Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 260

तपधर्म से लाभ।

8 सूत्र

मोह का शमन होते ही आत्मा की शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं।
धर्म
अग्नि में तपकर मिट्टी मङ्गल कलश नाम पाती है।
पुरुषार्थ
जहाँ पर कषाय और विषय के साथ आहार का त्याग किया जाता है, उसे उपवास जानना चाहिए, शेष को भूखा रहना समझना चाहिए।
आहार
जीव ने अज्ञान पूर्वक जो दुःखदायी कर्म बाँधे हैं, जैसे अग्नि ईंधन को जला देती है, उसी तरह उपवास उन सब पापों को जला देता है।
कर्म
जल से उत्पन्न हुआ कीचड़ जल से ही शुद्ध होता है और मन से उत्पन्न हुआ पाप मन से पश्चाताप करने से ही शुद्ध हो जाता है और शरीर से किया हुआ पाप शरीर से तप करने पर ही शुद्ध होता है।
कर्म
बारह प्रकार के तपों में स्वाध्याय के समान कल्याणकारी तप न है और न होगा।
ज्ञान
दो पथ पन्थी चले न पन्था, दो मुख सुई सिले न कन्था। दोऊ काम नहीं होय सयाने, विषय भोग अरु मोक्ष हु जाने॥
अनासक्ति
चिन्तन से चिन्ता मिटे, मिटे ध्यान से पाप। चिन्तन चिन्ता जब मिटे, प्रभु बनेंगे आप॥
ध्यान