Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 256

द्वादश विध तप- भावों से किया कब।

17 सूत्र

तप का अर्थ है तपना, कर्मों का क्षय करने के लिये जो तप किया जाता है वह तप धर्म है।
धर्म
उदर में भोजन विना जठराग्नि के नहीं पचता है। रोटी विना तवा तपे नहीं बनती है। मौसम तपे विना वर्षा ऋतु नहीं आती है। वृक्ष विना धूप के तपे फलता नहीं है। दूध तपे विना मावा बनता नही है। पेट्रोल वाष्प बने विनागाड़ी नहीं चलती है। सोलह ताप विना स्वर्ण शुद्ध नहीं होता है। उसी प्रकार तपे विना आत्मा शुद्ध नहीं होती है।
धर्म
संयम की सिद्धि, राग का अभाव, कर्मों का नाश, ध्यान और आगम की प्राप्ति के लिए तप धारण किया जाता है।
धर्म
जैसे वात-पित्त आदि का प्रकोप न हो, रोग की वृद्धि न हो, शरीर रत्नत्रय का सहकारी बना रहे, अपना संहनन बल वीर्य देख, देश काल आहार की योग्यता देख, तप में उत्साह देख परिणामों की उज्ज्वलता बढ़ती जाय वैसा तप करना चाहिए, इच्छा निरोध कर विषयों में रागघटाना तप है।
स्वास्थ्य
दो तरह के मार्ग- एक साधनों का मार्ग और एक साधना का मार्ग, साधनों का मार्ग सुख-सुविधा का एवं साधना का मार्ग स्वाधीन तपश्चर्या का मार्ग है, अतः भारतीय संस्कृति ने धर्म के लिए साधन सम्पन्न नहीं, साधना सम्पन्न निरूपित किया है, यहाँ भोग को नहीं योग को, राग को नहीं त्याग को स्थान मिला है, सारा संसार विषयासक्त है, यहाँ विषय विरक्ति और आत्मानुरक्ति बड़ी दुर्लभ है, पर शुद्धि और सिद्धि का मार्ग एक तपश्चरण ही है, बुद्ध और महावीर की चिन्तन धारा का फर्क यही है कि बुद्ध ने कहा कि मन में उठे विकल्पों की पूर्ति करके मन को विश्राम भी देना चाहिए, इसलिए उन्होंने न अति भोग न अति त्याग, उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया, किन्तु भगवान् महावीर ने कहा, कि तृप्ति इच्छा की पूर्ति में नहीं त्याग में है। आत्मशान्ति के लिए त्याग और तप के मार्ग को अपनाना चाहिए। एक विचारक ने तो यहाँ तक लिखा कि जो लोग बीमार होने तक खूब खाते हैं, उन्हे ठीक होने तक उपवास और लङ्घन करने पढ़ते हैं, इन सभी विचार धाराओं में मन की कामनाओं पर नियन्त्रण बहुत जरूरी है, साकाङ्क्ष साधना खोखली मानी जाती है, सम्यक् तप आत्म शोधन में परम रसायन माना जाता है।
धर्म
अनशन-आहार त्याग का नाम उपवास नहीं किन्तु आहार सम्बन्धी आशा का त्याग उपवास है।
आहार
भूख से मरने वालों की संख्या कम और खाकर मरने वालों की संख्या ज्यादा है।
स्वास्थ्य
उपवास के विना मनुष्य काम का मर्दन करने में समर्थ नहीं हो सकता है, क्योंकि सिंहों के द्वारा ही मदोन्मत्त हाथी विदीर्ण किये जाते हैं।
संयम
तीन प्रकार के भूखे- एक व्यक्ति की प्रतिज्ञा है, कि पूजा के विना भोजन नहीं करूँगा, वह पूजा में लीन है। एक व्यक्ति साधन सम्पन्न है, किन्तु रोगी है खा नहीं सकता। एक व्यक्ति इतना गरीब है कि उसके पास खाने को नहीं है, तीनों में अन्तर है।
आहार
नाश्ता नहीं किया तो कमजोरी लगी, उपवास किया तब कुछ नहीं हुआ, क्योंकि मन ने उपवास करना स्वीकार कर लिया था।
मन
उपवास तीव्र व जीर्ण रोगों में प्रभाव शाली प्रक्रिया है, ऐसी दशा में जल उपवास प्रशंसनीय है।
स्वास्थ्य
उत्तम परिणाम की प्राप्ति हेतु दस जल उपवास रोग मुक्ति हेतु त्रैलोक्य चिन्तामणि है।
स्वास्थ्य
उपवास के दिन जल ले लेने से उपवास का आठवा हिस्सा कम लाभ होता है।
आहार
अवमौदर्य- अवमौदर्य से भोजन की गृद्धता का अभाव, वात, पित, कफ का शमन, रोग का शमन, निद्रा विजय, स्वाध्याय, सामयिक एवं ध्यान में खेद नहीं होता गर्मी-सर्दी की बाधा नहीं होती है।
आहार
वृतिपरिसंख्यान- वृतिपरिसंख्यान में गृहस्थ भी प्रतिज्ञा लेता है कि जिनधर्म पाया है, अतः दर्शन, ज्ञान, चरित्र नष्ट न हो जाय, इसलिए जिसमें पाप अधिक हों ऐसे व्यापार नहीं करता है, भोगोपभोग का परिमाण करता है, माँगकर नहीं खाऊँगा यह प्रतिज्ञा करता है, कोई कहेगा तो भोजन करूँगा इत्यादि प्रतिज्ञा करता है।
संयम
धर्मसागरजी ने सागर में भुट्टा से कोई पड़गाहे तो आहार लेंगे ऐसी विधि ली थी, 4 दिन बाद विधि मिली।
धर्म
आचार्य शान्तिसागर जी घड़ी पहने हुए लोगों से आहार नहीं लेते थे, लेकिन सन् 1928 में कटनी चतुर्मास के दौरान नियम लिया कि जो हाथ में घड़ी लेकर पड़गाहन करेगा तब आहार लेंगे, आचार्य श्री पण्डित जगन्मोहनलाल जी के सामने से निकल गये थे, पण्डितजी ने सोचा कि अब पड़गाहन नहीं मिलेगा इसलिए उतारी हुई घडी पुनः हाथ में ले ली, आचार्य श्री लौट कर आये और घड़ी देखकर पड़गाहन हो गया, एक बार नियम लिया कि बैल के सींग में गुड़...
संयम