Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 401

शव और शिव।

17 सूत्र

शव और शिव- शव की यात्रा दूसरों के आश्रित होती है और शिव की यात्रा स्वयं के आश्रित होती है।
संयम
जैसे बकरे को सुगन्धित तेल पिलाने पर भी वह दुर्गन्ध रहित नहीं होता है, वैसे ही भ्रष्ट साधु संयमी होने पर भी विषय कषाय का त्याग नहीं करता, जैसे पशु को उत्तम भोजन मिलने पर भी वह घास ही खाता है, उसी प्रकार दीर्घ काल तक दीक्षित होकर भी भ्रष्ट साधु इन्द्रिय विषय और कषाय के परिणाम ही करता है।
संयम
दिगम्बर मुनि होने के लिये केवल तन के वसन नहीं उतारना पड़ते, बल्कि मन की वासनाओं को भी उतारना पड़ता है।
संयम
व्रत ग्रहण करने वाला मुनि गुरु की बायीं ओर बैठता है तब गुरु व्रत धारण कराते हैं।
धर्म
आर्यिका सङ्गति त्याग- हे साधो! अग्नि और विष के सदृश आर्यिका सङ्गति का त्याग करो।
ब्रह्मचर्य
मिथ्यादर्शन ज्ञान की, पीड़ा सही न जात। गुरु का दर्शन जब मिले, दुःख सारा मिट जात।।
भक्ति
भव जल में डूबे हुए कर्म मगर दे त्रास। गुरु नौका पर बैठकर होवे भव से पार।।
भक्ति
गुरु की महिमा वरणी न जाय। गुरु नाम जपूँ मन वचन काय।।
भक्ति
गुरु कुम्हार घट शिष्य है, गढ़-गढ़ काढ़े खोट। अन्दर हाथ पसार के बाहर मारे चोट।।
भक्ति
गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लागु पाय। बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय।।
भक्ति
जात न पूँछो साधु की पूँछ लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।।
विवेक
चमन में फूल खिलते है, गले का हार बनने को। गुरु उपदेश दे दो तुम, भव से पार होने को।।
भक्ति
गुरु से शिष्य की कौन सी बात अनजानी है। सागर को पता है बूँद में कितना पानी है।।
भक्ति
हम निन्दक के प्रतिकूल नहीं, हम पूजक के अनुकूल नहीं। हम अपनाते हैं फूल नहीं, और ठुकराते हैं शूल नहीं।।
संयम
भीतर लगन लगती है, तो सन्त में अरहन्त दिखते हैं। अन्यथा मारीच को आदिनाथ अच्छे नहीं लगते हैं।।
भक्ति
शिष्य और शीशी को डाट जरुरी है, अन्यथा कीमती वस्तु नहीं ठहर सकती है।
विवेक
साधु शरीर छोड़ सकते हैं पर सिद्धान्त नहीं, हाड़ मांस के पिण्ड को गुरु नहीं कहते हैं, ज्ञान को गुरु कहते हैं।
ज्ञान