'जगत्कायस्वभावौ वा संवेग वैराग्यार्थम्'-इन दो में बारह भावनाएँ आ जाती हैं या पूरा भावना अधिकार आ जाता है। ध्यान 0 – भेजें
एक व्यक्ति को पुत्र नहीं हो रहा था, ज्योतिषी ने कहा जब तुम बारह वर्ष का प्रवास करोगे, तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो जायेगी, वह विदेश गया, यहाँ पुत्र भी ग्यारह वर्ष का हो गया, पिता को कभी देखा नहीं था, फोटो देखकर स्टेशन पर लेने गया, बहुत ठण्ड थी वह बालक पिता की प्रतीक्षा में बैठा रहा, ठण्ड में चिल्लाता रहा, अपरिचित होने से अपने रूम से उसको बाहर निकाल दिया, ठण्ड के कारण मर गया, सुबह घर जाकर पता किया बेटा कहाँ है, पत्नी ने कहा! वह तो आप को लेने गया था, पता चला मेरा ही बेटा था, मैंने ही कमरे से निकाल दिया था, यह जगत का स्वभाव है। अनासक्ति 0 – भेजें
भारत में हजारों ट्रेनें चल रही हैं, यदि हमारा त्याग नहीं हैं तो हमें आरम्भ का दोष लग रहा है, इसलिए आज हम वाहन का प्रयोग नहीं करेंगे, ऐसा नियम कर लेना चाहिये, कपड़ों का, नल के पानी का और गृहस्थी सम्बन्धी अनावश्यक कार्यों का त्याग करने से पाप से बच जाते हैं। अनासक्ति 0 – भेजें
टी.वी. नहीं है तो 'मिल जाए' इस निमित्त आर्तध्यान होता है और है तो देखने से विषय कषाय की पुष्टि करता है इसलिए रौद्रध्यान होता है। ध्यान 0 – भेजें
कीचड़ सने झाड़ू से घर साफ नहीं होता उसी प्रकार कषायों से सनी आत्मा को सुख नहीं मिलता है। क्षमा 0 – भेजें
एक-डेढ़ वर्ष की बच्ची रेंगते-रेंगते गयी और टी.वी. खोल कर देखने लगी, किसी ने पूँछा कैसे सीख गयी? उत्तर मिला! उसकी मम्मी देखती थी, इसलिए पेट से ही सीख कर आई है। कर्म 0 – भेजें
शक्ति से अधिक करने से ख्याति, पूजा, लाभादि की चाह सिद्ध होती है और शक्ति छिपाकर करने से श्रद्धा की न्यूनता सिद्ध होती है। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जैसे विभीषण राक्षस वंश का होते हुए भी, राक्षस वंश के विनाश का कारण बना, लकड़ी काटने में कुल्हाड़ी में लगा लकड़ी का बेंट ही कारण है तथा लोहे को लोहा काटता है उसी प्रकार तीर्थंकर प्रकृति कर्म के वंश की होते हुए भी कर्मों के वंश को नष्ट करने वाली है। कर्म 0 – भेजें