Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 288

त्याग की प्रेरणा।

19 सूत्र

यदि लक्ष्मी को स्वयं उत्पन्न किया है तो वह पुत्री है, यदि पिता के द्वारा उत्पन्न की गई है तो बहिन है और यदि अन्य मनुष्यों की है तो परस्त्री है, ऐसा विचार कर बुद्धिमान मनुष्य उस लक्ष्मी का त्याग करने में तत्पर रहते हैं।
धन
गाय का दूध, बगिया के पुष्प, विद्या, कुंए का जल और धन नित्य देते रहने से बढ़ते हैं और नहीं देने से घट जाते हैं।
दान
भावों से रिश्ते का त्याग ही सच्चा त्याग है।
अनासक्ति
प्रशंसा के लोभी इस तरह लुट जाते हैं- चार धूर्तों ने प्रशंसा के लोभी कञ्जूस राजा को लूटने का उपाय सोचा और स्यारों के बोलने के समय राजा के पास आये, राजा ने पूँछा स्यार क्यों रो रहे हैं? धूर्तों ने कहा हुजूर! आपके राज्य में सभी प्रजा सुखी है केवल इन बेचारों के आवास की व्यवस्था नहीं है राजा ने प्रशंसा सुन कर बीस लाख रुपये दे दिये। बार-बार यही कहकर धूर्तों ने राजा से साठ लाख रुपये ऐंठ लिये, चौथी वार राजा ने पूछा अब क्यों रो रहे हैं? धूर्तों ने कहा हुजूर! इनके रोने और गाने की आवाज एक जैसी ही है अतः अब ये रो नहीं रहे आपका गुणगान कर रहे हैं, राजा लुट कर के भी खुश हो गया।
संगति
त्याग तो किया पर रागादि कितना घटा? अलमारी साफ की पर ऐसे ढङ्ग से की, कि पानी अन्दर चला गया, पुस्तकें गल गयी, ऐसी सफाई ठीक नहीं, इसी तरह त्याग किया पर राग-द्वेष कम नहीं हुए तो ये वास्तविक त्याग नहीं है।
अनासक्ति
नींव का पत्थर अदृश्य रहकर दृश्य को कायम रखता है, कभी बोलता नहीं, कर्तव्य निभाता है, उसका अभिशाप है कि नींव के पत्थर को न माल्यार्पण, न शॉल सम्मान, केवल निःस्वार्थ स्वान्त सुख है।
विनम्रता
धर्म की इमारत त्याग की नींव पर खड़ी है, माँगो उसी से, जो दे खुशी से, कहे न किसी से।
दान
समय पर दिया दान, भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, रोगी को औषधि, मूर्खों को ज्ञान ये सबसे अमूल्य दान है।
दान
लक्ष्मी का वाहन उल्लू जो दिन में अन्धा होता है, उसी प्रकार लक्ष्मीवान भी प्रायः अन्धे होते हैं।
धन
भोजन करें और मल विसर्जन न करें, तो पीड़ा होगी, श्वांस लें और बाहर न निकालें तो घुटन होगी, लेना जितना जरूरी है, उसे छोड़ना भी उतना ही अनिवार्य है।
अनासक्ति
अर्जन और विसर्जन, ग्रहण और त्याग, प्रकृति का शाश्वत नियम है।
प्रकृति
विना दिये कभी सोना नहीं, देकर कभी रोना नहीं, धर गये सो खो गये, दे गये सो ले गये।
दान
प्रकृति का नियम है कि आज का दिया हुआ कल हजार गुणा होकर लौटता है।
दान
बाँध के अभाव में नदी का जल ठहरता नहीं, बाँध के द्वारा जल को रोकने के बाद यदि उसे छोड़ा न जाय तो खतरनाक स्थिति निर्मित होती है, जो जोड़ते गये, बे डूबते गये, जो छोड़ते गये, वे पूज्य हो गये।
दान
सुरा और सुन्दरी में धन को बहाने वाले बहुत हैं, किन्तु मानव सेवा, धर्म, संस्कृति, देश उत्थान में खर्च करने वाले विरले ही हैं।
दान
सम्पदा को वेश्या और कीर्ति को कुँवारी कहा है, क्योंकि सम्पदा किसी एक पति के पास नहीं रहती वह रोज बदलती है, कीर्ति उन्हें चाहती है, जो कीर्ति को नहीं चाहते और जो कीर्ति को चाहते हैं उसे कीर्ति नहीं चाहती है इसलिये वह आज तक कुँवारी है।
धन
लक्ष्मी की मूर्ति प्रायः खड़ी दिखाई देती है कहीं बैठी नहीं देखी होगी इससे सिद्ध है कि वह हरदम जाने को तैयार है।
धन
छोड़ने और छूटने में कितना अन्तर है, जितना शौच और उल्टी में हैं, शौच के बाद ताजगी, उल्टी में जी मचलता है।
अनासक्ति
कोई मर कर के देता है, कोई देकर के मरता है, जरा से फर्क से बनते ज्ञानी और अज्ञानी। धन की रक्षा है मञ्जूर, तो धन वालों बनो दानी, कुंए से गर नहीं निकला, तो सड़ जायेगा पानी।।
दान