Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 86

माथे पर तिलक।

13 सूत्र

माता-पिता के घर, मित्र के घर, गुरु के घर और ईश्वर के घर जाने के लिए निमन्त्रण की जरुरत नहीं होती है।
भक्ति
मन्दिर, सम्मेदशिखर आदि आयतन की पूजा करते हैं एकेन्द्रिय या जड़ की नहीं।
भक्ति
स्वाध्याय में अहङ्कार हो सकता है पर भक्ति व जाप में अहंकार की सम्भावना कम होती है।
भक्ति
राजगृही के पाँचों पर्वत भगवान् वासुपूज्य को छोड़कर सभी तीर्थंङ्करों के समवसरणों के आगमन से पवित्र हुए हैं।
भक्ति
जो तीनों कालों में निर्वाण भक्ति पढ़ता है वह स्वर्ग-मोक्ष का पात्र होता है।
भक्ति
भगवान् पैर पर पैर इसलिए रखे हैं क्योंकि चलना बाकी नहीं है, हाथ पर हाथ रखे इसलिए बैठे हैं क्योंकि कुछ करना बाकी नहीं है, नासाग्र दृष्टि किये हैं क्योंकि कुछ देखना बाकी नहीं है, ज्ञान चक्षु खुल गया है इसलिए चर्म चक्षु बन्द हो गये हैं मात्र आत्मदर्शन कर रहे हैं।
ध्यान
यज्ञ करके पशुओं को मारकर रुधिर का कीचड़ करके अगर स्वर्ग में जाया जाता है तो नरक कैसे जाया जायगा?
अहिंसा
इन्द्रियों को पशु बना करके, तपोमय वेदी बना करके और अहिंसा की आहूति बना करके आत्म यज्ञ करना चाहिए।
संयम
पुजारी प्रार्थना करता है, हे प्रभो! तुम्हे जो मिला है वह मुझे भी मिल जाय और भिखारी याचना करता है कि हे प्रभु! तुमने जो छोड़ा है वह मुझे मिल जाय।
भक्ति
सुमेरु समान निश्चल भक्ति संसार नाश कर मुक्ति लाभ कराती है।
भक्ति
भक्त जन को सब विद्या सिद्ध हो जाती हैं, भक्ति के विना जो साधु खूब चरित्र पालता है उसका तप बञ्जर भूमि में बोये शाली धान के बीज के समान निष्फल है।
भक्ति
मन से पञ्च परमेष्ठी के गुणों में अनुराग होना भाव पूजा है एवं हाँथ जोड़ना बैठकर नमस्कार करना आदि द्रव्य पूजा है।
भक्ति
माथे पर तिलक यह सङ्केत करता है, कि भगवान् का आदेश हमें शिरोधार्य है। भगवान् पर विश्वास ही जीवन है और सन्देह ही मृत्यु है।
भक्ति