Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 400

माँ, महात्मा, परमात्मा।

11 सूत्र

विवेकी शिष्य को जोर-जोर से पढ़ना, गाते हुए पढ़ना, हास-परिहास, स्त्रियों के निवासस्थल में रहना, उनके शरीर को देखना, साथ-साथ वार्तालाप करना, उनके शरीर का स्पर्श करना, उनके पुत्रों को निरन्तर खिलाना, उनके आगे पति की अत्यधिक प्रशंसा करना, ज्योतिष, मन्त्र, निमित्त ज्ञान, औषध, सञ्चित धन और शरीर का पोषण करना इत्यादिक छोड़ देना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
एकलव्य की अनूठी गुरु भक्ति, मिट्टी के गुरु में आस्था रखी तो भी पक्का धनुर्धारी बना था।
भक्ति
एकलव्य से अङ्गूठा माँगा, यदि गर्दन भी माँगते तो वह दे देता, ऐसा समर्पण ही फल प्रदान करता है।
भक्ति
दिगम्बर साधु लोभ का नाश करने के लिए सन्तोष को, सुख-शान्ति के लिए धैर्य को और उत्तम तप की वृद्धि के लिए ज्ञान को धारण करते हैं।
संतोष
माँ, महात्मा, एवं परमात्मा इन तीन का आशीर्वाद जरूरी है, बचपन में माँ सम्भालती, जवानी में महात्मा, बुढ़ापे में परमात्मा।
परिवार
गृहस्थ के द्वारा मरण पर्यन्त जो पाप सञ्चित किया जाता है, उस सब पाप को एक रात्रि का दीक्षित साधु नियम से भस्म कर देता है।
कर्म
एकान्त में रहने वाला साधु असभ्य जनों के सहवास और दर्शन से होने वाले मोह, राग-द्वेष से पीड़ित नहीं होता है।
संयम
यह महातप रूपी तालाब गुण रूपी जल से भरा है, इसकी मर्यादा रूपी तटबन्धी में थोड़ी सी भी क्षति की उपेक्षा नहीं करना चाहिए, थोड़ी सी उपेक्षा करने से जैसे तालाब का पानी बाहर निकलकर बाढ़ ला देता है, वैसे ही उपेक्षा करने से महातप में भी दोषों की बाढ़ आने का भय रहता है।
संयम
विशुद्ध परिणाम वाले क्षपक की आलोचना आदि प्रशस्त क्षेत्र में दिन के पूर्व या उत्तरभाग में शुभतिथि शुभ नक्षत्र और शुभ समय में होती है।
समय
आलोचना एवं प्रायश्चित्त किये विना महान तप भी संवर के साथ होने वाली निर्जरा को नहीं करता है, प्रायश्चित्त कर लेने पर निर्मल दर्पण में मुख की तरह तप निर्मल होता है।
कर्म
जिन देशों में धर्म का उद्योत करने वाले दीपक तुल्य साधु नहीं होते, वहाँ धर्म का नाम भी नहीं होता, क्रिया कहाँ से होगी?
धर्म