Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 89

चेहरे पर कालिख। वर्णी जी की शिखरजी यात्रा।

9 सूत्र

देवदर्शनप्रशंसा- प्रात: काल उठकर मङ्गलों के देने में समर्थ, पाप प्रणाशक, श्रेष्ठ पुण्य के हेतु तथा सुर-असुरों के द्वारा सेवित चरण-कमलों से युक्त श्री जिनेन्द्र प्रतिमा का अच्छी तरह दर्शन करना चाहिए।
भक्ति
हे भगवन्! आज आपके दर्शन से मेरे नेत्र कृतकृत्य हो गये हैं, जन्म सफल हो गया है और सब पाप विलीन हो गये हैं।
भक्ति
हे देव! आपके चरण युगल के दर्शन से कर्मों का क्षय होता है, दर्शन करने वाला व्यक्ति बोधि तथा समाधि को, संसार की निकटता को, पाप के मूल कारण के विनाश को तथा परलोक में सर्वार्थसिद्धि के विपुल सुख को प्राप्त होता है।
भक्ति
नाक, मुख, नेत्र, हृदय, नाभि मण्डल के भग्न होने पर उस प्रतिमा की पूजा नहीं करनी चाहिये।
भक्ति
अगर प्रतिमा जी गिर जाती है तो उसी प्रतिमा का एक सौ आठ कलशों से अभिषेक एवं एक सौ आठ मन्त्रों से हवन करें।
भक्ति
जिनबिम्ब के गिर जाने का जो प्रायश्चित है वही प्रायश्चित अस्पृश्य मनुष्य के प्रतिमा को छू लेने पर है।
भक्ति
जो हिंसा करता है उसका ध्यान, अभिषेक, दान, सत्कर्म सभी निष्फल होते हैं।
अहिंसा
चेहरे पर लगी कालिख को देखकर, सबसे पहले साफ करने का भाव होता है उसी प्रकार जिनदेव रूपी दर्पण को देखकर आत्मा पर लगी कर्म-नोकर्म रुपी कालिख को छुटाने का पुरूषार्थ करना चाहिये।
भक्ति
वर्णी जी के साथ शिखरजी यात्रा में सागर वालों का रसोइया था, वर्णी जी को भोजन रुचा नहीं, नाराज होकर बोले तुम्हरे हाथ का भोजन नहीं करेंगे, स्वयं भोजन बनाया तीन घण्टे लग गये, धुँआ से आखों में दर्द हो गया, रात में स्वप्न में बाईजी ने कहा! तुम गुस्से में यात्रा करोगे तो नरक जाना पड़ेगा, भावना पवित्र होना चाहिए।
क्षमा