Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 426

गणेश प्रसाद वर्णी।

12 सूत्र

गणेशप्रसाद वर्णी जी निष्काम जनसेवक थे उन्होंने समाज की कुरीतियों पर कुठाराघात किया, समाज की टूटती हुई डाल को हरा भरा किया था, सुलझे विचारों वाले थे एवं जनहित के लिये जगह-जगह पर पाठशालाएं खुलवाई थीं।
ज्ञान
अनुकम्पा- गणेशप्रसाद वर्णी जी सागर मोराजी से वेदान्ती के आगे नदी तक लड़कों के साथ घूमने जाते थे, नदी के पास एक लकड़ी का गट्ठा लिए बुढ़िया बैठी रो रही थी, वर्णीजी ने पूँछा क्या हो गया? उसने कहा पैर में काँटा लग गया है, चलते नहीं बन रहा, शाम हो गयी, वर्णी जी ने लुहार के यहाँ से संसी मँगायी, उसने नहीं दी, वर्णीजी रोष में बोले! ''छीन कर ले आओ'' और काँटा निकाला, एक-एक लकड़ी लड़कों को देकर बुढ़िया को उसके घर भेज दिया था।
अहिंसा
जिसके मन में छल होता है उसकी समाधि बिगड़ जाती है।
समाधि
आचार्य श्री आहार करके आ गए थे, उसी समय वर्णीजी का हाथ जोड़ कर ओम् की ध्वनि के साथ प्राणान्त हो गया था।
समाधि
कुछ महान होते हैं, कुछ महान बनते हैं और कुछ के लिये महानता थोप दी जाती है।
चरित्र
मौत और सन्यास उम्र को नहीं देखते हैं।
समाधि
जैसी करनी वैसा फल, आज नहीं तो निश्चित कल।
कर्म
मौत को टाला नहीं जा सकता पर सुधारा अवष्य जा सकता है।
समाधि
अब मेरे मन में नहीं है किञ्चित इच्छा, इसलिये धारण कर रहा हूँ मैं मुनि दीक्षा अर्थात् जिनके मन में सांसारिक कोई इच्छा नहीं रह जाती है वे मुनि दीक्षा लेकर आत्म कल्याण करते हैं।
अनासक्ति
संसारी प्राणी सन्त की तरह जन्मता है, कंस की तरह जीता है और कष्ट से मरता है एवं जन्म के समय दोनों हाथ कानों के पास होते हैं, अर्थात् कहता है कि हे भगवान्! अब मैं कान पकड़ता हूँ कोई पाप नहीं करूँगा, मुट्ठी बाँध के आता है अर्थात् पुण्य लेकर आता है और खाली करके अर्थात् पाप लेकर जाता है।
कर्म
आज संवेदना खत्म हो गयी है, अखबार में पढ़ते जाते हैं 'बाम्बे में विस्फोट पाँच सौ मौते', चाय की चुस्की लेते जा रहे हैं, लेकिन न प्याला छूटता, न आहार छूटता, न अखबार छूटता है।
मन
फूल की सुगन्धी फूल में, शक्कर की मिठास शक्कर में, दीपक का प्रकाश दीपक में, वैसे ही आत्मा का सुख आत्मा में रहता है।
ज्ञान