रसपरित्याग- दूध, घी, आदि षट् रस में से कोई रस का त्याग करना साधु और गृहस्थ दोनों रस परित्याग करते हैं। संयम 0 – भेजें
विविक्तशय्यासन- शून्यगृह, एकान्त स्थान, विकलत्रय, स्त्री-असंयमी पुरूषों के आवागमन से रहित वन खण्ड में ध्यान, अध्ययन करना, पाप से भयभीत श्रावक भी गृह धन्धो से विरक्त होकर जिनालय आदि में साधर्मी के साथ तत्त्व चर्चा, जाप, चिन्तन आदि में समय व्यतीत करता है। ध्यान 0 – भेजें
जिन्हें मोक्ष की उत्कृष्ट भावना है वे द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव का विचार कर उग्रकाय क्लेश तप करें। पुरुषार्थ 0 – भेजें
जैसे अपने आय-व्यय का विचार न करने वाला व्यापारी अन्त में पछताता है, उसी तरह जो साधु अपने दोषों का परिमार्जन नहीं करता, वह भी व्यापारी की तरह कष्ट उठाता है। विवेक 0 – भेजें
शिष्य की परीक्षा- एक शिष्य जिससे गुरु को बड़ा लगाव था, एक दिन गुरु की पत्नी ने कहा कि आपको इस शिष्य से कुछ ज्यादा ही लगाव है, बाकी अन्य शिष्यों से इतना लगाव क्यों नहीं रखते, तब गुरु ने अपनी पत्नी को बताने के लिए शिष्य की परीक्षा की और एक आम को पैर में बाँधकर फोड़ा जैसा बनाया और सब शिष्यों से कहा की यह फोड़ा चूसने पर ही ठीक होगा, ऐसा वैद्य ने कहा है, यह सुनकर बहाना बनाकर सभी शिष्य चले गये, तब वही शिष्य आया और गुरु के फोड़े को चूसने लगा, तब गुरु की पत्नी उस शिष्य को देखकर हैरान हो गयी, वह आम था, यह जानकार सारे शिष्य को बड़ी शर्मिन्दगी हुई और शिष्य की परीक्षा हो गयी कि वास्तव में उसके पास श्रद्धा, भक्ति, विनय, सेवा भाव एवं कृतज्ञता थी। भक्ति 0 – भेजें