Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 224

कड़ार पिंग।

10 सूत्र

एक व्यापारी ने रायचन्द्र जी से हीरा– जवाहरात का सौदा तय किया, तब भाव गिर गया, व्यापारी अत्यन्त दुःखी होकर मरने लगा तब रायचन्द्र जी ने लोभ छोड़कर व्यापारी को बचाया, और उसका बयाना वापस कर दिया।
संतोष
साधु का उपदेश– राजा के आग्रह से साधु ने उपदेश देने महल में आने को कह दिया। साधु महल में गये, राजा ने बढ़िया खीर आदि तैयार की, साधु के कटोरे में धूल थी, राजा ने कटोरे में खीर नहीं दी, साधु जङ्गल जाने लगे तब राजा ने कहा कि! आपने न उपदेश दिया न आहार किया, तब साधु बोला कि! राजन आपने कटोरे में खीर क्यों नहीं दी, राजा ने कहा! उसमें धूल थी कैसे देता, साधु ने कहा! इसी तरह तुम्हारी आत्मा में कषाय रूपी धूल है, तो उपदेश कैसे दूँ, 'पच्चीस कषाय राग–द्वेष में गर्भित हो जाती है' वे आपके अन्दर हैं।
संयम
एक सेठ अपनी सम्पत्ति का लेखा जोखा कर रहा था, तो सातपीढ़ी तक के लिए सम्पत्ति थी, पर आठवीं पीढ़ी की चिन्ता में सेठ मूर्च्छित हो गया, मूर्छा समाप्त होने पर किसी ने कहा कि अपने गाँव के ब्राह्मण को भोजन सामग्री दे आओ, तो तुम्हारी आठवीं पीढ़ी की चिन्ता समाप्त हो जायेगी, वह भोजन सामग्री देने गया, तो ब्राह्मण बोला की आज के लिए तो मेरे पास भोजन है, तो सेठ बोला कल के लिए काम आएगा, साधु ने कहा! कल पीठ पीछे है, कल के लिए सङ्ग्रह करना पाप है। तब सेठ की आँखें खुली, ये तो कल की चिन्ता नहीं करता और मैं आठवीं पीढ़ी की चिन्ता कर रहा हूँ।
संतोष
आगे-आगे पति जा रहा था और पीछे-पीछे उसकी पत्नी, रास्ते में सोने की मोहरें मिलीं, पति ने उस पर धूल डाल दी, ताकि पत्नी का मन न बिगड़ जाये, पीछे से आ रही पत्नी ने कहा क्या कर रहे हो, क्यों मिट्टी पर मिट्टी डाल रहे हो, अर्थात् पत्नी पति से ज्यादा निरीह थी क्योंकि उसकी दृष्टि में सोने और मिट्टी में भेद नहीं था।
अनासक्ति
कडार पिञ्ज– कडार पिञ्ज चोरी की हुई सोने की शलाकाएँ खरीदता था, एक दिन वह अपनी लड़की के यहाँ गया और लड़के से बोल गया कि शलाकाएँ ले लेना, लड़के ने चोरी की जानकर नहीं ली। पिता लड़की के यहाँ से वापस आया शलाकाएँ न देख कर अपने पैर काट लिये और मरकर अपने ही खजाने में सर्प बनकर रक्षा करने लगा, लड़के ने देखा तो उस सर्प को मार डाला, सर्प मरकर नरक में चला गया।
धन
लोभी अपमान सहन करता है, कुछ मिलने की आशा हो तो गालियां भी सुनता है, वास्तव में सन्तोषी ही धनी है।
संतोष
पञ्चेन्द्रिय के चेतन विषय का राग और अचेतन पदार्थ के राग को लोभ कहा जाता है, शुभ राग को उदात्त प्रेम या वात्सल्य आदि नाम देते हैं।
अनासक्ति
लोभ अन्त में नष्ट होता है, अतः सभी कषायों के अभाव में शौच धर्म होता है।
धर्म
अस्नान व्रती को शौच धर्म होता है, नहाने वालों को नहीं।
धर्म
प्राणी ब्रह्मचर्य, जप, तप, ज्ञान–ध्यान आदि से शुद्ध होता है, न की मात्र नहाने से।
धर्म