Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Character

चरित्र

1104 सूत्र · पृष्ठ 2 / 15

अपने मिलने वालों के संग जैसा हम व्यवहार करेंगे, वही बीज बनकर पनपेगा, वैसा वे हमारे साथ व्यवहार करेंगे। अपने साथियों को पद, आयु के अनुसार आदर-सम्मान स्नेह दें, उनके अभिवादन का समुचित उत्तर दें, बात के दौरान अशिष्ट और अश्लील भाषा का प्रयोग न करें, उपकार के बदले धन्यवाद देना न भूलें, किसी रुग्ण से बात करें तो सदा हौसला बढ़ायें, रोग की भीषणता का आभास न होने दें। हर्ष-विषाद न करके समता की रक्षा करना भी तपस्या है।
चरित्र
काम वह करो जो सबकी जानकारी में किया जा सके। बात वह बोलो जिसके गुप्त बनी रहने की चिन्ता न करनी पड़े।
चरित्र
दूसरे की स्वच्छन्द प्रवृत्ति से असन्तुष्ट न रहकर अपनी स्वच्छन्द प्रवृत्ति से असंतुष्ट रहो। वीर प्रतिज्ञा निभाता है, दीन च्युत हो जाता है।
चरित्र
दिन में कोई भी कार्य ऐसा न करें, जिससे रात की नींद हराम हो जाए।
चरित्र
रात में कोई कार्य ऐसा न करें कि सुबह मुँह दिखाने योग्य न रहें।
चरित्र
पवित्रता की परीक्षा अपवित्रता के घर्षण में होती है।
चरित्र
यदि सपने सच न हो तो रास्ते बदलो सिद्धान्त नहीं क्योंकि पेड़ भी सुख से जीने के लिए पत्तियाँ बदलते जड़ें नहीं बदलते हैं।
चरित्र
विपद काल में धैर्य, ऐश्वर्य में क्षमा, सभा में वचन चातुर्य, संग्राम में पराक्रम, सुयश में अभिरुचि और शास्त्रों के अध्ययन का व्यसन ये महापुरुषों के स्वभाव में होते हैं।
चरित्र
चरित्र एक ऐसा हीरा है जो अन्य सभी अवगुण रूपी पाषाणों को नष्ट कर देता है।
चरित्र
आदमी की पहचान उसके चेहरे से नहीं चरित्र से होती है।
चरित्र
चरित्र की शुद्धि ही सारे ज्ञान का ध्येय होना चाहिए।
चरित्र
गुण एकान्त में भली-भाँति विकसित होते हैं, जबकि चरित्र का निर्माण संसार के भीषण कोलाहल में ही होता है।
चरित्र
चरित्र वृक्ष है तो प्रतिष्ठा उसकी छाया है।
चरित्र
चरित्र की सम्पत्ति दुनिया की तमाम दौलतों से बढ़कर है।
चरित्र
चरित्र के बिना ज्ञान बुराई की ताकत बन जाता है।
चरित्र
अगर आप अपने चरित्र का ध्यान रखेंगे तो आपकी प्रतिष्ठा आपका ध्यान स्वयं रख लेगी।
चरित्र
चरित्र प्रतिभा से श्रेष्ठ है क्योंकि चरित्र मनुष्य के जीवन का शासक है।
चरित्र
जिस तरह माली घास-फूस निकालकर पेड़-पौधों का जीवन बचाता है, उसी तरह हमें भी अपना चरित्र बचाने के लिए अपनी कमियों को दूर करना चाहिए।
चरित्र
आप प्रत्येक व्यक्ति का चरित्र बता सकते हैं, यदि आप गंभीरता से देखें कि वह प्रशंसा से कितना प्रभावित होता है।
चरित्र
चरित्र दो वस्तुओं से बनता है, आपकी विचारधारा से और आपके समय बिताने के ढंग से।
चरित्र
उज्ज्वल भविष्य के लिए देखकर पाँव रखें, छानकर पानी पिएँ, सच बोलें और पवित्र आचरण करें।
चरित्र
चरित्र का निश्चित परिचय वाणी के अलावा और कुछ नहीं है।
चरित्र
उत्तम व्यक्ति शब्दों में सुस्त और चरित्र में चुस्त होता है।
चरित्र
सुखमय जीवन का तीन चौथाई आधार नेक चाल-चलन है।
चरित्र
हजारों वर्षों का यश एक बार के दुराचरण से नष्ट हो जाता है जिन भेष में जिन चर्या होना चाहिए निज चर्या नहीं।
चरित्र
सिनेमा या टी.वी. देखने से चार हानियाँ होती हैं— १. चरित्र की हानि, २. समय की हानि, ३. नेत्र-ज्योति की हानि और ४. धन की हानि।
चरित्र
चेहरे से ज्यादा चारित्र को मूल्य दीजिए क्योंकि चेहरा तो सिर्फ चार दिन सुहाता है पर सुंदर चरित्र तो पूरे जीवन को प्रभावित करता है।
चरित्र
जिस तरह बिल्लौरी पत्थर पास वाली चीज का रंग धारण करता है उसी तरह चेहरा भी दिल की बात को प्रकट करने लगता है।
चरित्र
कोई मनुष्य जब लिख रहा हो तो बिना उसकी आज्ञा के उसे पढ़ने की कोशिश मत करो।
चरित्र
संसार में जो अच्छा आचरण करते हुए जीवनयापन करता है वह दीर्घजीवी होता है। नेक बनने में सारी उम्र लग जाती है, बदनाम होने में तो एक दिन भी नहीं लगता है।
चरित्र
दर्पण को नहीं अपने दिल को साफ कीजिये। चेहरे को नहीं चरित्र को ठीक कीजिए।
चरित्र
दुर्गुणों को दूर करो, दुःख दूर हो जाएगा।
चरित्र
दुनिया में राय देने वाले बहुत हैं पर सन्मार्ग पर चलाने वाले बहुत कम हैं, सलाहकार बहुत हैं पर सहयोगकार बहुत कम है, आदर्श की बातें करने वाले बहुत हैं पर आचरण करने वाले बहुत कम हैं।
चरित्र
जहाँ सजावट है, वहाँ मिलावट है, जहाँ मिलावट है वहाँ बनावट है, जहाँ बनावट है वहाँ दिखावट है और जहाँ दिखावट है वहाँ गिरावट है।
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किसी को अपनी प्रशंसा करने के लिए विवश कर देने का केवल एक ही उपाय है कि आप 'सत्कर्म' करें।
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मेहनत के बिना दौलत, अंतरात्मा के बिना आनंद, चारित्र के बिना ज्ञान, त्याग के बिना धर्म, सिद्धान्तों के बिना राजनीति, नैतिक मूल्यों के बिना व्यापार और इंसानियत के बिना विज्ञान व्यर्थ है, पाप है।
चरित्र
दिन में वही कार्य करें जिससे रात में सुख से सो सकें। आठ माह में वह कार्य कर लें जिससे बरसात के चार माह धर्मध्यान से व्यतीत कर सकें। जवानी में तपस्या-साधना, दान-पुण्य कर लें जिससे वृद्धावस्था में प्रसन्न रह सकें। जीवन को सदाचार से जियें जिससे मरण समय में हँसते हुए विदा हो सकें। पूरे जीवन ऐसा काम करें जिससे भविष्य उज्ज्वल हो जाये।
चरित्र
इन पाँच प्रकार के मनुष्यों को समाज में न तो धन प्राप्त होता है और न ही यश— १. मलिन वस्त्र पहनने वाले, २. मलिन दाँत रखने वाले, ३. सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सोने वाले, ४. कड़वी बात करने वाले, ५. अधिक भोजन करने वाले।
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भलाई करने की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी बुराई का त्याग करने की आवश्यकता है। बुराई का त्याग करने से भलाई अपने आप होगी, करनी नहीं पड़ेगी।
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जिसको हम अच्छा समझते हैं उसका पूरा-का-पूरा पालन करने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर नहीं है, परन्तु जिसको हम बुरा समझते हैं उसका पूरा-का-पूरा त्याग करने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है और उसके त्याग का बल, योग्यता, ज्ञान, सामर्थ्य भी भगवान् ने हमें दिया है।
चरित्र
जैसे सूर्य आकाश में छिपकर नहीं विचर सकता वैसे ही महापुरुष भी संसार में छिपकर नहीं रह सकते हैं।
चरित्र
कठिनाइयों में ही सिद्धान्तों की परीक्षा होती है, बिना विपत्तियों में पड़े मानव नहीं जान सकता है कि वह ईमानदार है अथवा नहीं।
चरित्र
मीठे शब्दों पर नहीं आचरण पर विश्वास करो।
चरित्र
जो गृहस्थ अधिकार और कर्त्तव्य का पालन करता है वह मानव है और जो अपनी स्वार्थ पूर्ति करता है वह दानव है।
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अभिप्राय में उदारता, कार्य सम्पादन में मानवता, सफलता में संयम इन्हीं तीन चिह्नों से मानव महान् बन जाता है।
चरित्र
दुनिया बुद्धिमान का सम्मान करती है और चरित्रवान का अनुसरण करती है।
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आत्मज्ञान, खिन्नता का अभाव, सहनशीलता, धर्मपरायणता, वचन रक्षा तथा दान ये गुण महापुरुषों में होते हैं अधमपुरुषों में नहीं।
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भ्रष्टाचार संस्कृति की विकृति का कारण है।
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मन को चंचल करने वाले अश्लील चलचित्र व विज्ञापन पर कंट्रोल नहीं किया गया तो संस्कृति का नामोनिशान शेष ना रहेगा।
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मनुष्य या स्त्री की संस्कृति का पता इस बात से लग जाता है कि वे झगड़े के समय कैसा व्यवहार करते हैं।
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शान्ति और हर्ष (प्रसन्नता) सज्जन पुरुष के लक्षण हैं।
चरित्र
संसार में सज्जन पुरुष ही स्वतंत्र होते हैं नीच पुरुष सेवक होते हैं।
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सज्जन चाहे फटेहाल ही हो, बड़प्पन के पूरे ठाठ वाले दुर्जन से अधिक शक्तिशाली होता है।
चरित्र
अपने आचरण की पूरी देख-रेख रखो क्योंकि तुम जगत् में कहीं भी खोजो सदाचार से बढ़कर पक्का मित्र कहीं नहीं मिलेगा।
चरित्र
खराब चित्र देखने से चित्त खराब होता है और मन खराब होने से चरित्र खराब हो जाता है।
चरित्र
जैसे दिखते हो या दिखाना चाहते हो वैसे बनो।
चरित्र
अपना व्यवहार इतना आकर्षक रखो कि कोई तुम्हें छोड़ तो सके पर भुला न सके।
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न्याय प्रियता, लज्जाशीलता, सदाचार, हँसमुख चेहरा, उदार हाथ, मृदुभाषण और स्निग्ध-निरभिमानता ये उच्च कुलीन पुरुष के लक्षण हैं।
चरित्र
स्वयं को ऐसा बनाओ जहाँ तुम हो वहाँ तुम्हें सब प्यार करें, जहाँ से तुम चले जाओ वहाँ तुम्हें सब याद करें, जहाँ तुम पहुँचने वाले हो वहाँ तुम्हारा सब इंतजार करें।
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अच्छाइयों का एक-एक तिनका चुन-चुनकर जीवन भवन का निर्माण होता है, पर बुराई का एक हल्का झोंका ही उसे मिटा डालने में समर्थ है।
चरित्र
जो सदाचार का पालन नहीं करते उन्हें शिक्षित होने पर भी उसी प्रकार लाभ नहीं मिलता जिस प्रकार जादू की गाय दूध नहीं देती है।
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दिल बड़ा रखो, दिमाग ठंडा रखो, वाणी मीठी रखो फिर कोई आपसे नाराज हो तो कहना।
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फूलों की सुगन्ध केवल वायु की दिशा में फैलती है परन्तु एक व्यक्ति की अच्छाई हर दिशा में फैलती है।
चरित्र
सफल व्यक्ति होने का प्रयास न करें, अपितु गरिमामय व्यक्ति बनने का प्रयास करें। आत्म प्रभावना से शून्य धर्म प्रभावना बंध्या स्त्री के शृंगार के समान है।
चरित्र
किसी को अपनी पसंद बनाना कोई बड़ी बात नहीं, बड़ी बात है किसी की पसंद बन जाना।
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बुरा करने वालों का भी जो भला करता और सोचता है वह महान् होता है।
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प्रभावना चित्रों से नहीं चरित्र से होती है। विद्या का आभूषण शान्ति है।
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कर्म ऐसा होना चाहिए कि मनुष्य जहाँ भी बैठ जाये वहाँ मन्दिर बन जाये।
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महात्मा स्वयं कष्ट में होने पर भी दूसरों को सहारा देता है, स्वयं मरणोन्मुख होने पर भी दूसरों को धैर्य प्रदान करता है।
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जो अवगुण तुम्हें दूसरे में दृष्टिगत हो उन्हें अपने भीतर न रहने दो।
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जब तक लोग स्वयं को सुधारने का प्रयत्न नहीं करेंगे, तब तक कोई सुधार होना असंभव है।
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बाह्य के साथ सुधार आंतरिक होना चाहिए, तुम सद्गुणों के लिए नियम नहीं बना सकते।
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सुंदर वह है जो सुंदर कार्य करें।
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यदि सुंदर दिखाई देना है तो तुम्हें भड़कीले कपड़े नहीं पहनना चाहिए बल्कि अपने गुणों को बढ़ाना चाहिए।
चरित्र
'शोभा' चाल-चलन में होती है, दिखावट में नहीं।
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