Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 83

पावन मेरे नयन भये...।

13 सूत्र

भगवान् को भगवान् के रूप में देखने के लिए वैसी दृष्टि चाहिए बागवान को भगवान् के दर्शन नहीं होते हैं।
भक्ति
मन्दिर में दो तरह के दर्पण होते हैं काँच के दर्पण में बाहरी चेहरा दिखता है और भगवान् रूपी दर्पण में आत्मा का स्वरूप दिखाई देता है।
भक्ति
अभिषेक, पूजन, स्तोत्र, जाप, ध्यान एवं शास्त्र स्वाध्याय आचार्यों ने गृहस्थों के लिए देवपूजा के समय ये छ: आवश्यक बतलाये हैं।
भक्ति
तुम निरखत मुझको मिली मेरी सम्पति आज। कहाँ चक्री की सम्पदा कहाँ स्वर्ग साम्राज्य।
भक्ति
पावन मेरे नयन भये तुम दरस तैं, पावन पाणी भये तुम चरणन परस तैं। पावन मन हो गयो तिहारे ध्यान तैं, पावन रसना मानी तुम गुण गान तैं।। पावन भयी पर्याय मेरी, में भयो पूरण धनी। मैं शक्ति पूर्वक भक्ति, कीनी पूर्ण भक्ति नहीं बनी।। धन धन्य ते बड़भागि भविजन, नींव शिवघर की धरी। वर क्षीरसागर आदि जल मणिकुम्भ भरि भक्ति करी।।
भक्ति
इन्द्रभूति गौतम को भगवान् के दर्शन से ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तपाराधना की प्राप्ति हुयी थी।
भक्ति
जिन पूजा के प्रभाव से तीनों लोकों के इन्द्रों से पूजित महिमाशाली तीर्थंङ्कर पद की प्राप्ति होती है।
भक्ति
जो जिनेन्द्र भगवान की एक बार भी समीचीन रूप से पूजा करता है वह संसार के सुखों को भोगकर मोक्ष प्राप्त करता है।
भक्ति
विषय-कषाय से हाथ-पैर धोकर मन्दिर जी में प्रवेश करना चाहिए।
भक्ति
जिनेन्द्र भक्ति, पूजा तथा आर्षग्रन्थों का स्वाध्याय अविपाक निर्जरा का कारण तो है ही किन्तु मोक्ष का भी कारण होता है।
भक्ति
अकृत्रिम जिन प्रतिमाओं के दोनों ओर श्री देवी और सरस्वती देवी स्त्री का रूप धारण कर खड़ी हैं, सर्वाल्हाद और सनतकुमार नाम के यक्षदेव खड़े हैं।
भक्ति
लोग भगवान् का भजन तो करते हैं पर श्रद्धा नहीं करते, आप भगवान् का भजन भले ही न करें पर उनके ऊपर श्रद्धा अवश्य करें, किन्तु 'अति भक्ति से प्रबल अन्तराय कर्म की शक्ति क्षीण अवश्य हो जाती है'।
भक्ति
परमात्मा की परम शान्त वीतराग मूर्ति की पूजन का महत्त्व यह है कि संसारी जीव संसार के माया और गृहस्थी के प्रपञ्च में ज्यादा फँसा रहता है तथा मन चञ्चल होने से और आत्मा बलवान न होने से केवल शास्त्रों से परमात्मा का वर्णन सुनकर एकाएक विना किसी नक्से के परमात्म स्वरूप का नक्सा या चित्र अपने हृदय में खींचने में समर्थ नहीं होते हैं, वे भी उस मूर्ति के द्वारा परमात्म स्वरूप का कुछ-कुछ ध्यान और चिन्तन करने में समर्थ हो जाते हैं और उसी से आगामी दुखों और पापों की निवृत्ति पूर्वक अपने आत्मस्वरूप की प्राप्ति में अग्रसर होते हैं, कोई चित्रकार चित्र खींचनें का अभ्यास करता है तब वह सुगम और सादे चित्रों को देखकर अपना चित्र खींचने का अभ्यास बढ़ाता है, एकदम कठिन गहन और गम्भीर चित्र को वह नहीं खींच सकता, जब उसका अभ्यास बढ़ जाता है तब कठिन रङ्गीन चित्रों को भी बड़ी सुन्दरता से बनाने लगता है और छोटे चित्रों को बड़ा और बड़े चित्रों को छोटा करने लगता है, जब चित्र विद्या में निष्णात हो जाता है, तब चलती-फिरती वस्तुओं का भी चित्र बड़ी सफाई के साथ बातों-बातों में ही खींचकर रख देता है और चित्र को न देखकर केवल व्यवस्था और हाल मालूम करके उसका साक्षात् जीता-जागता चित्र भी अङ्कित कर देता है, उसी प्रकार यह संसारी जीव एकाएक परमात्म स्वरूप का ध्यान नहीं कर सकता अर्थात् परमात्मा का फोटो अपने अन्दर नहीं खींच सकता वह परमात्मा की परम वीतराग मूर्ति पर से ही अपना ध्यान बढ़ाता है। निरन्तर दर्शनादि के अभ्यास से जब वीतराग छवि से परिचित हो जाता है तब शनै: शनै: एकान्त में बैठकर उस मूर्ति का फोटो अपने हृदय में खींचता है और फिर कुछ देर तक रहने के लिए समर्थ होता है। ऐसा करने पर उसका मनोबल और आत्मबल बढ़ने लगता है फिर वह इस योग्य हो जाता है, कि उस मूर्ति के मूर्तिमान श्री अरहन्त देव का समवसरणादि विभूति सहित साक्षात् चित्र अपने हृदय में खींचने लगता है, इस प्रकार के ध्यान का नाम रूपस्थ ध्यान है और यह ध्यान प्राय: मुनि अवस्था में होता है।
ध्यान