Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 267

उत्तम त्यागधर्म- त्याग से बुझाओ राग की आग।

24 सूत्र

त्याग अपने को रिक्त नहीं पूर्ण करने के लिए होता है।
दान
किसान जब बीज त्यागता है तब फल की प्राप्ति होती है, इसी प्रकार कुंआ पानी देता है तो और आता है, वृक्ष पुराने पत्ते त्यागता है तो नये पत्ते आ जाते हैं, गाय दूध त्यागती है तो स्वस्थता महसूस करती है एवं पुनः दूध आ जाता है। इसी प्रकार त्याग से आत्म वैभव प्राप्त होता है।
दान
दवा दो प्रकार की होती है पहली ऊपर से लेप करने वाली और दूसरी पीने वाली, दान लेप की तरह होता है, त्याग पीने वाली औषधि की तरह होता है।
दान
दान वृक्ष की पत्ति तोड़ने के समान है, त्याग वृक्ष को जड़ से उखाड़ने के समान है। राग की नहीं त्याग की पूजा होती है। आहार लेते समय साधु के भी हाथ नीचे होते हैं, श्रावक का ऊँचा होता है, दानी स्वर्ग पाता, त्यागी मोक्ष पाता है।
दान
दान प्रशंसनीय है त्याग पूज्यनीय है, स्वयं की भलाई के लिये रसादि का त्याग और परोपकार के लिये रसादि का दान होता है, दानी गद्दी पर, त्यागी सिंहासन पर बैठता है।
दान
त्याग निश्चय धर्म है, दान व्यवहार धर्म है तथा त्याग धर्म है, दान पुण्य है, बुरी व अच्छी दोनों वस्तुओं का त्याग होता है, दान अच्छी वस्तु का होता है, दान में परोपकार, त्याग में स्वोपकार होता है।
दान
मेघ जल त्यागते हैं इसलिये ऊपर हैं, समुद्र ग्रहण करता है इसलिये नीचे होता हैं, मेघ जल ग्रहण करते हैं तो काले हो जाते हैं, त्यागने के बाद सफेद हो जाते हैं, मेघ जल त्यागता है इसलिए उसका जल मीठा है, समुद्र ग्रहण करता रहता हैं, इसलिए उसका जल खारा है।
दान
जिनालय के लिए, जिन बिम्ब के लिए, पूजा विधान के लिए, जीर्णोद्धार के लिए और शास्त्रों के प्रकाशन के लिए कल्याणार्थ धन देना चाहिए।
दान
दान के सात क्षेत्र हैं, 1.चतुर्विधसङ्घ, 2.मन्दिर, 3.प्रतिमा, 4.जीर्णोद्धार, 5.रथयात्रा, 6.तीर्थयात्रा, 7.शास्त्र प्रकाशन।
दान
जो चैत्यालय, चैत्य, दान, प्रतिष्ठादि महोत्सव और समीचीन यात्रा के करने में तत्पर हैं, नाना शास्त्रों के ज्ञाता हैं, परीषह सहन करते हैं, दूसरों के कार्य में रत हैं, परिग्रह रहित हैं और तपस्वी भी हैं, ऐसे बहुत मनुष्य हैं परन्तु जो राग-द्वेष-मोह के त्याग में तत्पर हों, आत्मतत्त्व में लीन हों वे तपस्वी दुर्लभ हैं, त्याग तपस्या दूसरे के बल से नहीं आत्म बल से होती है।
अनासक्ति
गृहस्थों को देश, समय, आगम, सम्पत्ति और पात्र के अनुसार दान देना चाहिए।
दान
यदि न्यायोपार्जित थोड़ा भी पदार्थ दिया गया है तो वह कल्याण के लिए होता है, इसके विपरीत अन्यायोपार्जित प्रचुर पदार्थ भी दिया गया हो तो वह निष्फल होता है।
दान
ग्रीष्मकाल में जल, शीतकाल में शीत निवारक पदार्थ, वर्षाकाल में आवास देना चाहिए और भोजन सदा देना चाहिए।
दान
भक्ति पूर्वक दान देने से भोग सहित लक्ष्मी और अनादरपूर्वक दान देने से लक्ष्मी तो प्राप्त होती है पर स्वयं भोग नहीं कर पाता है।
दान
जहाँ कहीं से पात्र को आता हुआ देख कर दाता, ''जिनेन्द्र के समान'' उन्हें पड़गाहन करता है वह प्रतिग्रह कहलाता है।
दान
आदिनाथजी ने अपने बेटे को दान का उपदेश दिया होता एवं फल बताया होता तो तेरह माह क्यों भटकना पड़ता, चार हजार मुनि क्यों भ्रष्ट होते?
दान
झूमर, छत्र, चामर, ध्वजा और दर्पण आदि से जिनमन्दिर को सुशोभित करने वाला मनुष्य आश्चर्यकारी 'लक्ष्मी' को प्राप्त होता है।
दान
स्वयं का पेट भरने से नहीं, दान देने से राजा और रङ्क का भेद जाना जाता है।
दान
जो श्री जिनेन्द्रदेव के मन्दिर में घण्टा दान करते हैं, वे घण्टा आदि से सहित वाहन पर आरूढ़ होकर गमन करते हैं।
दान
जो मनुष्य सुन्दर जिनमन्दिर में चँदोवा देता है, वह पुण्योदय से एकच्छत्र(अखण्ड) विशाल राज्य को प्राप्त होता है।
दान
मुनियों को आवास दान देने से रत्ननिर्मित विस्तृत और चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल आवास प्राप्त होता है।
दान
समाज के कार्यों से अशान्ति का अनुभव होता है।
Misc.
आशा गर्त को भरने का एक ही उपाय 'त्याग' है।
संतोष
दो व्यक्ति स्वर्ग में भी ऊँचा स्थान पाते हैं, पहला वह जो निर्धन होने पर भी दान करता है, दूसरा वह जो समर्थ होने पर भी क्षमा करता है।
दान