Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 427

वर्णी वाणी।

12 सूत्र

आठ विशेषताएं- निरभिमानी, अत्यन्त सरल, आडम्बर शून्य, बातचीत में अपनत्व का अनुभव कराने वाले, उनका जीवन ज्ञान और कर्म की दृष्टि से विकास शील था, सदैव नई बात जानने के इच्छुक, हर धर्म के सन्त, वाणी सीधी-साधी हृदयग्राही होती थी।
विनम्रता
जिज्ञासु ने थोड़े अक्षर में जैन धर्म जानना चाहा तो वर्णीजी ने कहा- रत्नत्रय।
ज्ञान
दया और सरलता की मूर्ति, दृढ़ता और अनूभूतिमय प्रवृत्ति 'वज्रादपि कठोराणि, मृदूनि कुसुमादपि' अपने लिए वज्र से भी कठोर एवं दूसरों के लिए फूल से भी कोमल थे।
चरित्र
चादर दान- जबलपुर कमानिया गेट पर चादर दान दी, तीन हजार में बोली गयी और वह राशि आजाद हिन्द की फौज को भेंट कर दी, यह थी देशभक्ति।
दान
संस्मरण- खुरई में विद्वान् से पढ़ने की भावना व्यक्त की, उन्होंने पूँछा जैन क्यों बनना चाहते हो? वर्णीजी ने कहा विशेषता यह है कि जैन लोग पानी छान कर पीते हैं, रात्रि में भोजन नहीं करते, शुद्ध भोजन करते हैं, देवदर्शन करते हैं आदि, तब पण्डित जी बोले- यहाँ अच्छा-अच्छा खाने को मिलता है, इसलिये जैन बनना चाहते हो, वचन रूपी बाण हृदय में लगे, लेकिन सङ्कल्प लिया कि पढ़कर ही मिलूंगा।
पुरुषार्थ
पर के परिणमन को देखकर हर्ष विषाद करना संसार वृध को पानी देना है, अनन्तानन्त जीव हैं सबके परिणमन स्वतन्त्र हैं।
अनासक्ति
ज्ञान वृद्धि कल्याण की नियामिका नहीं, किन्तु मोह की कृशता नियम से कल्याण की अविनाभावी है।
ज्ञान
हम उपदेश देने में चतुर हैं पालन करने में असमर्थ हैं, वेश बनाकर मात्र पर को उपदेश देना मोह का विलास ही है।
चरित्र
लोक निन्दा के भय से व्रत पालन करने से कोई लाभ नहीं, आत्मा की भयादि परिणति दूर करो।
चरित्र
आत्म कल्याण के लिये स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य, शुद्ध भोजन आवश्यक है, एवं अपने गुणों-अवगुणों का चिन्तन करें।
संयम
इच्छाओं का अभाव ही शान्ति का मार्ग है।
संतोष
मोक्ष मार्ग में उतावली करने से कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा, संसार का वियोग ही मोक्ष का संयोग है।
कर्म