Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 64

अभक्ष्य वर्णन।

15 सूत्र

जो पदार्थ भक्षण करने/खाने योग्य नहीं होते हैं, उन्हें अभक्ष्य कहते हैं, इसके पाँच भेद हैं- त्रस हिंसाकारक, बहुस्थावर हिंसाकारक, प्रमादकारक, अनिष्ट और अनुपसेव्य।
आहार
जिस पदार्थ के खाने से त्रस जीवों का घात होता है, उसे त्रस हिंसाकारक अभक्ष्य कहते हैं, जैसे पञ्च उदम्बर फल, घुना अन्न, अमर्यादित वस्तु जिनमें बरसात में फफूँदी लग जाती है, चौबीस घण्टे के बाद का मुरब्बा, अचार, बरी, पापड़ और द्विदल आदि के खाने से 'त्रस जीवों का घात' होता है, दूध में या दूध से बने हुए दही आदि में दो दाल वाले मूँग, उड़द, चना आदि अन्न की बनी चीज मिलाने से द्विदल बनता है।
आहार
जिस पदार्थ के खाने से अनन्त स्थावर जीवों का घात होता है उसे 'स्थावर हिंसाकारक' अभक्ष्य कहते हैं जैसे- प्याज, लहसुन, आलू, मूली आदि कन्दमूल तथा तुच्छफल खाने से अनन्त स्थावर जीवों का घात होता है।
आहार
माँस के त्यागी पुरुषों के द्वारा घुना अन्न, गोभी आदि पत्तियों का शाक, मक्खन, जमीकन्द, मूली तथा चमड़े के पात्र में रखा हुआ पानी आदि भी छोड़ा जाता है।
आहार
एक ओर सब शास्त्रों को रखो और एक ओर 'ब्रह्मचर्य' को, दोनों का फल बराबर है, इसी तरह एक ओर सब पाप रखो और दूसरी ओर 'मद्यपान' रखो, दोनों का पाप समान होता है।
ब्रह्मचर्य
यदि अपने शरीर पर लगी हुई सूक्ष्म चींटी भी दुःख देती है तो फिर ऐसा जानने वाले लोगों के द्वारा बाण से मृग को क्यों मारा जाता है, 'शिकार' क्यों किया जाता है?
अहिंसा
विना दी हुई वस्तु का जो ग्रहण करता है वही चोरी है, चोरी नरक वास का कारण है अतः 'चोरी' नहीं करनी चाहिए।
चरित्र
चोरी को ज्ञानी पुरुष सबसे बड़ा पापास्रव का द्वार कहते हैं, चोर को चिड़ीमार, शिकारी तथा व्यभिचारी लोगों से भी अत्यधिक पापी माना जाता है।
चरित्र
'परस्त्रीसेवन' के भाव से महान् पाप होता है और उसके फल स्वरूप अज्ञानी जनों को सातवे नरक सम्बन्धी महान् दुःख भोगना पड़ता है।
ब्रह्मचर्य
अवन्ती देश में चण्ड नामक चाण्डाल मांस का त्याग करने से मरकर यक्षों का प्रधान हुआ था।
आहार
जिसके खाने से प्रमाद या काम विकार बढ़ता है वे 'प्रमाद कारक' अभक्ष्य हैं जैसे- शराब, भाँग, तम्बाकू, गाँजा और अफीम आदि नशीली चीजें, ये स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हैं।
आहार
जो पदार्थ भक्ष्य होने पर भी अपने लिए हितकर न हों वे 'अनिष्ट' हैं जैसे- शीतज्वर वाले को हलुआ एवं जुकाम वाले को दही, लस्सी आदि ठण्डी चीजें हितकर नहीं हैं।
आहार
जो पदार्थ सेवन करने योग्य न हों वे 'अनुपसेव्य' हैं जैसे- लार, मूत्र आदि पदार्थ।
आहार
जो मद्य, मांस, मधु, पाँच उदम्बर फल एवं रात्रि भोजन का त्यागी होता है, वह ब्राह्मण कहलाता है।(महाभारत शान्ति पर्व)
आहार
विस्तार से अभक्ष्य के बाईस भेद भी हैं- ओला घोर बड़ा निशि भोजन, बहुबीजा बैंगन संधान। बड़, पीपर, ऊमर, कठऊमर, पाकर फल जो होय अजान। कन्दमूल माटी विष आमिष, मधु माखन अरु मदिरापान। फल अतितुच्छ तुषारचलित रस, ये बाईस अभक्ष्य बखान।। ओला, दहीबड़ा, रात्रि भोजन, बहुबीजा, बैंगन, चौबीस घण्टे बाद का अचार, बढ़, पीपल, ऊमर, कटूमर, पाकर, अजानफल (जिसको हम पहचानते नहीं ऐसे कोई फल, पत्ते आदि फास्ट फूड भी अजान फल जैसे ही हैं), कन्दमूल (मूली, गाजर आदि जमीन के भीतर लगने वाले), मिट्टी, विष (शङ्खिया, धतूरा आदि), आमिष(मांस), शहद, मक्खन, मदिरा, अतितुच्छ फल (जिसमें बीज नहीं पढ़े हों ऐसे बिल्कुल कच्चे छोटे-छोटे फल), तुषार-बर्फ और चलित रस (जिनका स्वाद बिगड़ जाये ऐसे फटे हुए दूध आदि) ये सब अभक्ष्य हैं। दहीं बिलोने के बाद मक्खन को निकाल कर तत्काल गर्म कर लेना चाहिए अन्यथा वह अभक्ष्य हो जाता है अथवा कच्चे दूध से भी जो यन्त्र से मक्खन निकाला जाता है, उसमें भी कच्चे दूध की मर्यादा 48 मिनट की है, उसी मर्यादा के अन्दर मक्खन निकाल कर जल्दी से गर्म करके घी बना लेना चाहिए। बाजार की बनी हुई चीजों में मर्यादा का विवेक न रहने से और अनछने जल आदि से बनाई जाने से सब अभक्ष्य हैं, अर्क, आसव (शीरा), शर्बत आदि भी अभक्ष्य हैं, चमड़े में रखे घी, हींग, पानी आदि भी अभक्ष्य हैं, इसलिए इन अभक्ष्यों का त्याग कर देना चाहिए।
आहार