन एक व्यक्ति की अच्छाई हर दिशा में फैलती है।
चरित्र
हमें सुबह उठकर चेहरे पर मुस्कान रखनी है क्योंकि शीशे में स्वयं के मुरझाये चेहरे को देखने से अपशकुन हो जाता है। प्रतिदिन आधा घंटा योगासन, प्रार्थना, ध्यान करें, अपना घर, कार्यालय स्वच्छ, साफ रखें। अच्छा दिमाग और दिल ये दोनों विजय दिलाते हैं।
चरित्र
अगर आपका व्यवहार अच्छा है तो आप लोगों के दिल में उतरेंगे अन्यथा दिल से उतर जायेंगे।
चरित्र
हमेशा हर कार्य के लिए अपनी जवाबदारी समझें और मौजूदगी दर्ज करायें।
चरित्र
ऐसी बात जिसे कहने में लज्जा आये उसे मन से भी नहीं सोचना चाहिए। ऐसा कार्य जिसे छुपकर करना पड़े उसे कभी नहीं करना चाहिए।
चरित्र
स्वार्थ, अहंकार और लापरवाही बढ़ जाना ही व्यक्ति के पतन का कारण है।
चरित्र
यदि हम सुधरे, हमारा दृष्टि कोण सुधरे तो दूसरों का सुधार कुछ भी कठिन न रह जायेगा।
चरित्र
सज्जन गाय की तरह दुर्जन साँप की तरह होता है।
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सज्जन गुणहीनों पर भी दया करते है, पर के द्वारा किए हुए उपकार को नहीं भूलते हैं, अपनी कमजोरी दूसरों पर नहीं डालते हैं, दूसरों के दोषों को प्रकट नहीं करते हैं, गुणवान को देखकर प्रमुदित होते हैं, दूसरों के अल्पगुण की भी अनल्प प्रशंसा करते हैं, दूसरों के वैभव से ईर्ष्या नहीं करते हैं, दूसरों के दुःख में दुःखी-सुख में सुखी होते हैं, स्व प्रशंसा नहीं करते हैं, दूसरे के द्वारा प्रशंसा किए जाने पर नम्रीभूत होते हैं, विषमताओं के आने पर निजशील, न्यायनीति और धर्म का परित्याग नहीं करते हैं, पर के द्वारा कटु व्यवहार किए जाने पर भी मधुर उत्तर देते हैं, दूसरों के दोष नहीं गुण ग्रहण करते हैं विसंवाद नहीं करते हैं।
चरित्र
खुद में वह बदलाव लायें, जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।
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दो तथ्य आपको परिभाषित करते हैं, ‘आपका धैर्य’ जब आपके पास कुछ न हो और आपका व्यवहार जब आपके पास सब कुछ हो।
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जो धोखेबाज न हो, स्थिर रहने वाला हो, बुद्धिमान हो, संतोषी हो, चुगली से रहित हो, भर्त्सना करने पर उत्तर न देता हो तथा प्रशस्त वचन बोलता हो, स्वामी के शत्रु से शत्रुभाव, मित्र से मित्रभाव रखता हो सत्पुरुष ऐसा सेवक चाहते हैं।
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पाप में लीन पुरुष खोटा पुरुष है, पाप से निवृत्त पुरुष पुण्यवान है, निज-पर के हित में संलग्न पुरुष सत्पुरुष है और परहित करना ही जिनका कार्य है, वे महापुरुष हैं।
चरित्र
इस तरह से जीवन जीना चाहिए कि यदि कोई आपके बारे में बुरा कहे तो कोई भी उस पर विश्वास न करें।
चरित्र
यदि स्वभाव में मधुरता नहीं है तो जीवन में कहीं भी आनंद नहीं मिल सकता है।
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दूसरे को बदलने में नहीं अपितु स्वयं को बदलने में सुख मिलता है।
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शारीरिक सौन्दर्य की अपेक्षा सदाचरण का सौन्दर्य हजार गुणा श्रेष्ठ होता है।
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इतने नरम भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको खा जाये, इतने गरम भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको छू न सके, इतने सरल भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको मूर्ख बना दे, इतने ज्यादा अकड़ों भी मत कि दुनिया आपसे मिल न सके, इतने गम्भीर भी मत बनो कि दुनिया आपसे ऊब जाये, इतने छिछोरे भी मत बनो की दुनिया आपकी गिनती न करे इतने मँहगे भी मत बनो कि दुनिया आपको बुला न सके, इतने सस्ते भी मत बनो कि दुनिया आपको ना चाहे।
चरित्र
सेवकों को अपने स्वामी से उचित सम्मान पाकर जैसा सन्तोष होता है वैसा सन्तोष बहुत धन देने पर भी नहीं होता है।
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आपकी शिकायतें ही आपके व्यक्तित्व की सूचक हैं। निःशंक जीवन जियो।
चरित्र
मेरे शब्द मेरी पहचान बने तो अच्छा है चेहरे का क्या वह तो मेरे साथ चला जायेगा।
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दूसरों के प्रति शिकायत की वृत्ति अनुभव हीनता का प्रतीक है।
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सभ्यता पूर्ण व्यवहार को शिष्टाचार कहा जाता है।
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ताकत के साथ नेक इरादे भी रखना वरना ऐसा क्या था जो रावण भी हार गया था।
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अपने आपको सुधारना संसार की सबसे बड़ी सेवा है।
चरित्र
परिचय, पत्रों से नहीं अपनी पात्रता से देना चाहिए।
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हीरे की तरह काबलियत रखते हो तो अँधेरे में चमका करो, रोशनी में आकर तो काँच भी चमका करते हैं।
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पूर्व काल में जुआ खेलना मनुष्यों में वैर का कारण देखा गया है, अतः बुद्धिमान मनुष्य हँसी के लिए भी जुआ न खेलें।
चरित्र
ऐसा कोई महान् व्यक्ति नहीं हुआ जो वास्तव में सदाचारी न रहा हो।
चरित्र
सदाचार की रक्षा यत्न से करना चाहिए, धन तो आता है और जाता है, धन क्षीण हो जाने पर भी सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता किन्तु जो सदाचार से भ्रष्ट हो गया, उसे नष्ट ही समझना चाहिए।
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जो पुरुष बुराई से विमुख रहते हैं, वे लोभ नहीं करते और न ही दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त होते हैं।
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वह प्रभावशाली मुख मुद्रा किस काम की जिसके हृदय में बुराई भरी हो।
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जो मनुष्य दूसरों की सम्पत्ति को हड़पने की प्रतीक्षा में बैठा रहता है उसके हृदय से दया और प्रेम कोसों दूर रहते हैं।
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अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि आप संसार में महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हो।
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शालीनता बिना मोल मिलती है और उससे सब कुछ खरीदा जा सकता है।
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सफल मनुष्य बनने से बेहतर है गुणी मनुष्य बनने का प्रयास करें।
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स्पर्धा संसार में गुणी, प्रतिष्ठित और सुखी लोगों की संख्या में बढ़ती करना चाहती है और ईर्ष्या इनकी कमी करना चाहती है।
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दूसरों को गुलाम बनाने वाला खुद गुलाम बन जाता है।
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आपके आगे-पीछे क्या है इसका नहीं अंदर क्या है इसका महत्त्व है।
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बड़ा आदमी बनना अच्छी बात है पर अच्छा आदमी बनना बड़ी बात है।
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रोग होने पर पथ्य सेवन, स्वामी के सामने सत्य बोलना, दुष्ट के साथ न्याय करना, शत्रु को क्षमा करना, ज्ञान होने पर ध्यान करना, धन होने पर दान करना और स्त्री के साथ कोमल व्यवहार करना औषध है।
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बड़ी-बड़ी बातें करने से नहीं छोटी-छोटी कमियाँ दूर करने से समझदार कहलाते हैं।
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मनुष्य की भलाइयों को देखें और फिर उसकी बुराइयों पर दृष्टि डालें इन में जो अधिक हैं, बस समझ लो वैसा ही उसका स्वभाव है।
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मित्रता द्वारा मनुष्य को सफलता मिलती है किन्तु आचरण की पवित्रता उसकी प्रत्येक इच्छा को पूर्ण कर देती है।
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भले आदमी जिन बातों को बुरा बतलाते हैं, मनुष्य को चाहिए कि माता की रक्षा के लिए भी उन्हें न करें।
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सम्यक्त्व चारित्र से सहित एक दिन भी जीवित रहना श्रेष्ठ है लेकिन चारित्र से हीन सौ करोड़ वर्ष भी जीवित रहना व्यर्थ है।
चरित्र
जिस सच्चारित्र को हीन शक्ति वाला जीव आचरण करता है, उसे उत्कृष्ट शक्ति वाले की अपेक्षा हजार गुना फल ज्यादा प्राप्त होता है।
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चारित्र के आसन पर आसीन प्राणी जिस वस्तु की आकांक्षा करता है तीनों लोकों में उसे वह प्राप्त होती है और वह तीन जगत् का स्वामी होता है।
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चारित्र से विचलित जीव जीवित रहता हुआ भी मृत के समान है लेकिन चारित्र से युक्त जीव मृत होकर भी इहलोक-परलोक में जीवित है।
चरित्र
जिन लोगों में चरित्र के निर्माण करने की शक्ति नहीं होती है उन्होंने अन्य दिशाओं में चाहे कितनी ही महत्ता प्राप्त कर ली हो संसार उसकी कुछ परवाह नहीं करता है।
चरित्र
कुलीन पुरुष को करोड़ों रुपये मिलें तब भी वह अपने नाम को कलंकित नहीं होने देता है। प्रतिष्ठित कुल में उत्पन्न हुए मनुष्य के दोष पर चन्द्रमा के कलंक की तरह विशेष रूप से सबकी दृष्टि पड़ती है।
चरित्र
पर्वत के समान उच्च प्रभावशाली लोग भी बहुत क्षुद्र दिखाई पड़ने लगेंगे यदि वे कोई दुष्कर्म करेंगे, फिर चाहे वह कर्म गोली के समान ही छोटा क्यों न हो।
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छोटे आदमियों के बीच का ही यह विशेष दोष है; जो वे महान् पुरुषों की प्रतिष्ठा, उनकी कृपा दृष्टि और अनुग्रह को प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करते हैं।
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