Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 394

श्रुत पञ्चमी।

15 सूत्र

जो व्यक्ति हर परिस्थिति में प्रसन्न रहे वह सम्यग्ज्ञानी है।
ज्ञान
पूजा दो प्रकार की- व्यवहार पूजा- शास्त्रों की पूजा, वेष्टन (अछार) लगाना, सफाई करना, जीर्णोंद्धार करना, आदि। निश्चय पूजा- श्रुत के अर्थ को आत्मसात करना, भाव श्रुत को हृदयंगम करना, मिथ्यात्व से मुक्ति आदि।
भक्ति
वीरप्रभु के मोक्ष के बाद क्रमशः तीन केवली, पाँच श्रुतकेवली हुये जिनके नेतृत्व में जैन सङ्घ एक सौ बासठ वर्षों तक अविभाजित रहा।
धर्म
केवली काल बासठ वर्ष- श्री गौतमस्वामी बारह वर्ष, श्री सुधर्मास्वामी ग्यारह वर्ष, श्री जम्बूस्वामी उन्तालीस वर्ष। पञ्चम काल में 3 अनुबद्ध केवली के अलावा 700 केवली और मोक्ष गये जो भगवान् महावीर स्वामी के समवसरण में विराजमान थे। उनको केवल ज्ञान भगवान् के समवसरण में हो गया था और 3 अनुबद्ध केवली को भगवान् के मोक्ष जाने के बाद केवलज्ञान हुआ। अतः इनकी प्रसिद्धि हुयी।
विविध
आचार्यश्री का आदेश शिरोधार्य कर पुष्पदन्तजी ने णमोकारमन्त्र के रूप में मंगलाचरण कर, ग्रन्थ लिखना प्रांरभ किया, वीसदि नामक (सत् प्ररूपणा पहली पुस्तक) सूत्रों की रचना की, उनको देखकर भूतबलि जी ने द्रव्य प्रमाणानुगम आदि (शेष पन्द्रह पुस्तक) से ग्रन्थ पूर्ण किया। ज्येष्ठ शुक्ला पञ्चमी के दिन ही इस ग्रन्थ की पूर्णता हुयी, तभी से यह दिन श्रुतपञ्चमी के रूप में मनाया जाता है श्रुतपञ्चमी को ज्ञानपञ्चमी भी कहते हैं। जीवट्ठाण, खुद्दाबन्ध, बन्धस्वामित्वविचय, वेदना, वर्गणा एवं महाबन्ध नामक छह खण्ड होने से षट्खण्डागम कहलाता है, वर्तमान में आठवीं शताब्दि में हुये आचार्य वीरसेन द्वारा लिखित धवला टीका उपलब्ध है।
ज्ञान
श्रुतकेवली काल सौ वर्ष- श्री विष्णुमित्र चौदह वर्ष, श्री नन्दिमित्र सोलह वर्ष, श्री अपराजित बाईस वर्ष, श्री गोवर्धन उन्नीस वर्ष, श्री भद्रबाहु उनतीस वर्ष तक रहे। इस प्रकार श्रुतकेवलियों का काल 100 वर्ष का रहा।
विविध
श्री ब्रम्हदेव सूरी चार सौ वर्ष पूर्व के हैं, श्री जयसेनाचार्य सात सौ-आठ सौ वर्ष पहले के हैं।
विविध
एक मत के अनुसार पाँच अनुबद्ध केवली हुए हैं- इनमें श्रीधर केवली जी अन्तिम हैं।
विविध
जैसे सूत्र (धागा) से सहित सुई गुमती नहीं है, उसी तरह सूत्र अर्थात् शास्त्र ज्ञान से सहित जीव संसार में भ्रमण नहीं करता है।
ज्ञान
सर्वज्ञ द्वारा कथित बारह प्रकार के तपों में स्वाध्याय के समान कोई तप न था, न है और न होगा।
ज्ञान
अज्ञान वह अन्धेरी रात है, जिसमें न चांद है न सितारे अथवा अज्ञान समस्त दुखों को उत्पन्न करने का कारखाना है।
ज्ञान
अज्ञान को अन्धकार की उपमा दी है, जैसे अन्धेरे में काँच, काँटा, सर्प, गड्ढा आदि दिखाई नहीं देते, उसी प्रकार अज्ञानी की दुर्दशा होती है।
ज्ञान
आते वक्त वस्त्रों का और जाते वक्त गुणों का सम्मान होता है। शरीर नहीं सिद्धान्त प्यारे होने चाहिए।
चरित्र
हम दूसरों को उपदेश देने में चतुर हैं, स्वयं करने में असमर्थ हैं, केवल वेष बना लिया और पर को उपदेश देकर महान बनने का प्रयत्न करते हैं, यह सब मोह की महिमा है।
विनम्रता
शारदा स्तुति- शारदे नमस्कार करता हूँ बार-बार, ज्ञान का तो वरदान एक बार चाहिए। माता जगमाता है तू भाग्य की विधाता है तू, तेरा प्यार मात मुझे एक बार चाहिए। कण्ठ और लेखनी पे होजा तू विराजमान, माथे पे तो हाथ मात एक बार चाहिए। योगी तो है तेरा दास उससे न हो उदास, ज्ञान तो अधूरा मात्र केवलज्ञान चाहिए।।
भक्ति