Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Speech

वाणी

450 सूत्र · पृष्ठ 2 / 6

वाद-विवाद में हठ और गर्मी ये मूर्खता के पक्के प्रमाण हैं।
वाणी
उज्जड़पन से दूसरों की हँसी उड़ाना ऐसा दुर्गुण है, जिससे सभी व्यक्तियों के भीतर घृणा पैदा होती है।
वाणी
सीधे आदेश देने की बजाय प्रश्न पूछिये।
वाणी
अनुभव के बिना बोलना विनाश का कारण होता है।
वाणी
अभिप्राय समझे बिना बे-मतलब किसी बात पर टीका-टिप्पणी करना वैसा ही है जैसे एक गधा दूसरे गधे की आवाज सुनकर रेंकने लगता है।
वाणी
हमेशा अपने काम से काम रखें, व्यर्थ के विवाद में न पड़े।
वाणी
लोगों को उनकी गलतियाँ सीधे तरीके से न बतायें।
वाणी
मधुर वाणी से सबको सींचना सीखो। मधुर व्यवहार से सबको खींचना सीखो ॥ क्रोध की जीत से हर हार अच्छी है। अगर किसी का दिल जीतना है तो प्रेम करना सीखो॥
वाणी
किसी की तरफ न देखना या मुँह से न बोलना, यह उसका सबसे बड़ा तिरस्कार है।
वाणी
किसी के सम्मान को भरी सभा में नष्ट करना मृत्यु के समान कष्टकारी है।
वाणी
बिना परिचय के किसी के साथ मजाक नहीं करना चाहिए।
वाणी
बाह्य चरणानुयोग के विषय में किसी समूह में बैठकर चर्चा करना झगड़ा मोल लेना है।
वाणी
दुर्जन निंदा के बिना नहीं रहता, जैसे कुत्ता सब रसों को खाकर भी विष्ठा के बिना संतुष्ट नहीं होता है।
वाणी
प्रज्ञावान वही व्यक्ति है, जो सुनता अधिक और बोलता कम है।
वाणी
प्रज्ञाशील लोग सर्वप्रथम सामने वाले की बात को पूर्ण सुनते हैं, तदुपरांत ही अपना मौन खोलते हैं, निज प्रज्ञा का परिचय प्रज्ञापूर्वक ही देना शोभनीय है।
वाणी
वाचालता अल्पज्ञता की पहचान है।
वाणी
जिसके जेब में पैसा न हो उसकी जुबान में मिठास होना चाहिए।
वाणी
सैकड़ों दलीलें एक तरफ और एक तरफ सुभाषित जो प्रतिद्वन्दी को निरुत्तर कर देता है, उसके जवाब में सामने वाले की जुबान नहीं खुलती, उसका पक्ष कितना भी प्रबल हो पर सुभाषितों में कुछ ऐसा जादू होता है कि मानो वह एक फूँक से दलीलों को उड़ा देता है।
वाणी
जिन्हें खुशामद प्रिय होती है, उन्हें सच्ची बात मीठी भाषा में कही जाये तो भी कड़वी लगती है।
वाणी
किसी की आलोचना न करो जिससे तुम्हारी भी कोई आलोचना न करे।
वाणी
तुम उन लोगों को भले ही शत्रु बनाओ, जिनका हथियार धनुष बाण है परन्तु उन लोगों को कभी मत छेड़ो जिनका हथियार जिह्वा है।
वाणी
यहाँ पर प्रायः नीच कुल में उत्पन्न हुए लोग कुलीन की, सौभाग्य हीन स्त्री पति की, कंजूस दानी की, अपवित्र पवित्रों की, निर्धन धनवानों की, कुरूप सुन्दर शरीर वालों की, पापी धर्मात्मा की, मूर्ख शास्त्रों के ज्ञाता-विद्वानों की और मिथ्यादृष्टि संतों की निन्दा करते हैं। गुरु का उपहास करने से व्यक्ति मरने पर गधा, निन्दा करने से कुत्ता उनकी सम्पत्ति का भोग करने से कृमि और ईर्ष्या करने से कीड़ा होता है।
वाणी
किसी मनुष्य की बुराई पर विश्वास मत करो, जब तक आप स्वयं उसे देख न लो और बुराई सचमुच देखने में आए भी तो उसे भूल जाओ, किसी पर प्रकट न करने लगो।
वाणी
सज्जन पुरुष दूसरे के दोष सुनने के समय बहरे बन जाते हैं।
वाणी
माता-पिता हाथ से मल-मूत्र धोते हैं, निंदक जीभ से, अतः माता-पिता से निंदक श्रेष्ठ हैं।
वाणी
आत्मप्रशंसा और परनिन्दा करने वाला नीचगति में जन्म लेता है।
वाणी
जो दूसरों के अवगुणों की चर्चा करता है, वह अपने अवगुण प्रकट करता है।
वाणी
सन्तों का धर्म है अहिंसा और योग्य पुरुषों का धर्म है पर निंदा से परहेज करना।
वाणी
निंदा एक ऐसा अवगुण है जो दुहरी मार मारता है यह निंदक तथा निंदित दोनों को घायल करता है।
वाणी
निन्दा अनेक पापों की जननी है।
वाणी
अपने को श्रेष्ठ दूसरों को अश्रेष्ठ समझने वालों के लिए निन्दा का रस सब रसों में उत्तम होता है।
वाणी
दूसरों पर कीचड़ न फेंको, हो सकता है कि आप निशाना चूक जाओ, फिर उसका बुरा हो या न हो किन्तु आपके हाथ तो खराब हो ही जाएँगे।
वाणी
दूसरों की निन्दा करके हम अपने बुरे होने का प्रमाण देते हैं।
वाणी
कभी-कभी मौन रह जाना सबसे तीखी आलोचना होती है।
वाणी
दूसरों की निन्दा करके अपने उभय लोक के दुश्मन मत बढ़ाइये।
वाणी
सिंह के साथ वन में रहना, हाथ में बिच्छू को लेना, कान में कनखजूरे को डालना, साँप के मुख में अँगुली डालना, विष पीना अच्छा है किन्तु धर्म व धर्मात्मा की निन्दा करना व दुष्ट के संग रहना अच्छा नहीं है, कारण कि इनकी संगति से एक ही भव बिगड़ता है किन्तु सन्त निन्दा से तो अनन्तों जन्म बिगड़ जाते हैं।
वाणी
किसी की निंदा मत करो क्योंकि जिसे आपने मार्ग का पत्थर समझा है वह पत्थर प्रतिमा भी बन सकता है, आपने जिस मार्ग के पत्थर को बेकार समझा है वही मंजिल की सीढ़ी बन सकता है।
वाणी
मुनियों के दोषों का चिन्तन करने वाला मनुष्य भाग्यहीन, विकलांग, मूर्ख, विवेक रहित, नपुंसक और नीच कार्य करने वाला नीच होता है।
वाणी
मनुष्य की अच्छी बात तो दब जाती है और बुराई तथा बदनामी की बात लू की तरह (भाँति) शीघ्र चारों ओर फैल जाती है।
वाणी
संसारी प्राणी निंदा में अपनी हानि समझकर लोकलाज से संक्लिष्ट बना रहता है।
वाणी
निंदक स्वयं नरक का भार लेता है और दूसरों को नरक से बचाता है।
वाणी
निंदा करना और सुनना दोनों पाप हैं।
वाणी
उपहास मृत्यु से अधिक कटु है।
वाणी
व्यर्थ में समय बर्बाद मत करो यदि किसी प्रश्न का उत्तर एक शब्द में होता है तो एक शब्द बोलकर बात खत्म कर दो।
वाणी
पर के दोष कहने में मौन हो जाना चाहिए।
वाणी
मौन रहने से झगड़ा नहीं होता है। सावधान रहने से भय नहीं होता है।
वाणी
अज्ञान की सबसे बड़ी सम्पत्ति है मौन, इस रहस्य का ज्ञान होने पर अज्ञानी को अपमानित नहीं होना पड़ता है।
वाणी
गुणियों में गुणों के रहते हुए भी चुगलखोर उनके दोष मात्र को ही ग्रहण करता है, जैसे ऊँट वृक्ष के पुष्प और फल से विरक्त होकर काँटों के ढेर को ही ग्रहण करता है।
वाणी
किसी से ऐसा मत कहो कि तुम बुरे हो वरन् उससे यह कहो, तुम अच्छे हो और भी अच्छे बनों।
वाणी
अहो! छोटे लोगों का हृदय सुकुमार होता है क्योंकि वे हृदय में आये हुए अप्रिय को सहसा बक डालते हैं और उसे ही 'मनीषी' लोग पेट में पचा डालते हैं।
वाणी
परमात्मा को हृदय और जीभ की कठोरता पसंद नहीं है इसलिए हृदय और जीभ में हड्डी नहीं रखी गयी है इसके बाद भी लोग जीभ के द्वारा दूसरों के हृदय तोड़ते हैं यह आश्चर्य है।
वाणी
लोगों को समझाने में समय नष्ट न करें लोग वही सुनेंगे जो वे सुनना चाहते हैं।
वाणी
परिवार व्यक्तियों के समूह से नहीं प्यार की अभिव्यक्तियों से बनता है, मीठा खाने को न मिले तब भी मीठा बोलें, जो मन में आये वह न बोलें अपितु जो औरों को भाये वह बोलें, मनचाहा बोलोगे तो अनचाहा सुनना पड़ेगा।
वाणी
तुम बोलो या न बोलो इस बात का गम नहीं है, तुम मुस्कुराकर देख लो यह भी बोलने से कम नहीं है।
वाणी
हम समझते कम, समझाते ज्यादा है अतः सुलझते कम, उलझते ज्यादा है।
वाणी
इंसान एक दुकान है और जुबान उसका ताला है, ताला जब खुलता है तब मालूम होता है कि दुकान सोने की है या कोयले की?
वाणी
बोलते हैं तो बरस जाते, चुप रहते हैं तो तरस जाते हैं लोग।
वाणी
अपनी वृद्धि और विनाश जीभ के अधीन है।
वाणी
किसी के मन की बात निकालना हो तो उत्तर मत देना, पहले पूरी सुनना बीच में टोकना नहीं क्योंकि समूह में अनुभव मिलता है एकान्त में आनंद मिलता है।
वाणी
जिसे तनाव में डालना हो, उसे जिम्मेदारियाँ सौंप दो। खाली गाड़ी आवाज ज्यादा करती है व भरी शान्त निकल जाती है, ऐसे ही कोई ज्यादा बोले तो उसे समझाओ मत, जिम्मेदारी सौंप दो वह अपने आप शान्त हो जायेगा।
वाणी
मोक्ष जाना है तो मुनि बनकर मौन रहो, जैसे तीर्थंकर मुनि बनकर मौन हो जाते हैं। भोजन जल्दी वही पकता है जिस पर ढक्कन रखा होता है, जितना ढक्कन बंद रखोगे उतनी वाष्प बनेगी, उतनी ऊर्जा संचित होगी, उतने जल्दी मोक्ष में गमन होगा। मौन से धर्म और यश की वृद्धि होती है।
वाणी
अस्त्र-शस्त्र तो अंग में लगता है पर वचन सर्वांग में लगता है।
वाणी
समझदार लोग पहले सामने वाले की बात सुनते हैं फिर अपना मौन खोलते हैं।
वाणी
समझदार की जुबान रक्षक और नासमझ की जुबान फाँसी बन जाती है।
वाणी
जीवन में संकटों को सहन कर लेना, पर किसी को कठोर शब्द मत कहना क्योंकि आपके द्वारा कहा हुआ कठोर शब्द संकटों का पहाड़ खड़ा कर सकता है।
वाणी
बुद्धिमान पुरुष ज्ञानवान होने पर भी बिना पूछे या अन्यायपूर्वक पूछने पर किसी को कोई उपदेश न करें जड़ की भाँति चुप-चाप बैठे रहें।
वाणी
ईमानदार मनुष्य स्वभावतः स्पष्ट भाषी होता है, उसे अपनी बातों में नमक मिर्च लगाने की जरूरत नहीं होती है।
वाणी
विद्वान् कभी अपशब्द का प्रयोग नहीं करता है।
वाणी
अपने से मतभेद रखने वाले व्यक्तियों के समक्ष भाषण करना उसी प्रकार है, जिस प्रकार अमृत को मलिन स्थान पर डाल देना है।
वाणी
योग्यताएँ आलोचना के तुषार से कुम्हला जाती हैं परन्तु प्रोत्साहन की खाद से वे योग्यताएँ फलने-फूलने लगती हैं।
वाणी
जो लोगों की प्रशंसा करता है वह लोगों को अपने वश में कर लेता है, फिर लोग उससे इतना प्रेम करने लगते हैं कि उसके दुःख को अपना दुःख समझने लगते हैं।
वाणी
प्रतिद्वंदी द्वारा की गई प्रशंसा सर्वोत्तम कीर्ति है।
वाणी
यदि तुम चाहते हो कि कोई तुम्हारी प्रशंसा करे तो पहले तुम उसकी प्रशंसा करो।
वाणी
किसी के गुणों की प्रशंसा के साथ उसके गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए।
वाणी
मनुष्य के भीतर जो कुछ सर्वोत्तम है उसका विकास प्रशंसा और प्रोत्साहन द्वारा किया जा सकता है।
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