Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 68

पाप आस्रव के कारण।

11 सूत्र

बन्धु विरोध करे सगरे, झगरे नित होत सुधारस चाँटत, मित्र करे करनी रिपु की, धरणीधर देखत न्याव न पाटत। पूत कपूत का कार्य करे, नारी सती पति सो चित पाटत, या विधिना प्रतिकूल भये तब, ऊँट चढ़े पे कूकर काटत।। — अर्थात् 'पाप के उदय में' बन्धु विरोध करने लग जाते हैं, अमृत चाँटते हुए भी झगड़े होते हैं, मित्र शत्रु जैसा व्यवहार करने लग जाता है, राजा देखते हुए भी न्याय नहीं करता है, पुत्र कुपुत्र का काम करने लग जाता है, सती स्त्री भी पति से विरक्त हो जाती है, ऊँट पर सवारी करने पर भी कुत्ता काट देता है।
कर्म
प्रमाद युक्त चर्या, परिणामों की मलिनता, विषयों की लोलुपता, दूसरे को कष्ट देना, परनिन्दा करना, आहार, भय, मैथुन, परिग्रह ये चार संज्ञाएँ, कृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्यायें, इन्द्रियों की पराधीनता, आर्त-रौद्र ध्यान, ज्ञान का दुरुपयोग और मोह ये सभी 'पाप आस्रव के कारण' हैं।
कर्म
एकान्त आदि पाँच मिथ्यात्व, क्रूर परिणाम, पच्चीस कषाय, पन्द्रह प्रमाद, कुटिलता में तत्पर पन्द्रह योग, आठ मद, चार संज्ञाएँ, पञ्चेन्द्रियों के सत्ताईस विषय, चार आर्तध्यान, चार रौद्रध्यान, सात व्यसन, व्रत धारण कर विषाद करना, पाँच पाप, बारह अविरति, राग-द्वेष, मिथ्यात्व, सात भय, तीन वेद और शोक पच्चीस क्रियाओं में सम्यक्त्ववर्धिनी क्रिया को छोड़कर शेष चौबीस क्रियाएँ और मायाचार ये सब पाप बन्ध के लिए होते हैं अर्थात् उपर्युक्त कारणों से पाप बन्ध होता है।
कर्म
विना छने जल में असंख्यात जीव होते हैं, अत: विना छना पानी पीने वाला पुरुष पाप का अर्जन करता है।
अहिंसा
जिनेन्द्र भगवान् ने एक बूँद मात्र जल में जो जीव बतलाये हैं, वे यदि कबूतर के बराबर हो कर उड़ें, तो जम्बूद्वीप में न समावेंगे।
अहिंसा
हिंसादि पाँच पाप क्रोधादि चार कषाय, मिथ्याज्ञान, पक्षपात, मात्सर्य, आठ मद, दुरभिनिवेश, तीन अशुभ लेश्याएँ, चार विकथा, चार आर्तध्यान, चार रौद्रध्यान, ईर्ष्या, असंयम और तीन शल्यों में जो प्रवृत्ति है वह अशुभ भाव है।
कर्म
ब्राह्मण भोजन से सन्तुष्ट होते हैं, मयूर मेघ गरजने से, सज्जन पर की सम्पत्ति देखकर और दुर्जन पर की बिपत्ति देखकर सुखी होते हैं।
चरित्र
पाप के उदय से देव भी कुत्ता बन जाता है और पुण्य के उदय से कुत्ता भी देव बन जाता हैं धर्म के प्रभाव से प्राणी को अचिन्त्य विभूति कि प्राप्ति होती है।
कर्म
चन्द्रमा आकाश में विहार करता है, अन्धकार को दूर करता है, हजारों किरणों का धारक है, ज्योतिर्विमानों के मध्य में चलने वाला चन्द्रमा भी भाग्य के योग से राहु द्वारा ग्रस लिया जाता है, क्योंकि हो ललाट पर लिखी हुयी रेखा मिटाने में कौन समर्थ है। कौन टाल सकता है?
कर्म
कौन जानता है, कब क्या होने वाला है? अहो! राज्याभिषेक के समय राम का वन गमन हुआ था।
कर्म
सोने के मृग का जन्म लेना असम्भव है, फिर भी रामचन्द्र जी स्वर्ण मृग से प्रभावित हो गए, सो ठीक है क्योंकि विपत्ति के काल में बुद्धिमानों की बुद्धि भी नष्ट हो जाती है।
ज्ञान