Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 43

पुरुष हो, पुरुषार्थ करो

162 सूत्र · पृष्ठ 3 / 3

अधिकारों का सच्चा स्रोत कर्तव्य है, अगर हम अपने कर्त्तव्य पूरे करें तो अधिकारों को ढूँढ़ने कहीं दूर नहीं जाना पड़ेगा।
चरित्र
कर्ता मत बनो कर्त्तव्य का पालन करो।
चरित्र
कार्यकुशल व्यक्ति के लिए यश और धन की कमी नहीं है।
पुरुषार्थ
बालकों की कर्त्तव्यशीलता ही सब गुणों की नींव है।
परिवार
अपनी कथनी और करनी में अन्तर नहीं होना चाहिए।
चरित्र
कर्त्तव्य और धर्म एक सिक्के के दो पहलू हैं इसलिए कर्तव्य के बिना धर्म नहीं हो सकता है और न ही धर्म के बिना कर्त्तव्य हो सकता है।
धर्म
अब कलम नहीं, कदम उठाना है, कदम बढ़ाओ मंजिल पाओ।
पुरुषार्थ
चिंताएँ, परेशानियाँ, दुःख और तकलीफें परिस्थितियों से लड़ने से दूर नहीं हो सकतीं, वे दूर होंगी अपनी भीतरी दुर्बलता दूर करने से, जिसके कारण वे पैदा हुई हैं।
मन
मानव के कर्म ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या हैं।
कर्म
प्रत्येक कर्म करने से पहले यह अवश्य देखना चाहिए कि हमारा कर्म व्यर्थ तो नहीं, जिसमें समय नष्ट हो रहा हो।
विवेक
कर्मों को दोष मत दो, करनी को दोष दो।
कर्म
कला वही है जो नयनाभिराम और कर्णतृप्ति ही न दे बल्कि आत्मा को भी ऊपर उठाये।
ज्ञान
एक समय में एक ही काम कीजिए ताकि वह पूरी एकाग्रता से सम्पन्न हो सके।
पुरुषार्थ
इससे पहले कि आप कल पर काम का अतिरिक्त बोझ डालें, उसे आज ही करना शुरू का दीजिए।
पुरुषार्थ
कार्य की अधिकता से उकताने वाला व्यक्ति कभी कोई बड़ा कार्य नहीं कर सकता है।
पुरुषार्थ
अच्छे कार्य करने हेतु किसी शुभावसर की राह मत देखो अपितु छोटे-छोटे अवसरों से ही लाभ उठाओ।
पुरुषार्थ
साधारण कामों को असाधारण तरीके से करके ही आप दुनिया का ध्यान खींच सकते हैं।
पुरुषार्थ
काम के बोझ से कोई मर नहीं जाता है, मौत तो भय के कारण आती है।
पुरुषार्थ
जो व्यक्ति काम करने में प्रसन्नता अनुभव करता है वह बेकारी के दलदल में नहीं फँसता है।
पुरुषार्थ
प्रत्येक अच्छा कार्य पहले असंभव नजर आता है।
पुरुषार्थ
यह संसार कायर पुरुषों के लिए नहीं है, पलायन करने का प्रयास मत करो।
चरित्र
कायरता से शत्रु के बल की वृद्धि होती है और अपनी शक्ति का ह्रास होता है अतः जहाँ तक बने कायरता को अपने पास न भटकने दो।
चरित्र
कमजोर आदमी हर काम को असंभव समझता है और वीर हर असंभव कार्य को साधारण समझता है।
चरित्र
केकड़ों की तरह टाँग खिंचाई मत कीजिए मछली की तरह स्वयं को दूसरों से आगे ले जाइये।
चरित्र
हमारी कोशिशों का फूल उपलब्धि के रूप में खिलता है।
पुरुषार्थ
ऋषि बनो या कृषि करो, भगवान् आदिनाथ का मुख्य संदेश है।
धर्म
अपनी भूल अपने ही हाथों सुधर जाएँ तो यह इससे कहीं अच्छा है कि कोई दूसरा उसे सुधारे।
संयम
आत्म विश्वास को ही अपना सच्चा मित्र बनाइये।
पुरुषार्थ
हर मंजिल के रास्ते होते हैं और हर रास्ते पर मुश्किलें होती हैं पर मन में यदि उमंग-उत्साह आत्म विश्वास हो तो जीत निश्चित होती है।
पुरुषार्थ
भूल करके आदमी सीखता तो है, पर इसका यह मतलब नहीं कि जीवन भर भूल करता जाए और कहे कि हम सीख रहे हैं।
ज्ञान
त्रुटियाँ तो केवल उसी से नहीं होंगी जो कभी कोई काम करे ही नहीं।
पुरुषार्थ
जिन गलतियों पर हम शर्मिंदा नहीं होते, वे ही आगे चलकर अपराध बन जाती है।
चरित्र
भूल को छिपाने का नहीं, मिटाने का उपाय करो।
चरित्र
चढ़ना कठिन होता है किन्तु फिसलना सरल होता है इसीलिए गुण ग्रहण कर उस पर चलना कठिन होता है।
चरित्र
यदि तुम गुणों का विकास करना चाहते हो तो गुणानुराग का विकास करो, गुणी व्यक्ति को सामने रखो, उसके गुणों के बारे में सोचो, अनुमोदन करो, बाहर का यह कार्य भीतर एक शक्ति पैदा करेगा और तुम गुणी बन जाओगे।
चरित्र
अपने गुणों से आगे बढ़ना चाहिए, दूसरों की कृपा से नहीं।
चरित्र
नारकियों में क्रोध, तिर्यंचों में माया, देवों में लोभ और मनुष्यों में मान की अधिकता होती है।
चरित्र
इतिहास केवल देखना नहीं, चिन्तन भी है और चिन्तन सदैव रचनात्मक होता है।
ज्ञान
खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है, जीवन नाम है सदैव आगे बढ़ते रहने की लगन का।
पुरुषार्थ
महत्त्व इसका नहीं है कि हम कब तक जीते हैं, महत्त्व तो इस बात का है कि हम जीते कैसे हैं?
चरित्र
जीवन में आई चुनौतियों को स्वीकार करने वाले ही सफल व सही जीवन जी पाते हैं।
पुरुषार्थ
भूतकाल में जीना मोह का परिणाम है, भविष्य में जीना लोभ का परिणाम है, वर्तमान में जीना कर्मयोग है।
समय