Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 38

स्त्री दुःख। जुआ।

6 सूत्र

यौवन, जीवन, मन, छाया व सौन्दर्य, लक्ष्मी और स्वामित्व ये छह चञ्चल हैं ऐसा जानकर धर्म में सलग्न होना चाहिए।
अनासक्ति
दरिद्रता सज्जन स्वभाव का नाश करती है, दान दुर्गति का नाश करता है, बुद्धि अज्ञान का नाश करती है और सद् भावना भव का नाश करती है।
धर्म
जैसा व्यक्ति अन्न खाता है वैसी बुद्धि होती है, जैसे दीपक अन्धकार खाता है तो काजल का वमन करता है।
आहार
देश और विदेश के भेद से संसार दो भागों में बँटा है- देश में भगवत्ता है, विदेश में भौतिकता है। देश में पवित्रता है, विदेश में पतन है। देश में वीतराग विज्ञान की शिक्षा दी जाती है, विदेश में भौतिक निर्माण की शिक्षा दी जाती है। देश धर्म को लेकर आगे बढ़ता है, विदेश धन के पीछे भागता है। देश में आत्मा को शुद्ध करने का उपदेश दिया जाता है, विदेश में देह को सम्भालने का उपदेश दिया जाता है। देश में मन्दिर हैं, जिससे संस्कार मिलते हैं, विदेश में सिनेमा घर हैं, जिनमें भौतिक जीवन जीने की शिक्षा मिलती है।
धर्म
स्त्री दुःख-1.परतन्त्रता का दुःख 2.पति के दुर्लभ होने पर शरीर को व्यर्थ समझती है 3.सपत्नि के होने का दुःख 4.मासिक धर्म से होने का दुःख 5.बन्ध्या होने का दुःख 6.विधवा होने का दुःख 7.प्रसूति होने का दुःख 8.अन्धी सन्तान होने का दुःख 9.पति के नहीं चाहने का दुःख 10.भाग्य हीन पति मिलने का दुःख 11.लड़की-लड़की ही गर्भ में आने का दुःख, 12.बार-बार मृत सन्तान होने का दुःख 13.बिल्कुल अनाथ हो जाने का दुःख 14.गर्भ धारण करने का दुःख, 15.पति के जीवित रहते हुये वियोग होने का दुःख 16.हृदय पीड़ा कारक रोग होने का दुःख।
विविध
कुम्भकार मिट्टी का घड़ा बनाकर उसे तपने के लिये भट्टा में रख देता है, पकने के पहले उसमें पानी की एक बून्द भी नहीं पड़ने देता, और पकजाने पर जल घड़े का कुछ बिगाड़ नहीं पाता, उसी प्रकार माता-पिता बच्चों को कठोर अनुशासन में रखते हैं, तो वे बड़े होने पर बिगड़ नहीं पाते हैं।
परिवार