Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 102

पाँच लब्धि।

6 सूत्र

जिनेन्द्र भगवान में, चतुर्विध सङ्घ में, शास्त्र में, साधु में, पञ्चकल्याणक आदि महोत्सवों में निश्छल भक्ति होना भव्य के मोक्ष की सिद्धि कराने वाली भक्ति कहलाती है।
भक्ति
मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका की आहार-औषधि आदि के द्वारा प्रशंसनीय सेवा करना दिव्य वात्सल्य कहलाता है।
दान
कर्म के उदय से अनेक भवों में दुःख भोगने वाले जीवों के प्रति दया होना अनुकम्पा कहलाती है।
अहिंसा
अशुभ कर्मों का अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणा हीन होना क्षयोपक्षम लब्धि है। उत्तरोत्तर भावों की विशुद्धि होना विशुद्धिलब्धि है। सद्गुरुओं का उपदेश प्राप्त होना देशनालब्धि है। समस्त पाप कर्मों के उत्कृष्ट स्थिति और उत्कृष्ट अनुभाग का घात करके अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण स्थिति में और द्विस्थानीय (लता/दारू) अनुभाग में करना प्रायोग्यलब्धि है, अथवा आयुकर्म के अलावा सात कर्मों की स्थिति को अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर कर देना, घातिया के अनुभाग को लता/दारू रूप अघाति के पाप प्रकृति के अनुभाग को नीम/काँजीर रूप करने को प्रायोग्यलब्धि कहते हैं। अधःकरण, अपूर्वकरण, और अनिवृत्तिकरण रूप परिणामों का प्राप्त होना करणलब्धि है प्रारम्भ की चार लब्धियाँ भव्य व अभव्य दोनों को सामान्य से हो सकती हैं, किन्तु करणलब्धि केवल भव्य को ही होती है।
कर्म
छठवें-सातवें गुणस्थानवर्ती की तरह पूर्ण परिग्रह का त्यागी न होने पर भी चौथे-पाँचवे गुणस्थानवर्ती सल्लेखना करने का अधिकारी है।
समाधि
आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा का चिन्तन होने पर रस विरस हो जाते हैं, गोष्ठी-कथा आदि का कौतूहल विघटित हो जाता है, पञ्चेन्द्रियों के विषयों की प्रीति घट जाती है, शरीर सम्बन्धी प्रीति भी विश्राम ले लेती है निरन्तर चलने वाली वाणी भी मौन ले लेती है और मन भी दोषों के साथ मृत्यु को प्राप्त करने की इच्छा करता है अर्थात् मन में उठने वाले विविध विकल्प शान्त हो जाते हैं।
ध्यान