Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 357

मशीन में छः द्रव्य। पज्जय मूढा हि पर समया।

10 सूत्र

पानी में चलती हुई नाव में यदि एक राई का दाना डालें, तो नाव राई के वजन से असंख्यात प्रदेश नीचे दब जाएगी, अल्पज्ञानी को वह सूक्ष्म कार्य समझ में नहीं आता है।
विविध
असंख्यात प्रदेश- जैसे दस मीटर कपड़े को घरी लगा कर रख दो तो भी वह असंख्यात प्रदेशी है, उसी प्रकार जीव चाहे राघवमच्छ के शरीर में हो या चींटी के शरीर में हो वह असंख्यात प्रदेशी ही होता है।
विविध
आकाश में जो नीला-नीला दिखाई देता है वह सूक्ष्म निगोदिया जीवों की कापोत लेश्या है, उनका वह वर्ण दिखाई देता है, किसी का मत है ऋजु विमान पाँच रङ्ग वाला है, उसका नीचे वाला नीला रङ्ग दिखाई दे रहा है।
विविध
छह द्रव्य- ग्रन्थ का पढ़ने वाला जीवद्रव्य, ग्रन्थ अजीवद्रव्य, ग्रन्थ को इधर-उधर ले जाना धर्मद्रव्य, ग्रन्थ विराजमान करना अधर्मद्रव्य, ग्रन्थ का आकार आकाशद्रव्य, ग्रन्थ का जो भी परिणमन होता है वह कालद्रव्य की सहायता से होता है।
ज्ञान
मशीन में छह द्रव्य- सिलने वाला जीवद्रव्य, मशीन अजीवद्रव्य, कपड़ा सिलने में आ रहा है धर्मद्रव्य, टाका लगाते समय ठहरता है अधर्मद्रव्य, धागा अवगाहन पा रहा है आकाशद्रव्य, एवं सब पुर्जों का परिणमन काल द्रव्य की सहायता से होता है।
विविध
''सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च''- मिश्री खाने मिले तो सुख होता है, काँटा लगे तो दुःख होता है, भोजन से शरीर चलता है तो जीवन रहता है, आयु कर्म की उदीरणा से मरण हो जाता है।
विविध
जो देख रहा है वह जीव है और जो दिख रहा है वह पुद्गल है।
ज्ञान
जैन सिद्धान्त में उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य माना गया है, किन्तु दूसरे लोग मानते हैं, कि ब्रह्मा-सृष्टिकर्ता, विष्णु-रक्षक, महेश-संहारक हैं, जैसे शरीर में बुखार आया तो ऊष्णता का उत्पाद, ठण्डेपन का व्यय और शरीर ध्रौव्य है।
धर्म
''गुणसाम्ये सदृशानां''- जैसे चक्रवर्ती से चक्रवर्ती नहीं मिलते, तीर्थंकर से तीर्थंकर नहीं मिलते, नारायण से नारायण नहीं मिलते, उसी प्रकार अविभागी प्रतिच्छेदों की समानता होने पर पुद्गलों का बन्ध नहीं होता है, दो अधिक गुण होना आवश्यक है।
विविध
'पर्ययमूढ़ा'- एक धनाढ्य व्यक्ति ने सोने के गणेश और चूहा बनवाये थे, दैव योग से उन्हें बेंचने कि नौबत आ गई, दुकानदारों ने दोनों को एक ही भाव में माँगा, क्योंकि दुकानदारों की दृष्टि में वह सोना अर्थात् द्रव्य था और बेंचने वाले की दृष्टि में वह मूर्ति अर्थात् पर्याय थी, इसलिए वह दुःखी हो रहा था।
Discernment