Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 87

मैं नाती को सोने की.....खीर खाते...। बालक ने ए.बी.सी.डी. आदि वर्णमाला।

10 सूत्र

हे जिनदेव! मैं निरन्तर आपकी वन्दना कर प्रणाम करता हुआ अन्य सीमित फल की याचना नहीं करता हूँ, आप में ही मेरी वह सुदृढ़ भक्ति विद्यमान रहे, जो समस्त स्वर्ग और मोक्षरूपी फल को देती है, यह वर मुझे दीजिये।
भक्ति
एक गरीब, अन्धी एवं निःसन्तान वृद्धा ने भगवान को प्रसन्न कर लिया, भगवान ने कहा एक बार में जो वरदान चाहो माँग लो, उसने कहा! मैं अपने नाती को सोने की थाली में खीर खाते देखूँ, अर्थात् उस वृद्धा ने एक ही वरदान में आँखे, बेटा-बहुएं नाती, धन सम्पत्ति सब कुछ माँग लिया, इसी प्रकार भक्त को 'मेरे न चाह कछु और ईश रत्नत्रय निधि दीजे मुनीश' रत्नत्रय माँग लेने पर तीन लोक की कोई भी सम्पत्ति शेष नहीं रहती है, इसलिए रत्नत्रय ही माँगना चाहिए अन्य कुछ नहीं।
भक्ति
बालक ने ए.बी.सी.डी. आदि सारी वर्णमाला भगवान् को सौंप दी और कहा हे भगवन्! इन्ही शब्दों से सारी स्तुतियाँ बनती हैं, आपको जो पसन्द हो वह स्तुति आप बना लेना और हमारी भक्ति स्वीकार कर लेना, यह निश्छल भक्ति कहलाती है।
भक्ति
धर्मयज्ञ में हवन विधि- आत्मा यजमान है, शरीर वेदी है, सन्तोष साकल्य है, शुक्ल ध्यान प्राणायाम है, सिद्धपद की प्राप्ति फल है, सत्य बोलना स्तम्भ है, तप अग्नि है, चञ्चल मन पशु है, इन्द्रिय समिधा है, यही धर्म यज्ञ कहलाता है।
धर्म
दूरदर्शन नहीं देव दर्शन करो क्योंकि घर ममता बढ़ाता है और मन्दिर समता बढ़ाता है।
भक्ति
मैनासुन्दरी की भक्ति भोगों के लिए नहीं, पाप को पुण्य रूप सङ्क्रमण करने के लिए थी।
भक्ति
नष्ट हुआ कूप, वंश, कुल, तालाब, वापी, राज्य, शरणार्थ आये व्यक्ति, गौ, विप्र और विशीर्ण जिनालय इन का उद्धार करने से चार गुणा फल प्राप्त होता है।
दान
जैसे पानी से मकान बनता भी है तो गिरता भी है इसी प्रकार प्रशस्त और अप्रशस्त राग को जानना चाहिए।
विवेक
जो अरिहन्त को द्रव्य-गुण-पर्याय से जानता है, वह आत्मा को जानता है और उसका मोह अवश्य नाश को प्राप्त होता है।
ज्ञान
उदासोऽहम्, दासोऽहम्, सोऽहम्, अहम्। प्राणी पहले संसार शरीर भोगों से उदास होता है फिर पञ्च परमेष्ठी का दास होता है फिर अपने आप को भगवान के समान चिन्तन करता है तब वह मात्र ज्ञायक हो जाता है।
ध्यान