Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 70

विद्वान् सर्वत्र पूज्यते

30 सूत्र

वह बाह्य सौन्दर्य किस काम का, जिसके हृदय में भूषण के समान प्रेम न हो।
चरित्र
प्रेम मनुष्य का प्राण है। जिसमें प्रेम नहीं, वह केवल मांस में लिपटी हुई हड्डियों का ढेर है।
चरित्र
आभारी बनाने की इच्छा से रहित होकर जो दया की जाती है, स्वर्ग और पृथ्वी दोनों मिलकर भी उसका बदला नहीं चुका सकते हैं।
दान
किसी से प्राप्त किया हुआ लाभ राई की तरह छोटा ही क्यों न हो किन्तु समझदार आदमी की दृष्टि में वह ताड़वृक्ष के बराबर हैं।
विनम्रता
भलाई और बुराई का प्रसंग तो सभी को आता है, पर एक 'न्याय निष्ठ मन' बुद्धिमानों के लिए गर्व की वस्तु है।
चरित्र
यह जिनवचन इन्द्रिय सुख का विरेचन करने वाली अमृतरूप औषध है, जन्म-मरण की व्याधि को हरने वाली है तथा सब दुःखों का क्षय करने वाली है।
धर्म
और तो और, स्वयं देवेन्द्र भी अपने स्थान से भ्रष्ट हो जाये और आपना प्रभुत्व गँवा बैठे, यदि पवित्र प्रतिज्ञा वाले सन्त लोग क्रोध भरी दृष्टि से इन्द्र की ओर देख लेवें।
धर्म
शिक्षित लोग ही आँख वाले कहलाते हैं अशिक्षितों के शिर में तो केवल दो गड्ढे होते हैं।
ज्ञान
विद्वान् जहाँ कही भी जाता है, ज्ञान और मधुर व्यवहार की वजह से अपने साथ आनन्द ले जाता है, लेकिन वहाँ से विदा होता है तो पीछे दुःख छोड़ जाता है विद्वान् का वियोग लोगों को खटकता है।
ज्ञान
विद्वान् के लिए सभी जगह उसका घर है और सभी जगह उसके स्वजन हैं फिर लोग मरने के दिन तक विद्या प्राप्त करते रहने में असावधानी क्यों करते हैं?
ज्ञान
मनुष्य ने एक जन्म में जो विद्या प्राप्त कर ली है, वह उसे समस्त आगामी जन्मों में भी उच्च और उन्नत बनायेगी।
ज्ञान
विद्वान् का दरिद्र होना निःसन्देह बुरा है किन्तु मूर्ख के अधिकार सम्पत्ति का होना तो और भी बुरा है।
ज्ञान
सूक्ष्म तथा शुभ तत्त्वों में जिसकी बुद्धि का प्रवेश नहीं है, उसकी सुन्दर देह मिट्टी की अलंकृत मूर्ति के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
ज्ञान
यदि कोई मनुष्य विद्वान् न हो, तो भी उसे उपदेश सुनने दो क्योंकि जब उसके ऊपर संकट पड़ेगा, तब उन उपदेशों से ही उसे कुछ सान्त्वना मिलेगी।
ज्ञान
धर्मात्माओं के उपदेश एक सुदृढ़ लाठी के समान हैं क्योंकि जो उनके अनुसार काम करते हैं, उन्हें वे गिरने से बचाते हैं।
धर्म
यदि तुम सावधानी से हर समय और प्रत्येक प्रकार के आदमियों से रक्षा करने में सुस्ती नहीं करते तो इसके बराबर अच्छी और क्या बात है?
विवेक
जो पुस्तकों के ज्ञान द्वारा अपनी सहजबुद्धि की अभिवृद्धि कर लेते हैं, उनके लिए कौन-सी बात इतनी कठिन है, जो उनकी समझ में न आ सके।
ज्ञान
जो लोग अपने प्राप्त किए हुए ज्ञान को समझाकर दूसरों को नहीं बता सकते हैं, वे उस फूल के समान हैं, जो खिलते तो हैं पर सुगन्धि नहीं देते हैं।
ज्ञान
धर्म शास्त्र में जो काम हेय बताये गये हैं, उनको भी जो नहीं छोड़ सकते ऐसे मनुष्यों को देखो; उनके चाहे मनोरथ सफल भी हो गये हों, तो भी उन्हें शान्ति नहीं मिलेगी।
धर्म
ऐसे सभी कामों से बचाव रखना जो निश्चय से असफल होंगे तथा अपने उद्देश्य से बाधाओं के कारण विचलित न होना ये दोनों सिद्धान्त विद्वान् के पथ प्रदर्शक है।
पुरुषार्थ
बुद्धिमान लोगों के सामने असमर्थ और असफल सिद्ध होना धर्म मार्ग से पतित हो जाने के समान है।
पुरुषार्थ
विद्वानों की विद्वत्ता अपने पूर्ण तेज के साथ सुसम्पन्न गुणियों की सभा में ही चमकती है। सर्व जनहिताय की बुद्धि से उपदेश देना किन्तु मूर्खों की बातों पर ध्यान न देना।
ज्ञान
अपने से मतभेद रखने वाले व्यक्तियों के समक्ष भाषण करना उसी प्रकार है, जिस प्रकार अमृत को मलिन स्थान पर डाल देना है।
वाणी
रणक्षेत्र में खड़े होकर वीरता के साथ मृत्यु का सामना करने वाले लोग तो बहुत हैं; परन्तु ऐसे लोग बहुत ही थोड़े हैं, जो बिना काँपे श्रोताओं के समक्ष सभा मंच पर खड़े रह सकें।
चरित्र
तुमने जो ज्ञान प्राप्त किया है, उसको विद्वानों के सामने खोलना सीखो और जो बात तुम्हें मालूम नहीं है, वह उन लोगों से सीख लो, जो उसमें दक्ष है।
ज्ञान
वह देश महान् है, जो फसल की पैदावार में कभी नहीं चूकता और जहाँ ऋषि-मुनियों तथा धार्मिक-धनिकों का निवास स्थान हैं।
विविध
जो धन पाप रहित निष्कलंक रूप से प्राप्त किया जाता है, उससे धर्म, काम और आनन्द का स्रोत बह निकलता है।
धन
क्या तुम अपना सर्वनाश करना चाहते हो? तो ज्ञानियों के सदुपदेश पर ध्यान न दो और जाकर उन लोगों के साथ छेड़खानी करो, जो जब चाहें तुम्हारा सर्वनाश करने की शक्ति रखते हैं जो दुर्बल मनुष्य बलवान् और सत्ताधारी पुरुषों का अपमान करता है, वह मानों यमराज को अपने पास आने के लिए संकेत करता है।
विवेक
यदि आत्म बलशाली ऋषि गण तुम पर नाराज है तो विविध प्रकार के आनन्द से उल्लसित भाग्यशाली जीवन और समस्त ऐश्वर्य से पूर्ण तुम्हारा धन फिर कहाँ होगा?
धर्म
महत्ता सर्वथा विनयशील और आडम्बर रहित होती है; पर क्षुद्रता सारे संसार में अपने गुणों का ढिंढोरा पीटती फिरती है।
विनम्रता