Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 123

अपना बनाने के छह कारण।

11 सूत्र

मोक्षसुख के कारणभूत अहिंसा धर्म में एवं सभी साधर्मियों में निरन्तर वात्सल्य भाव रखना चाहिये।
संगति
घर पर आए हुए शत्रु का भी सम्मान करना चाहिये, जिस प्रकार काटने के लिए आए हुए शत्रु को भी वृक्ष छाया देता है।
चरित्र
न कोई किसी का मित्र है, न कोई किसी का शत्रु है व्यवहार से ही मित्र और शत्रु बनते हैं।
संगति
उत्सव में, कष्ट में, अकाल पड़ने पर, राष्ट्र में विप्लव होने पर, श्मशान में और राजदरबार में जो साथ देता है वही बन्धु कहलाता है।
संगति
अपना बनाने के छ: कारण- मिलने पर मुस्कुराना, आदर करना, नाम याद रखना, सच्चे हृदय से बात करना, गुणों की प्रशंसा करना, भेजने जाना आदि।
संगति
प्रेम की शक्ति दण्ड की शक्ति से हजार गुणी प्रभावशाली और स्थायी होती है।
संगति
छेड़ के तो देखे कोई इस दिलेर को, प्रेम-मोहब्बत मे तो कुत्ते भी काट लेते हैं शेर को।
संगति
जो वजन होता है प्यार का, वह वजन नहीं होता है व्यापार का।
संगति
सम्बन्ध बनाए रखने के लिए व साधना में आगे बढ़ने के लिए कष्टों को सहना अनिवार्य है।
पुरुषार्थ
जिसका जो धन अथवा शरीर साधर्मी जनों के उपयोग में आता है यथार्थ में वही उसका धन है, जो समर्थ होकर भी आपत्ति के समय सम्यग्दृष्टि की उपेक्षा करता है, उस कठोर हृदय की जिन शासन में क्या भक्ति हो सकती है?
दान
वैय्यावृत्ति- प्रतिकार करने में समर्थ होकर भी रोग से दुःखी सम्यग्दृष्टि की जो उपेक्षा करता है, वह पापी सम्यग्दर्शन का घाती है। जो सम्यग्दृष्टि साधर्मी की भक्ति नहीं करता, वह झूठ-मूठ का विनयी बना फिरता है।
दान