Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 392

अक्षयतृतीया- आज का दान।

15 सूत्र

भरत क्षेत्र में अठारह कोड़ाकोड़ी सागर तक दाता-पात्र का अभाव था, इतने काल तक भोगभूमि थी, (षट्काल का वर्णन)।
दान
जघन्य भोगभूमि के काल में पल्य का आठवां भाग शेष रहने पर कुलकरों की उत्पत्ति हुयी थी, उन्होंने कर्मभूमि का परिचय कराया था, चौदहवें कुलकर नाभिराय के यहाँ प्रथम तीर्थंङ्कर सर्वार्थसिद्धि से पधारे थे।
धर्म
इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने गर्भ के छः माह पूर्व नगरी की रचना की थी, रोज तीन या चार बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा पन्द्रह माह तक करता रहा।
विविध
सौधर्मेंन्द्र जन्म के समय ऐरावत हाथी पर कल्याणक मनाने आता है। हाथी की अवगाहना विक्रिया से एक लाख योजन होती है। सौ मुख, एक-एक मुख में आठ-आठ दाँत, एक-एक दाँत पर एक-एक सरोवर, एक-एक सरोवर में एक हजार आठ पाँखुड़ी के एक सौ आठ कमल, एक-एक पाँखुड़ी पर एक-एक अप्सरा नृत्य करती हुई आती है।
विविध
आदिनाथ भगवान् की चौरासी लाखवर्ष पूर्व की आयु थी। बीस लाखवर्ष पूर्व की कुमारावस्था थी। तिरेसठ लाखवर्ष पूर्व राज्य किया, एक लाखवर्ष पूर्व तक तप किया था।
विविध
नीलाञ्जना की मृत्यु से वैराग्य हुआ था, पञ्चमुष्ठि केशलोंच कर दिगम्बर बने थे, साथ में चार हजार राजा दीक्षित हुये थे।
अनासक्ति
छह माह का उपवास लेकर ध्यान में स्थित रहे, इसके बाद सात माह सात दिन अर्थात् तेरह महीने सात दिन में आहार चर्या हुई थी।
पुरुषार्थ
मैनासुन्दरी ने तप के प्रभाव से दसवें स्वर्ग में स्त्रीपर्याय को छेदकर इन्द्र पद को प्राप्त किया, आगे मोक्ष जावेंगी। सिद्धचक्र के प्रभाव से अनन्त संसारी श्रीपाल जी ने मुक्ति पद को पाया था।
कर्म
लोग आहार विधि से अपरिचित थे। अठारह कोड़ा-कोड़ी सागर काल का अन्तराल हो गया था, लोग वस्त्र, आभूषण, राज्य, कन्या, आदि वस्तुयें दान में देने के लिए दिखाते थे, लेकिन नवधा भक्ति नहीं जानते थे इसलिये आदिनाथ जी नहीं रुके थे।
दान
तेरह माह छः दिन व्यतीत हो गये थे, तब हस्तिनापुर के राजा श्रेयाँस को वैशाख शुक्ला द्वितीया के पिछले पहर में स्वप्न आया था, प्रातः काल मालूम हुआ कि आदिनाथ जी का चर्या हेतु नगर प्रवेश हो रहा है।
धर्म
राजा श्रेयाँस ने अपने भाई सोम और लक्ष्मीमति से कहा आप हमारे साथ पड़गाहन करने चलो, हम जैसा कहें वैसा करते जाना, राजा श्रेयाँस ने आदिनाथ जी का पड़गाहन किया और हर्ष के आसुओं से पाद प्रक्षालन किया, इक्षुरस से आहार सम्पन्न हुआ। पञ्चाश्चर्य हुये, अक्षीण महानस हो गया, उस दिन सारे नगरवासियों ने इक्षुरस का पान किया था किन्तु समाप्त नहीं हुआ, वह दिन अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध हुआ था। भरतचक्रवर्ती को मालूम हुआ कि भगवान् का आहार हो गया है। तो वे हस्तिनापुर आये, श्रेयाँस के घर गये। वे भगवान् को भेज कर वन से वापस आ रहे थे। भरतचक्रवर्ती वन जा रहे थे, छेवले के वृक्ष के नीचे बैठकर चक्रवर्ती का श्रेयाँस और सोमप्रभ से मिलन हुआ था, चक्रवर्ती ने श्रेयाँस को दान तीर्थंङ्कर की घोषणा की थी।
दान
आदिनाथ जी धर्मतीर्थ के प्रवर्तक हुए थे। श्रेयाँस जी दानतीर्थ के प्रवर्तक हुए थे। भरतजी आदिनाथ जी के केवलज्ञान के समय चक्रवर्ती बने थे।
दान
प्रथम मुनि को प्रथम बार आहार दान देने वाले श्रेयाँस और सोमप्रभ उसी भव से मोक्ष पधारे।
दान
षट्कर्म की व्यवस्था के समय, आदिकुमार ने बैल के मुख में मुसीका लगाने का नियम बनाया था, जिसके कारण अन्तराय कर्म का बन्ध किया था, इसलिए उनको तेरह माह छः दिन तक आहार नहीं मिला था।
कर्म
शान्तिसागर जी ने दीक्षा के बाद आगम के अनुसार आहार लेने का नियम लिया था, चार दिन तक आहार नहीं मिला था, तब जनता ने उनके गुरू से पूँछ कर व्यवस्था बनायी थी, आदिनाथ जी के समय बताने वाला कोई नहीं था।
धर्म