Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 393

केवलज्ञान वीर जिनेश का।

18 सूत्र

ज्ञान जहाँ पर प्रमुख है, लज्जा सहचारिणी है, तप नाशता है, चारित्र पालकी है और बीच में रहने का स्थान स्वर्ग है, गुण रक्षक हैं, सरल मार्ग है, शान्ति रूपी जल है, दया की भावना ही छाया है, ऐसे मार्ग में गमन करने वाले मुनि विना विघ्न के अपने अभीष्ट स्थान मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।
ज्ञान
अगर जीव ऋजु गति से आया हो, अत्यन्त सरल हो तो पूर्वजन्म का उपकारी मिलने पर पूर्व जन्म का जातिस्मरण होता है।
ज्ञान
इन्द्र गर्भ से पहले ही जिनको नौकर की तरह हाथ जोड़कर खड़ा रहता था और जो स्वयं कर्मभूमि में उपदेशक थे और जिनका पुत्र चक्रवर्ती था, ऐसे आदिनाथ भगवान् स्वयं छः माह तक भूखे रहकर पृथ्वी पर भ्रमण करते रहे, कर्म का चरित्र बड़ा विचित्र है, उसका उल्लङ्घन करने में कोई समर्थन नहीं होता है।
कर्म
जिन्होनें समस्त साम्राज्य को तृण की तरह छोड़कर के निर्वाण के लिए तपस्या की थी, वे भगवान् भी दीन की तरह भोजन के लिए दूसरों के घरों में जाते रहे, लेकिन भोजन नहीं मिला और क्षुधा परीषह सहना पड़ा, फिर दूसरों को तो अपनी कार्य की सिद्धि के लिए परीषह सहन करना ही चाहिये।
पुरुषार्थ
भगवान् महावीर स्वामी से लेकर आचार्य धरसेन के पूर्व तक, आचार्यों का आगम अभ्यास मौखिक होता था, लिपि बद्ध करने की आवश्यकता नहीं थी, भगवान् महावीर के निर्वाण से छः सौ तेरासी वर्ष बाद धरसेनाचार्य हुए, जो द्वादशाङ्ग के एकदेश के ज्ञाता थे। वे अष्टाङ्गमहानिमित्त के पारगामी और लिपि शास्त्र के ज्ञाता थे। गिरनार की चन्द्रगुफा में बैठे हुये विचार आया, कि अब ज्ञान के क्षयोपशम का निरन्तर ह्रास हो रहा है, यदि उपलब्ध ज्ञान को लिपिबद्ध नहीं किया गया, तो इसका विच्छेद हो जायेगा। ऐसा सोचकर निकट ही महिमा नगरी में हो रहे मुनि सम्मेलन से महासेन आचार्य के दो शिष्यों को बुलाया, पुष्पदन्त और भूतबली मुनिराज धरसेन आचार्य के पास पँहुचे, दो दिन के उपवास के साथ मन्त्राराधन करने को कहा, एक मन्त्र में एक अक्षर कम एवं एक मन्त्र में एक अक्षर ज्यादा था, जिससे एक को कानी देवी और एक को बड़े दाँत वाली देवी प्रकट हुई, जिसे समझ कर दोनों ने मन्त्र को शुद्ध करके आराधना की तब दोनों मुनि उसमें सफल हुये, तब आचार्य श्री ने मेधावी जानकर, श्रुत का उपदेश दिया, तथा अपना उद्देश्य बताकर ज्ञान को लिपिबद्ध करने का आदेश दिया।
ज्ञान
ज्ञान प्राप्त करने से नहीं ज्ञान रूप बनने से कल्याण होता है।
ज्ञान
चञ्चल मन में विद्या और धर्म नहीं टिकते हैं।
मन
ज्ञानी अभिप्राय को और अज्ञानी शब्दों को पकड़ता है।
ज्ञान
सरस्वती और लक्ष्मी एक साथ नहीं रहती हैं।
धन
मन की शान्ति ही ज्ञान का फल है।
मन
स्वाध्यायी जिज्ञासु हो तो बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है।
ज्ञान
विपरीत मति होने पर साक्षर भी राक्षस बन जाते हैं।
ज्ञान
बुद्धि के साथ यदि संवेदन शीलता न हो तो बुद्धि अनर्थ के लिए जन्म देती है।
ज्ञान
पुराण पढ़ने के साथ-साथ वर्तमान परिणति को भी पढ़ना चाहिए कि भविष्य में इसका परिणाम क्या होगा?
विवेक
जिसको ज्ञान का सदुपयोग करना नहीं आता उसके पास ज्ञान व्यर्थ है।
ज्ञान
मनोरञ्जन के लिए नहीं मन मञ्जन के लिए स्वाध्याय किया जाता है।
ज्ञान
ऑक्सीजन की यदि वाञ्छित मात्रा में वृद्धि हो जाय, तो मस्तिष्क की कार्य क्षमता बढ़ जाती है।
स्वास्थ्य
प्रदूषित मानसिकता, प्रदूषित जलवायु व प्रदूषित आहार से व्यक्ति असमय में वृद्ध हो जाता है।
स्वास्थ्य