सामान्य से तीन प्रकार का योग होता है, विशेष की अपेक्षा पन्द्रह प्रकार का योग होता है, चार मनोयोग- सत्य, असत्य, उभय, अनुभय, चार वचनयोग-सत्य, असत्य, उभय, अनुभय, सात काययोग- औदारिक, औदारिकमिश्र, वैक्रियक, वैक्रियकमिश्र, आहारक, आहारकमिश्र, कार्मण काययोग। विविध 0 – भेजें
परमार्थ से यदि काय से पाप हुआ है तो सौ प्रतिशत दण्ड, वचन से हजार प्रतिशत दण्ड, मन से दस हजार प्रतिशत दण्ड भोगना पड़ता है। लोकव्यवहार में मन से पाप हुआ है तो कोई दण्ड नहीं मिलता, वचन से पाप हुआ है तो हजार प्रतिशत दण्ड मिलता है और काय से पाप हुआ है तो दस हजार प्रतिशत दण्ड मिलता है। कर्म 0 – भेजें
तन की शक्ति को विकसित करने के लिए मन को ठीक करें, यही मन स्विच बोर्ड है, सारा कनेक्शन यहीं है, सारे सॉफ्टवेयर के तार इसी मन से जुड़े हैं। मन 0 – भेजें
सारी बीमारी व स्वस्थता सोच पर निर्भर है 'थूबोनजी' क्षेत्र में प्रायः सभी सङ्घ बीमार था, एक बहन भी बीमार हो गयी, उनके लिये आचार्य श्री जी से उपाय पूँछा तो उन्होंने कहा ''नहा दो'' (नहा वनस्पति) यही बात उन बहन से कही तो उन्होंने आस्था वश औषधि की जगह नहा लिया (स्नान) और वे ठीक भी हो गयीं। जबकि नहा नामक दवा देने को कहा था। मन 0 – भेजें
वचनों की शक्ति- गुस्सा आने पर शान्तस्वभावोऽहम्, शान्तस्वभावोऽहम्, शान्तस्वभावोऽहं ऐसा चिन्तन करने से गुस्सा शान्त हो जाता है। क्षमा 0 – भेजें
'पर्ययविजुदं'- एक व्यक्ति को आभूषण बनवाने के लिए सोना खरीदना था लेकिन वह सोना किसी भी पर्याय मे नहीं चाहता था, पर विना पर्याय के सोना प्राप्त नहीं होता है, द्रव्य-गुण-पर्याय तीनों को ध्यान में रखने से ही तत्त्व का सही निर्णय होता है। Discernment 0 – भेजें
अणवः स्कन्धाश्च सूत्र में समास क्यों नहीं किया? क्योंकि यहाँ भेद रूप कथन किया है। इस सूत्र से पहले जो दो सूत्र कहे हैं, 'स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तःपुद्गलाः', 'शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवन्तश्च' के साथ अलग सम्बन्ध बताने के लिये किया है, अणु स्पर्श रस गन्ध वर्ण वाले हैं, किन्तु स्कन्ध शब्द बन्ध एवं स्पर्शादि वाले हैं। ज्ञान 0 – भेजें