Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 228

सत्य धर्म कथानक-शेर को गधा। वर्ष में एक झूठ। वसु झूठ सेति। सत्यघोष। वाणी से व्यक्ति की पहचान।

13 सूत्र

लोक में ज्ञान और विवेक रहित मनुष्य मूर्ख माना जाता है, किन्तु जो विना पूँछे बोलता है वह मूर्ख शिरोमणि माना जाता है।
वाणी
सारे लोक में प्रिय, सार्थक, निर्मल और मनोहारी वाक्यों के होते हुए भी अज्ञानी पुरुष कठोर वचन क्यों बोलता है?
वाणी
तराजू के एक पलड़े पर चार पापों को रखा जाये और दूसरे पलड़े पर असत्य पाप को रखा जाए तो आचार्य दोनों को बराबर कहते हैं।
सत्य
असत्य से प्राणी अगले जन्म में अल्पज्ञानी, मूर्ख, ज्ञान रहित, बहरा व मुख के अनेक रोगों वाला होता है।
कर्म
मैं जो बन्धन में पड़ा, इसका दोषी कौन। यह वाणी का दोष है सबसे बेहतर मौन।।
वाणी
बिन स्वारथ कैसे सहे, कोई कड़वे बैन। लात खाय पुचकारिये, होय दुधारू धेनु।।
वाणी
बहुत पढ़े तो क्या पढ़े, बोलें नहिं विचार। हने पराई आत्मा, जीभ बहे तलवार।।
वाणी
सत्य, अहिंसा, प्रेम का हमसे कितना नाता है। दीवालों पर लिख देते हैं, दीवाली पर पुत जाता है।।
सत्य
शेर को गधा कहा– एक लकड़हारा जङ्गल में लकड़ियाँ लेने गया, वहाँ एक शेर को दयनीय स्थिति में देखा, तो डरते–डरते शेर के पास गया, शेर को काँटा लगा था जिससे वह चल नहीं पा रहा था, लकड़हारे ने साहस करके शेर का काँटा निकाल दिया, शेर ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा, आप मेरे ऊपर लकड़ी रखकर ले जाया करो, शेर के ऊपर लकड़ी लाने से वह थोड़े ही समय में धनवान बन गया, पड़ोसी ने पूँछा आपकी सम्पन्नता का राज क्या है, लकड़हारे ने कहा मुझे एक गधा मिल गया है, उस पर लकड़ी रखकर लाता हूँ, जिससे मुझे बहुत लाभ हुआ है, ये शब्द शेर ने सुन लिए, दूसरे दिन जब लकड़ी लेने जङ्गल गया, तो शेर ने कहा! आपने मुझसे कल गधा कहा था, अब या तो आप मेरे गले पर कुल्हाड़ी मार दो नहीं तो मैं तुम्हे खा जाऊँगा, लकड़हारे ने अपनी जान बचाने के लिए शेर के गले पर कुल्हाड़ी मार दी जिससे शेर मर गया, शेर कुल्हाड़ी की मार सहन कर गया पर गधा शब्द सहन नहीं कर सका। अतः हमें सोच समझ कर बोलना चाहिए।
वाणी
बोले तो फँसे– कलाकार ने कला से मौत को जीत लिया, एक जैसे सात पुतले बनाये, खुद बीच में बैठ गया, मौत हैरान हो गई, बोली! 'और तो सब ठीक है लेकिन' कलाकार बोला क्या कमी रह गयी है? मौत ने कहा बस तुम बीच में बोल गये, यही कमी रह गयी है।
वाणी
वर्ष में एक झूठ– एक सेठ को एक नौकर मिल गया जिसका वेतन था, भोजन, वस्त्र एवं एक वर्ष में एक झूठ बोलना। वर्ष पूर्ण होने पर वेतन की तिथि निश्चित कर दी गयी। सेठानी से नौकर ने कहा कि आप के सुन्दर और सुशील होने पर भी सेठ कहाँ जाते हैं पता नहीं? मैं दिन भर दुकान चलाता हूँ। सेठानी ने कहा क्यों करें तब नौकर ने कहा सेठ की एक मूँछ निकाल दो, इससे चेहरे की सुन्दरता समाप्त हो जायेगी, जब सेठ जी रात्रि में सो जायें, तब आप छुरी से मूँछ निकाल देना, उधर सेठ से कहा कि आप दिन भर दुकान में रहते हो, सेठानी दिन भर ताला डाल कर पता नहीं कहाँ जाती हैं, आज जब आप सो जाओगे तब वह आपका गला काटेगी, सावधान रहना, सेठ दुकान से आकर चुप चाप सोने का बहाना करने लगे, तभी सेठानी छुरा लेकर आयी, और जैसे ही मुख से वस्त्र हटाया तो सेठ ने उसके हाथ का छुरा छीन कर उसी को मारने तैयार हो गये, तब नौकर ने कहा हुजूर सुनिये, ऐसा मत करिये हमने अपना वेतन लिया है, यानि एक झूठ बोला है। 'जब एक झूठ से प्राणों पर खतरा आ सकता है तो अनेक बार झूठ बोलने पर क्या होगा'।
सत्य
वसु झूठ से ति नरक पहुँचा– राजा वसु, नारद ब्राह्मण और क्षीरकदम्ब ब्राह्मण का पुत्र पर्वत ये तीनों क्षीरकदम्ब ब्राह्मण के पास पढ़ते थे, एक दिन क्षीरकदम्ब अपने शिष्यों के साथ वन में गये, वहाँ चारण ऋद्धिधारी मुनिराज अपने शिष्यों के साथ विराजमान थे, क्षीरकदम्ब ने उनको नमस्कार किया, तब उन मुनिराज ने कहा की इनमें गुरु और एक शिष्य सद्बुद्धि हैं, और दो शिष्य कुबुद्धि हैं, ये शब्द सुनकर क्षीरकदम्ब संसार से डर गये, शिष्यों को वापस भेजा और स्वयं ने मुनि दीक्षा ले ली, ब्राह्मण की पत्नी को बहुत दुःख हुआ, उसने बहुत विलाप किया, नारद ने उसे समझाया, एक दिन नारद और पर्वत में चर्चा चल रही थी, नारद ने कहा कि मुनियों ने 'अजैर्यष्टव्यं' का अर्थ 'जिसमें अङ्कुर शक्ति नहीं है ऐसे शालिधान' हैं, उसी से यज्ञ, विवाह आदि क्रियाओं में होम करना चाहिए। यह कहा है, पर पर्वत ने कहा कि अज का अर्थ 'बकरा' होता है, उसने झूठ कहा कि पिताजी ने यही कहा था, दोनों में विवाद बढ़ गया, और वसु के पास न्याय करने के लिए कहा, क्योंकि वह भी क्षीरकदम्ब के पास पढ़ता था, राजा वसु के सिंहासन के पाये स्फटिक के थे, जिससे सब यही समझते थे, कि उसका सिंहासन सत्य के प्रभाव से आकाश में उठा हुआ है, पर्वत ने एक दिन पहले सारा वृत्तान्त अपनी माँ को सुनाया, माँ को पता था कि पर्वत झूठ बोल रहा है, फिर भी पुत्र मोह में आकर वह राजा के पास गयी, अपनी गुरुमाँ को आता देखकर राजा ने बहुत सम्मान से बैठाया, माँ ने आने का कारण बताया और झूठ को सत्य कहने के लिए कहा, राजा ने दक्षिणा के वचन को याद किया और हाँ कह दिया, दूसरे दिन सभा लगी तो राजा ने पर्वत को सत्य ठहराया, झूठ के प्रभाव से उसके सिंहासन के पाये टूट गये, नारद ने समझाया की राजन्! झूठ के प्रभाव से पाये टूट गये अब भी सच बोल दो, पर राजा ने पर्वत का ही पक्ष लिया, और सिंहासन के नीचे की पृथ्वी फट पड़ी और राजा झूठ के प्रभाव से मरकर 'सातवें नरक' चला गया।
सत्य
सत्यघोष का असत्य जगत प्रसिद्ध- सत्यघोष ने जनेऊ में एक चाकू बाँध रखा था और कहता था कि मैं जरा सा भी झूठ बोलूँगा तो अपनी जीभ काट लूँगा, वह किसी की धरोहर वापस देता था किसी की नहीं, कोई–कोई राजा के पास जाकर उसकी शिकायत भी करते थे, लेकिन सत्यघोष के प्रभाव के कारण राजा भी किसी की नहीं सुनता था, एक दिन दूसरे गाँव का समुद्रदत्त व्यापारी रत्नद्वीप में व्यापार करने के लिए गया, उसने सत्यघोष के पास पाँच रत्न जमा कर दिए, लौटते समय जहाज डूबने से सारा धन समुद्र में डूब गया, वह सत्यघोष के पास गया, और अपने पाँचों रत्न वापिस माँगे, तो सत्य घोष उसे पागल कहकर भगाने लगा, राजा के पास भी न्याय न मिलने से वह दिन–रात सबसे यही कहता फिरता था की 'सत्य घोष मेरे पाँच रत्न नहीं देता है' रानी ने यह सुना तो राजा से न्याय करने के लिये कहा, रानी ने सत्यघोष और समुद्रदत्त दोनों की परीक्षा ली, और न्याय किया, राजा ने सत्य घोष को तीन सजा बताई उनमें
सत्य