Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 3

रात्रि में भोजन क्यों नहीं करना चाहिए?

39 सूत्र

अरिहन्त का अ, अशरीरी का अ=आ, आचार्य का आ = आ, उपाध्याय का उ = ओ, मुनि का म्=ओम्।
णमोकार
ओम् का ध्यान करने से शरीर में पाँच तत्त्वों की पूर्ति होती है–अ=अवनि, अ-अम्बु, अ= अग्नि, अ= अनिल, अ=आकाश।
णमोकार
णमोकार मौन सिखाता है, नमो का उल्टा मौन होता है।
णमोकार
एक-एक इन्द्रिय में एक-एक परमेष्ठी को स्थापित कर ध्यान कर सकते हैं।
ध्यान
मध्यमा और अंगुष्ठ से जाप करें, नाखून न लगावें, मेरु न लाँघे, माला भूमि से स्पर्श न करें।
णमोकार
सिद्धक्षेत्र का द्योतक णमोकार–अरहन्त से अष्टापदजी, सिद्ध से सिद्धोदयजी, आचार्य से आहारजी, उपाध्याय से ऊर्जयन्तजी, साधु से सम्मेदशिखरजी।
णमोकार
मन्त्र छोटा होता है, ग्रन्थ की तरह बड़ा नहीं होता, हीरा छोटा होता है, चट्टान की तरह बड़ा नहीं होता पर बड़ी चट्टान को काट देता है, अंकुश छोटा होता है पर मदोन्मत्त हाथी को वश में करता है, वट का बीज भी छोटा होता है पर विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है, इसी तरह णमोकार मन्त्र वट के बीज की तरह महान् फल देने वाला है।
णमोकार
वनमाला और लक्ष्मण का संवाद आगम सम्मत– लक्ष्मण ने कहा! ''मुझे छोड़ दो'' कार्य हो जाने पर मैं तुम्हें लेने आऊँगा, मुझे देव आदि की शपथ है, लेकिन वनमाला को उनके आने में संदेह हुआ, तब लक्ष्मण ने कहा कि, सुनो यदि मैं न आऊँ तो मुझे रात्रि भोजन का पाप लगे। (धर्म संग्रह श्राव. अधिकार-३] श्लोक २८/२९) रामचन्द्र जी को अच्छी तरह व्यवस्थित करके यदि मैं तुम्हारे पास न आऊँ तो मुझे (लक्ष्मण को) गौ हत्या, स्त्री हत्या आदि का पाप लगे। इस प्रकार अन्य शपथों के करने पर भी वनमाला ने लक्ष्मण से एक ही शपथ करायी कि आपको रात्रिभोजन का पाप लगे।
आहार
वैष्णव साधु मार्कण्डेय महर्षि ने भी कहा है कि सूर्य के अस्त हो जाने पर पानी खून कहलाता है और अन्न मांस के समान कहा गया है।
आहार
वर्षा ऋतु में जो रात्रिभोजन करता है उसकी सैकड़ों चन्द्रायण व्रतों से भी शुद्धि नहीं हो सकती है। कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की कला की तरह एक-एक ग्रास घटाना शुक्ल पक्ष में एक-एक ग्रास बढ़ाना इस प्रकार एक माह में एक चन्द्रायण व्रत होता है। ''सूर्य के अस्त हो जाने से हृदय और नाभि में स्थित कमल भी बंद हो जाता है इसलिए रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए।''
आहार
नरक के चार द्वार रात्रिभोजन, परस्त्रीगमन, अचार भक्षण और जमीकंद भक्षण।
आहार
भोजन के साथ पेट में मक्खी जाने से उलटी होती है, चींटी जाने से पेशाब में जलन होती है, बाल जाने से स्वर भंग होता है, जुँआ जाने से जलोदर रोग होता है, मकड़ी जाने से कोढ़ होता है, छिपकली जाने से मृत्यु होती है इसलिए भोजन में सूर्य का प्रकाश विवेक और शोधन क्रिया आवश्यक है।
आहार
अहिंसा व्रत की रक्षा और मूलगुण की शुद्धि के लिए धीर पुरुष मन-वचन-काय से रात्रि में चारों प्रकार के आहारों का त्याग करें।
आहार
जो स्वभाव से रात्रिभोजन का त्याग करता है, वह अपने कुल के आभूषण तथा तीन जगत् के स्वामियों की सम्पदा को प्राप्त होता है।
आहार
रत्नत्रय से परिपूर्ण तथा अणुव्रतों को धारण करने में तत्पर भव्य जीव सूर्योदय होने पर दोष रहित भोजन करते हैं।
आहार
जो दयालु पुरुष रात्रि में भोजन नहीं करते, वे विमानों के स्वामी अर्थात् वैमानिक देव होते हैं और वहाँ उत्कृष्ट भोगों को प्राप्त करते हैं।
आहार
स्वर्ग से च्युत होकर प्रशंसनीय मनुष्य पर्याय प्राप्त कर चक्रवर्ती आदि के वैभव से प्राप्त सुख का उपभोग करते हैं।
आहार
जगत् में जो धनवान्, गुणों से उदार, सुन्दर, दीर्घायु, सम्यग्ज्ञान से सहित और प्रधान पद पर स्थित हैं, वे सब दिन में भोजन करने से हुए हैं।
आहार
जो दिन में भोजन करने में उद्यत हैं, वे सूर्य के समान प्रभा वाले, चन्द्रमा के समान सौम्यदर्शन तथा स्थायी भोगों से युक्त होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य संसार में असह्य प्रताप से युक्त, नगरों के स्वामी, नाना प्रकार के वाहनों से सहित, सामन्तों से पूजित, भवनवासी देव, वैमानिक देव, चक्रवर्ती के वैभव से सहित और महान्-उत्कृष्ट लक्षणों से सम्पन्न होते हैं।
आहार
दिन में भोजन करने से मनुष्य उन नगरियों में ऐसे विद्याधर राजा होते हैं, जो कलाओं में निपुण हैं, जिनके शरीर और नेत्र हृदय में स्नेह उत्पन्न करने वाले हैं, जो अमृतस्रावी वाणी से समस्त जगत् को आह्लादित करते हैं तथा उत्साह से युक्त होते हैं, दिन में भोजन करने से मनुष्य नारायण, बलदेव, चक्रवर्ती, बिजली और लाल कमल के समान कान्ति वाले दैदीप्यमान, सुन्दर कुण्डलों से युक्त एवं राजाओं से सम्बन्ध करने वाले होते हैं।
आहार
जो दया में तत्पर रहने वाली स्त्रियाँ रात्रि में भोजन नहीं करती हैं, उन्हें सेवकों के द्वारा तैयार किया हुआ इच्छानुकूल भोजन प्राप्त होता है।
आहार
जो स्त्रियाँ रात्रिभोजन से विरत रहती हैं, वे शान्त हृदय, शील सहित तथा साधु समूह के लिए हितकारी होती है।
आहार
दिन में भोजन करने से स्त्रियाँ श्रीकान्ता, सुप्रभा तथा सुभद्रा के समान लक्ष्मी तुल्य कान्ति वाली होती हैं।
आहार
जिन्होंने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया था, वे स्त्रियाँ यान तथा हाथी आदि वाहनों पर लीलापूर्वक गमन करती हैं और सुन्दर भवनों में निवास करती हैं, वे स्त्रियाँ स्वर्ग में इच्छानुकूल भोगों को प्राप्त होती हैं तथा मस्तक पर हाथ रख आज्ञा की प्रतीक्षा करने वाले परिवार से घिरी रहती हैं।
आहार
जिन पुरुषों ने पहले रात्रिभोजन का त्याग किया है, वे सुरीली आवाज वाले, निर्मल शरीर से युक्त तथा सुन्दर वस्त्राभूषणों से सहित मनुष्य होते हैं, वह सब रात्रिभोजन त्याग का ही फल है, इसमें संशय नहीं है।
आहार
जो मनुष्य सूर्यास्त हो जाने पर भोजन करते हैं, वे विद्वानों के द्वारा मनुष्यता से युक्त पशु कहे गये हैं।
आहार
जो रात्रि में भोजन करता है, वह अल्प आयु तथा अल्प धन से युक्त, रोग से पीड़ित शरीर वाला और परभव में सुख से हीन होता है।
आहार
जो दुर्बुद्धि रात्रि में भोजन करता है, वह हजारों उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल तक खोटी योनियों में दुःख को प्राप्त होता है।
आहार
रात्रि में भोजन करने से स्त्रियाँ अनाथ सौभाग्यहीन, माता-पिता तथा भाई से रहित, शोक एवं दरिद्रता से युक्त होती हैं, जिनके हाथ-पैर आदि अंग रूक्ष तथा फटे हुए हैं, जिनकी नाक चपटी है, जिनका देखना ग्लानि को उत्पन्न करता है, जिनके नेत्र कीचड़ से भरे हैं, जिनके लक्षण दुष्ट हैं, जिनके शरीर से दुर्गन्ध आती है, जिनके होठ कटे तथा मोटे हैं, जिनके कान विरूप है, जिनके केश पीले तथा रूक्ष हैं, जिनके दाँत तूमड़ी के बीज के समान हैं, शरीर सूखा हैं, जो कानी, लंगड़ी और कान्ति रहित हैं, विरूप हैं, कठोर चमड़ी वाली हैं, अनेक रोगों से सहित हैं, मलिन हैं, फटे वस्त्र वाली हैं खराब भोजन से जीवित हैं, दूसरों के कार्य पर आश्रित हैं, दुःखों के भार से दबी हुई हैं, बालावस्था में ही वैधव्य
आहार
रात्रिभोजन में तत्पर स्त्रियाँ कटे कान, कटी नासिका, धन तथा बन्धुओं से रहित पति को प्राप्त होती हैं, जो रूक्ष शरीर वाली दासी आदि है, जो पुत्र और पति से रहित हैं और जो दुर्भाग्य रूपी ग्रह से ग्रस्त हैं, वे रात्रिभोजन से ही होती हैं।
आहार
रात्रिभोजन के पाप से जीव दुर्गति को प्राप्त होते हैं, लोक में जो रोगी, दरिद्र और क्रूर पुरुष दिखाई देते हैं, वे भी रात्रिभोजन के पाप से दिखाई देते हैं, जिनके हाथ पैर फटे हैं, जो दीन हैं, लकड़ी और घास ढोते हैं, मलिन वस्त्र वाले हैं तथा नीच कुल में उत्पन्न हैं, वे सब रात्रिभोजन करने से ही होते हैं, रात्रिभोजन के फल से मनुष्य रोग से पीड़ित, दूसरों के घरेलू नौकर तथा अपने बन्धुजनों से रहित होते हैं, रात्रि में भोजन करने वाला मिथ्यादृष्टि मनुष्य सूकर, भेड़िया, बिलाव, उल्लू तथा कौआ आदि की योनियों में उत्पन्न होता है।
आहार
भोजन की तीव्र लालसा रखने वाला जो पापी जीव सूर्य के दृष्टि अगोचर हो जाने पर भोजन करता है, वह दुर्गति को नहीं जानता, यह नहीं समझता कि इस रात्रिभोजन के पाप से मुझे नरकादि दुर्गति में जाना पड़ेगा।
आहार
अन्धकार के समूह से जिसके नेत्र आच्छादित हो रहे हैं तथा पाप में जिसकी बुद्धि लग रही है, ऐसा पापी जीव मक्खी, कीड़े तथा बाल आदि को खा जाता है।
आहार
जो रात्रिभोजन करता है, वह डाकिनी–शाकिनी तथा भूत–प्रेतादि निन्द्य प्राणियों के साथ खाता है। जो रात्रि में खाता है उसने कुत्ता, चूहा, बिल्ली आदि मांसाहारी जीवों के साथ खाया अथवा व्यर्थ के विस्तार से क्या? इतना ही कहा जाता है कि रात्रि में खाने वाले ने सब अपवित्र पदार्थ खाये, रात्रि में दीपकों के ऊपर जो पिपीलिका आदि जीव पड़ते हैं, रात्रि में खाने वाले पुरुष ग्रासों के साथ उन्हें भी निगल जाते हैं।
आहार
जिन लोगों ने रात्रिभोजन रूप अधर्म को धर्म मान रखा है, उन पाप कर्म से क्रूर मनुष्यों को समझाना कठिन है।
आहार
सूर्य की किरणों से अछूता भोजन प्रेतों के समूह से (उच्छिष्ट) जूठा हो जाता है तथा सूक्ष्म जीवों से युक्त होता है, अतः रात्रि में खाना उचित नहीं है।
आहार
जो रात–दिन खाता है, वह जिनधर्म से विमुख है, व्रतरहित है तथा नियम से दूर है, ऐसा मनुष्य परभव में सुखी कैसे हो सकता है?
आहार
रात्रिभोजन के लोभी मनुष्य परभव में तिर्यञ्च तथा नरकादि गतियों में अन्धे, बौने, विकलांग, अल्पायु, शोक, क्लेश, विषाद तथा दुःख से परिपूर्ण, कोढ़ आदि रोगों से सहित, दरिद्रता से पीड़ित अत्यन्त चञ्चल और अल्प आदर वाले निश्चित रूप से होते हैं।
आहार