Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 206

माया का कुफल त्रियाचरित्र।

10 सूत्र

मगध देश के राजगृह नगर में राजा सङ्ग्रामशूर राज्य करते थे, उनकी रानी का नाम कनकमाला था, उसी नगर में सेठ वृषभदास रहता था, जो महान सम्यग्दृष्टि था, पञ्चगुणों से सहित था, परम धार्मिक था और सम्पूर्ण लक्षणों से सहित था, जैसा कि कहा है- 'पात्रे त्यागी गुणे रागी, भोगे परिजनैः सह। शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा, पुरुषः पञ्च लक्षणः।।'
चरित्र
जो योग्य पात्र में त्याग करने वाला हो, 2.गुणों में राग करने वाला हो, 3.भोग में परिजनों के साथ रहता हो, 4.शास्त्रों का ज्ञाता हो और 5.युद्ध में योद्धा हो वही पाँच गुणों को धारण करने वाला पुरुष कहलाता है। उस सेठ की स्त्री का नाम जिनदत्ता था, वह जिनदत्ता भी परम धार्मिक, सम्यक्त्वादि गुणों से सहित, दक्षता आदि गुणों के समूह से मूर्तिमान, लक्ष्मी के समान तथा समस्त लक्षणों से युक्त थी, जैसा कि कहा है- '1.जो आज्ञा कारिणी हो, 2.सन्तुष्ट हो, 3.दक्ष हो, 4.साध्वी हो, 5.पतिव्रता हो तथा 6.विदुषी हो इन गुणों से युक्त स्त्री लक्ष्मी ही है इसमें संशय नहीं है।' जिनदत्ता यद्यपि इस प्रकार के गुणों से विशिष्ट थी, परन्तु बन्ध्यात्व नामक दोष से युक्त थी, किसी भी उपाय से उसको पुत्र नहीं हुआ था, एक दिन अवसर पाकर उसने अपने पति से कहा! पुत्र के विना कुल सुशोभित नहीं होता है, तथा वंश का विच्छेद भी हो जायगा, इसलिए सन्तान की वृद्धि के लिए आप दूसरा विवाह करने योग्य हैं, जैसा कि कहा है- 'जवानी, लावण्य, प्रेम, आभूषण इत्यादि सभी सुपुत्र के विना भूसा के सामान है।'
परिवार
1.हाथी की शोभा मदजल से है, 2.पानी की शोभा कमलों से, 3.रात्रि की शोभा पूर्ण चन्द्रमा से, 4.वाणी की शोभा व्याकरण से, 5.नदी की शोभा हँस युगल से, 6.सभा की शोभा विद्वानों से, 7.स्त्री की शोभा ब्रह्मचर्य से, 8.घोड़े की शोभा वेग से, 9.मन्दिर की शोभा नित्य होने वाले उत्सवों से, 10.कुल की शोभा सुपुत्र से, 11.पृथ्वी की शोभा राजा से और 12.तीनों लोकों की शोभा धर्मात्माओं से होती है।
चरित्र
संसार से थके हुए जीवों के लिए सन्तान, स्त्री और सज्जनों की सङ्गति ये तीन विश्राम की भूमियाँ हैं।
परिवार
1.जन्मदाता, 2.यज्ञोपवीत (दीक्षा प्रदाता) संस्कार करने वाला, 3.विद्या देने वाला, 4.अन्न देने वाला और 5.भय से रक्षा करने वाला ये पाँच पिता माने गये हैं।
परिवार
1.राजपत्नी, 2.गुरु पत्नी, 3.मित्र पत्नी, 4.पत्नी की माता एवं 5.स्वयं की माता ये पाँच मातायें मानी गयीं हैं।
परिवार
संसार में कार्य के लिए कोई किसी की सेवा करता है परमार्थ से कोई किसी का प्रिय नहीं है, दूध का क्षय देखकर बछड़ा स्वयं ही माता को छोड़ देता है।
अनासक्ति
जब तक दान दिया जाता है तभी तक कीर्ति होती है।
दान
1.मित्रद्रोही, 2.कृतघ्नी, 3.स्त्री की हत्या करने वाला और 4.चुगलखोर–'निन्दा' करने वाला इन चारों का प्रायश्चित्त हमने नहीं सुना है।
चरित्र
1.भोग में रोग का भय है, 2.सुख में क्षय का भय है, 3.धन में अग्नि और राजा का भय है, 4.दास में स्वामी का भय है, 5.विजय में शत्रु का भय है, 6.कुल में कुलटा स्त्री का भय है, 7.प्रतिष्ठा में अपयश का भय है, 8.गुणों में दुर्जन का भय है और 9.शरीर में यमराज का भय है, इस प्रकार सभी वस्तुओं में भय है, परन्तु 10.आश्चर्य है कि वैराग्य भय से रहित है।
अनासक्ति