Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 73

पाणिग्रहण हो प्राण ग्रहण ना

81 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

जो व्यक्ति मूर्खता से अपनी प्रकृति के प्रतिकूल एवं जठराग्नि से ज्यादा ठूस-ठूस कर खाता है उसे अनगिनत रोग घेरे ही रहते हैं।
स्वास्थ्य
सास को बहू की जवानी और बहू को सास का बुढ़ापा नहीं दिखता इसलिए विवाद होता है।
परिवार
संसार में किसी मनुष्य के तो स्त्री नहीं है, किसी के यदि है तो पुत्र नहीं है, किसी के पुत्र है तो शरीर रोगी है, यदि किसी के शरीर निरोग भी है तो धन धान्य नहीं है, यदि धन-धान्य भी है तो किसी की स्त्री दुराचारिणी है, किसी का पति जुआ आदि दुर्व्यसनों में रत है, किसी के दुर्योधन के समान कलह करने वाले भाई हैं, किसी की पुत्री दुराचारिणी है, किसी के पति का जवानी में शीघ्र ही मरण हो जाता है, अतः कह सकते हैं कि संसार में कोई भी व्यक्ति पूर्ण सुखी नहीं है।
परिवार
एक माँ अपने बेटे को मनुष्य बनाने में २० साल लगा देती हैं, लेकिन उसी बेटे को मूर्ख बनाने के लिए पत्नी को २० मिनट भी नहीं लगते हैं।
परिवार
भागकर माँ-बाप की मर्जी के बिना शादी करने वालों के दिल से भगवान् भी भाग जाते हैं, जिससे उसके भाग्य फूट जाते हैं क्योंकि जिसने जन्म देने वाले अपने माँ-बाप की बात नहीं मानी उसकी फिर परमात्मा भी बात नहीं मानता है।
परिवार
कन्या का पैदा होते ही मर जाना उत्तम है परन्तु उसका नीच कुल वाले वर के साथ विवाह करना अच्छा नहीं है।
परिवार
गृह के कार्यों में लगाए रखना, सीमित धन देना, अधिक स्वछन्द न होने देना, नीति व सदाचार की शिक्षा देते रहना और बड़ी वृद्ध स्त्रियों के मध्य रोके रहना अर्थात् अन्यत्र न जाने देना आदि ये सब कुल वधुओं की सुरक्षा के उपाय हैं।
परिवार
आप घर में बहु लाना बहुरानी नहीं क्योंकि यदि बहु आयेगी तो घर को स्वर्ग बनाएगी और यदि बहुरानी आएगी तो सासू को नौकरानी और ससुर को स्वर्गीय बनाएगी।
परिवार
यदि लड़का कहना न माने तो परेशान मत होना बस उससे अपनापन छोड़ देना, सब चिन्ताएँ खत्म हो जायेंगी जैसे शरीर में जूँ पैदा हो जाती है तो उसे आप अपना नहीं मानते, इसी प्रकार बेटा पैदा हो गया है क्योंकि जो कहना न माने वह अपना कैसा?
परिवार
नारी की उन्नति और अवनति पर ही राष्ट्र की उन्नति और अवनति निर्भर है।
परिवार
जिस व्यक्ति के घर में सुशील, सुन्दर, स्वस्थ, शिक्षित स्त्री होती है वह घर निश्चित ही सौधर्म इन्द्र के भवन से ज्यादा सुखकर माना जाता है।
परिवार
वही स्त्री उत्तम सहधर्मिणी है, जिसमें सुपत्नीत्व के सब गुण विद्यमान हो और जो अपने पति की सामर्थ्य से अधिक व्यय नहीं करती है।
परिवार
विवाहित होना 'पार्ट ऑफ लाइफ' है और विवाहित होकर भी मुस्कुराकर शान्ति से जीना 'आर्ट आफ लाइफ' हैं।
परिवार
शादी वो जख्म है जिसमें चोट से पहले हल्दी लगाई जाती है।
परिवार
लाइफ को सुखी रखने के लिए वाइफ को सुखी रखें।
परिवार
अच्छी स्त्री से विवाह जीवन रूपी तूफान में बन्दरगाह के समान है और बुरी स्त्री से विवाह बन्दरगाह में तूफान के समान हैं।
परिवार
अपनी स्त्री की प्रयत्नपूर्वक रक्षा करते हुए मनुष्य अपनी सन्तान, चरित्र, कुल, स्वयं को और धर्म को सुरक्षित कर लेता है।
परिवार
नारी विवाह के दिन ही रोती है और पुरुष विवाह के बाद जीवन भर रोता है।
परिवार
जो स्त्री लोकमान्य और विद्वान् पुत्र को जन्म देती है, स्वर्गलोक के देवता भी उसकी स्तुति करते हैं।
परिवार
सोलह वर्ष की होने पर शूकरी जैसी स्त्री भी अप्सरा जैसी लगने लगती है।
परिवार
जिस घर में पति-पत्नी में झगड़ा नहीं होता वहाँ लक्ष्मी निवास करती है।
परिवार
घर बनाने वालों के लिए मेरा यह सूत्र है कि स्वामी से घर की शोभा हो, घर से स्वामी की नहीं।
परिवार
बालक अथवा कामिनी स्त्री के किसी कारण से मन में कुपित होने पर उनको मोदकादि भोज्य पदार्थ और अलंकारादि के देने से उनका शरीर प्रफुल्लित रोमांचित हो जाता है और अनेक इष्ट क्रियाओं को करते हुए वे अपने स्वामी के बारे में मधुर भाषण करती हैं।
परिवार
शादी होते ही बेटों की बुद्धि बिगड़ जाती है इसलिए भविष्य के बारे में सोचकर बुढ़ापे के लिए थोड़ा धन बचाकर रखिए।
परिवार
मनुष्य को गुलाम बनाने वाला प्रबल नशा है–काम।
ब्रह्मचर्य
परिग्रह, परिचय और परिणय से ही मोक्ष में बाधा है।
अनासक्ति
जो अपने भुजबल से कमाकर अपनी पत्नी को नहीं पाल सकते वे विवाह करने का विचार त्याग दें क्योंकि ससुराल की दौलत पर नजरें रखने वाले विवाह के योग्य नहीं होते हैं।
परिवार
आत्मनिर्भर होने से पहले शादी मत कीजिए, वरना पछताना पड़ेगा।
परिवार
बलात्कार पूर्वक (जबरदस्ती) कन्या का अपहरण करना 'राक्षस विवाह' है।
परिवार
वर के लिए योग्य पदार्थ देकर कन्या देना 'आर्ष विवाह' है।
परिवार
अपनी कमाई का भरोसा रखो, औलाद का नहीं।
परिवार
सहनशीलता और संयम ही गृहस्थ जीवन की गाड़ी के पहिए हैं।
परिवार
सफलता की सड़क पर चलने के लिए अपनी अर्द्धांगिनी का सहयोग लीजिए उसका कंधा आपके कंधे को मजबूत करेगा।
परिवार
सास-ससुर के चेहरे में माता-पिता का चेहरा देखिये वे माता-पिता बन जायेंगे।
परिवार
वही सबसे सुखी है, चाहे वह राजा हो या किसान, जो अपने घर में शान्ति पाता है।
परिवार
स्त्री में भला-बुरा दोनों करने की अटूट शक्ति है।
परिवार
स्त्री पुरुष की गुलाम नहीं–सहधर्मिणी, अर्द्धांगिनी और मित्र है।
परिवार
हर पुरुष की तरक्की के पीछे किसी स्त्री का हाथ अवश्य होता है।
परिवार
सच्ची पत्नी पति पर अंकुश नहीं लगाती और पति को अपने हाथों की कठपुतली नहीं बनाती है।
परिवार
यौवनावस्था में नारी गृहदेवी, प्रौढ़ावस्था में सच्ची मित्र, वृद्धावस्था में परिचारिका होती है।
परिवार
नारी प्रेम, त्याग, सेवा और उत्सर्ग भावना द्वारा ही पुरुष पर शासन करती है।
परिवार
नारी की आँखों में कानून से भी अधिक शक्ति होती है और किसी भी तर्क से अधिक प्रभावशाली उसके आँसू होते हैं।
परिवार
एक स्त्री हजारों पुरुषों को सन्मार्ग पर ला सकती है।
परिवार
एक धर्मपत्नी अपने पति को परमेश्वर बना देती है, जैसे चेलना ने श्रेणिक को कल्याण मार्ग पर लगा दिया था।
परिवार
जो नारी अपने पति या पुत्रों को सदैव प्रसन्न रखती है, उसके समक्ष संसार की महारानी का वैभव भी तुच्छ है।
परिवार
यह निर्भ्रांत सत्य है कि बालकों की मानसिक शक्तियाँ स्त्री के स्नेह की छाया में जितनी पुष्ट और विकसित हो सकती हैं, उतनी किसी अन्य उपाय से नहीं।
परिवार
पति अगर गिरता हो, तो उसको संभालना स्त्री का काम है।
परिवार
मनुष्य को विवाह न करना श्रेष्ठ है किन्तु विवाहित स्त्री की उपेक्षा करना उचित नहीं है।
परिवार
स्त्री की स्वतंत्रता के स्थान–सन्तान का परिपालन, गृहस्थी के दैनिक कार्यकलाप, शारीरिक श्रृंगार और पति के साथ शयन इन चार कार्यों में ही स्त्रियों को स्वतंत्रता देनी चाहिए, अन्य में नहीं। जैसे–अच्छी तरह स्वादिष्ट भोजन कराया हुआ कुत्ता अपवित्र हड्डियों को चबाना नहीं छोड़ सकता, सैकड़ों शिक्षाओं से समझाया गया बन्दर भी अपनी चंचलता नहीं छोड़ता, गन्ने के रस से सींचा गया नीम का वृक्ष अपना कड़वापन नहीं छोड़ता, सर्प मीठा दूध पीने पर भी अपनी विष प्रकृति नहीं छोड़ता ठीक उसी तरह वेश्याएँ भी धन के लोभ से अपनी व्यभिचार कराने की प्रकृति नहीं छोड़ सकती, स्त्रियाँ अपनी चंचलता नहीं छोड़ सकतीं अतः इनसे सदा दूर रहना चाहिए।
परिवार
जो मनुष्य भूख, प्यास और मलमूत्रादि के वेग को रोककर स्त्री सेवन करता है उससे रोगी संतान उत्पन्न होती है।
ब्रह्मचर्य
अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी, चतुर्दशी आदि पर्व के दिन प्रातः सायंकाल की संधि बेला और चन्द्रग्रहण आदि से दूषित दिन में अपनी विवाहित स्त्री के साथ भी विषय सेवन न करें।
ब्रह्मचर्य
कामासक्त होकर भी रजस्वला से समागम न करें और न ही उसके साथ एक शय्या पर शयन करें क्योंकि रजस्वला से समागम करने वाले पुरुष की प्रज्ञा, तेज, बल, दृष्टि और आयु भी क्षीण हो जाती है किन्तु रजस्वला से दूर रहने वाले की प्रज्ञा, तेज, बल, दृष्टि व आयु बढ़ती है।
ब्रह्मचर्य
स्त्रियों में स्वभाव से ही मायाचारी पायी जाती है।
परिवार
गायक-वादक में तालमेल न हो तो संगीत शोर गुल बन जायेगा उसी प्रकार पति-पत्नि में तालमेल न हो तो गृहस्थी महाभारत बन जायेगी।
परिवार
पुण्य संचय करने वाली स्त्रियों में पति का अति प्रेम रहता है।
परिवार
बाला स्त्री खेलने के समय दिये फल और भोजन से प्रसन्न होती है, जवान स्त्री वस्त्र और आभूषणादि से हर्षित होती है, प्रौढ़ स्त्री रति क्रीड़ा की कुशलता से प्रमुदित होती है और वृद्ध स्त्री मधुर भाषण तथा आदर सत्कार से अनुरक्त होती है।
परिवार
स्त्री संसर्ग संयम रूपी जीवन का विनाशक होने से विष के समान है।
ब्रह्मचर्य
जो स्त्री आज्ञाकारिणी हो, संतुष्ट हो, दक्ष हो, साध्वी हो, पतिव्रता हो तथा विदुषी हो वह श्रेष्ठ लक्ष्मी होती है, इसमें संशय नहीं है।
परिवार
स्त्री रूपी अग्नि के संयोग से पुरुषों का धैर्य, वीर्य के छल से घी के समान द्रवीभूत हो जाता है, पिघल कर बहने लगता है और विवेक पारे के समान कहीं चला जाता है।
ब्रह्मचर्य
संसार में स्त्री अविश्वास की पात्र होती है।
परिवार