Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 248

घड़ी घड़ी में घड़ी बदलती।

16 सूत्र

विषयान्ध व्यक्ति अन्धे से भी बड़ा अन्धा है क्योंकि अन्धे को केवल आँखों से नहीं दिखता विषयान्ध की एक भी इन्द्रिय काम नहीं करती हैं।
विवेक
जो यह संसारी जीव है उसके यह राग-द्वेष आदि अशुद्ध भाव होते हैं, उनसे ज्ञानावरणादि आठ कर्मों का बन्ध होता है, कर्मों से एक गति से दूसरी गति को प्राप्त होता है, गति को प्राप्त हुए जीव के औदारिकादि शरीर होता है, शरीर में इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, इन्द्रियों से विषय ग्रहण होता है और उससे राग तथा द्वेष उत्पन्न होते हैं, संसार रुपी चक्र में भ्रमण करने वाले जीव के ऐसे अशुद्ध भाव अभव्य के अनादि-अनन्त और भव्य के अनादि-सान्त होते हैं, ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है।
कर्म
दुर्लभ मनुष्य पर्याय को विषय भोगों में लगाना प्याज की खेती में कपूर की बाड़ी लगाने के सामान है।
विवेक
ज्यों मतिहीन विवेक विना नर, पाय मतङ्ग ईंधन ढ़ोवे, कञ्चन भाजन धूल भरे सठ, मूढ़ सुधारस सों पग धोवे। वाहत काग उड़ावन कारण, डार महामणि मूरख रोवे, त्यों यह दुर्लभ देह बनारसी, पाय अज्ञान अकारण खोवे।।
ज्ञान
घड़ी न राव को जाने, घड़ी न रङ्क गिनती है। घड़ी के सामने चलती किसी की भी न विनती है। करोडों में नहीं चूके, घड़ी का वो निशाना है। घड़ी तो हर घड़ी बदले, घड़ी का क्या ठिकाना है।
समय
बीतने वाली घड़ी को कौन लौटा पायेगा, इस धरा का इस धरा पर सब धरा रह जायेगा। जिन्दगी भर का कमाया साथ में क्या जायेगा, यह सुअवसर खो दिया तो अन्त में पछतायेगा।।
समय
काका घड़ी न खोइए गई घड़ी नही आय, यह सोने की है घड़ी सोने में नहीं जाय। सोने में नहीं जाय घड़ी का नहीं ठिकाना, घड़ी-घड़ी में घड़ी बदलती किसने जाना। कह काका समझाए घड़ी मत छोड़ो खाली, घड़ी-घड़ी में घड़ी आ रही जाने वाली।। घड़ी नहीं ठहरात घड़ी मत व्यर्थ निकारो, घड़ी-घड़ी में घड़ी आ रही ये ही विचारो। कह काका कवि जैन घड़ी का सही निशाना, किसकी कब आ जाए घड़ी का कौन ठिकाना।।
समय
अन्तर विषय वासना वर्तें, बाहर लोक लाज भयकारी। ताते परम दिगम्बर मुद्रा, धर न सके दीन संसारी।।
अनासक्ति
ऊँचे गिरि से जो गिरे, मरे एक ही बार। जो संयम गिरि से गिरे, बिगड़े जन्म हजार।।
संयम
बालपने में ज्ञान न लह्यो, तरुण समय तरुणी रत रह्यो। अर्ध मृतक सम बूढ़ा पनो, कैसे रूप लखे आपनो।।
समय
बालपने में ज्ञान जो लहे, तरुण समय संयम रत रह्यो। जब आवे बूढ़ा पनो, तब रूप लखो आपनो।।
संयम
ओला घोर बड़ा निशिभोजन बहुबीजा बैंगन सन्धान, बड़ पीपर ऊमर कठऊमर पाकर फल जो होय अजान। कन्दमूल माटी विष आमिष मधुमाखन अरु मदिरापान, फल अतितुच्छ तुषार चलितरस ये बाईस अभक्ष्य बखान।।
आहार
एक बार खाय सो योगी, दो बार खाय सो भोगी। तीन बार खाय सो रोगी, चार बार खाए तो जल्दी मृत्यु होगी।।
आहार
मनुज जन्म दुर्लभ यह, होय न दूजी बार। पक्का फल जो गिर गया, फेर न लागे डाल।।
ज्ञान
रेशम के वस्त्र, क्रीम, लिपिस्टिक, चमड़े के जूते आदि स्पर्शन इन्द्रिय के असंयम हैं।
संयम
सुन्दर-सुन्दर भोजन, पान-मसाला, कोकोकोला, चाट-पकोड़ी गाली-हँसी आदि रसना इन्द्रिय के असंयम हैं।
संयम