Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 252

असंयम का परिहार- नरकाया को सुरपति तरसे। आपने गृहस्थी नहीं बसाई। श्वसुर का जन्म नहीं हुआ।

8 सूत्र

नरकाया को सुरपति तरसे- भगवान् के दीक्षा कल्याणक के समय पालकी उठाने में जब मनुष्यों को पहले अवसर मिलता है तो इन्द्र कहता है, कि हमारी पूरी इन्द्रपुरी कोई ले ले और कुछ समय के लिए नर पर्याय दे दे, उस समय उसे इन्द्रपुरी से भी मनुष्य पर्याय का मूल्य अधिक लगता है।
ज्ञान
आचार्यश्री से किसी ने पूँछा आपने गृहस्थी नहीं बसाई, संसार का सुख नहीं देखा और घर छोड़ दिया, तो आपको कैसे पता कि संसार असार है? आचार्यश्री ने कहा कि गृहस्थी वालों के संकट ग्रस्त और उदासीन चेहरे देखकर समझ लिया, कि संसार में सुख नहीं है।
अनासक्ति
विषम परिस्थिति में भी आचार्यश्री के मुख से समयसार निसृत होता है- ज्ञानी जीव ऐसा विचार करता है, कि शरीर आदि पर द्रव्य छिद जावे, भिद जावे, इसे कोई ले जावे, विनाश को प्राप्त हो जावे अथवा जिस-तिस तरह चली जावे तो भी परिग्रह मेरा नहीं है।
अनासक्ति
मनुष्य पर्याय को धर्मरूपी भूमि में बोना आम चूसकर गुठली खेत में गाड़ देने जैसा है और मनुष्य पर्याय को भोगों में खोना गुठली सेक कर खा लेने जैसा है।
पुरुषार्थ
पिता की अन्तिम सीख- लोगों ने कहा पण्डितजी आपका बेटा बिगड़ रहा है, पण्डितजी ने कोशिश की लेकिन सुधार नहीं हुआ अन्त में पिताजी ने कहा बेटा अब हम जा रहे हैं, आप यदि व्यसन नहीं छोड़ते तो विपरीत क्रम से सेवन करें, वेश्या सेवन प्रातः करने जाय, दारू काउन्टर के पीछे से खरीदें, जुआ जब सज्जन कहे तब खेलें, अन्त में अनुभव आने पर बेटा सुधर गया।
चरित्र
एक नगर में राजा बनने के पाँच साल बाद राजा को जङ्गल में छोड़ दिया जाता था, इसलिए कोई राजा नहीं बनना चाहता था, एक राजा ने उस जङ्गल में नगर बसा लिया और अपने अनुकूल सारी व्यवस्था बना ली। इसी तरह मनुष्य पर्याय रुपी राजा बनकर मोक्ष नगर बसायें अन्यथा चौरासी लाख योनि के वन में जाने से कोई नहीं रोक सकता है।
समाधि
पाप त्याग के बाद भी अल्प रहे संस्कार। झालर बजना बन्द हो, फिर भी हो झङ्कार।।
कर्म
विषय बड़ा विष है सुनो विष सेवन से मौत। विषय कषाय विसार दे आत्म सिद्धि का योग।।
अनासक्ति