Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 307

अपने पन से दुःख।

8 सूत्र

आँख खुली तो सपना गया, जब आँख मिची तो अपना गया। नश्वर है संसार यह जब आँख फिरी तो दफना गया।।
समाधि
आगाह (अनिश्चित) अपनी मौत का, कोई वसर(ठिकाना) नहीं, सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं।
समाधि
तृष्णा की खाई खूब भरी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही।
संतोष
क्रोधादि से तो कभी-कभी कर्म बन्ध होता है, परन्तु परिग्रह से तो हमेशा पाप का बन्ध होता है, अतः परिग्रह धारियों को कभी मोक्ष नहीं होता है।
अनासक्ति
ईमानदारी के धन से सज्जनों की भी सम्पत्ति नहीं बढ़ती है, जिस प्रकार स्वच्छ जल से समुद्र नहीं भरता है।
धन
अन्याय से उपार्जित धन दस वर्ष तक रहता और ग्यारहवें वर्ष में स्वयं का धन भी लेकर चला जाता हैं।
धन
ममत्व भाव से दुःख- सेठजी की वेश कीमती घड़ी नौकर के हाथ से फूट गयी, सेठ ने बहुत डाँटा, रात में नींद भी नहीं आयी और न ही भूख लगी, किन्तु नौकर भोजन करके निश्चिन्त सोया, दूसरे दिन सेठ ने नौकर से कहा कोई बात नहीं, फूट जाने दो, दुःख इस बात का है वह घड़ी तुम्हे देना थी, अब रात में सेठ चैन से सोया और नौकर को न तो भूख लगी और नींद भी नहीं आई, वास्तव में ममत्व भाव ही दुःख का कारण है।
अनासक्ति
अपनेपन से दुःख- सेठजी ने बहुत बढ़िया मकान शहर के बीच में बनाया, अचानक आग लग गयी, धूँ-धूँ कर मकान जल रहा था, सेठ सीना पीट-पीट कर रो रहा था, कि इतने में बड़ा लड़का आया और बोला! पिताजी क्यों रो रहे हो? यह मकान कल बिक गया था बयाना हो गया है, अब भी मकान जल रहा था, पर अब सेठ दर्शक के समान देख रहा था, छोटा लड़का आया और बोला पिताजी! खड़े-खड़े क्या देख रहे हो, आग बुझाओ पिताजी ने कहा, चिन्ता नहीं करो मकान बिक गया है, बेटा बोला सौदा केंसल हो गया है अब सेठ का पुनः रोना-धोना चालू हो गया, वास्तव में अपना पन ही दुःख का कारण है।
अनासक्ति