Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 73

पाणिग्रहण हो प्राण ग्रहण ना

81 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

जिन्होंने शास्त्र ज्ञान में अपना उपयोग लगाया है, जिनका समय प्रशम, यम, तप और ध्यान में व्यतीत होता है, जिन्होंने सदा के लिए परिग्रह का त्याग किया है, जो निर्मल गुणों के समूह हैं, ऐसे मुनि भी स्त्रियों के स्तन, जघन और मुख के देखने से भग्न हो मोहरूपी सागर में निमग्न होते हुए सुने जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्रियाँ मायाचारी से देवों के गुरु को भी ठग लेती हैं।
परिवार
जब स्त्रियों का लेश मात्र संकल्प भी मन में मदन ज्वर को बढ़ा देता है, तो उनकी निकटता क्या चारित्र रूपी लक्ष्मी से नष्ट भ्रष्ट नहीं करेगी?
ब्रह्मचर्य
याद रखिये जिन्दगी में वह सुखी नहीं हुआ, जिन्हें श्रेष्ठ जीवन साथी मिला, सुखी तो वे हैं जिन्होंने अपने साथी को श्रेष्ठ बना लिया है।
परिवार
कभी सोचा है कि पत्नी को बेगम क्यों कहते हैं? क्योंकि शादी के बाद सारे गम पति के हिस्से में आ जाते हैं अतः पत्नि बे-गम हो जाती है।
परिवार
विवाह को एक पिजँड़े के सदृश कहा जा सकता है, इसके बाहर के पक्षी प्रवेश न कर पाने से परेशान रहते हैं और अंदर के पक्षी बाहर न हो पाने से परेशान रहते हैं।
परिवार
शीघ्रता में विवाह करने पर लोग फुरसत से पश्चाताप करते हैं।
परिवार
देखने की अपेक्षा दूसरे से उसके बारे में सुनकर पत्नी का चुनाव करना चाहिए।
परिवार
जिस घर में पति-पत्नि एक दूसरे के प्रति समभाव नहीं रखते, वहीं दरिद्रता का निवास होता है, वहाँ उन दोनों का जीवन निष्फल होता है।
परिवार
वही भार्या उपयुक्त है जो पवित्र और कार्य कुशल है, पतिव्रता है, पति से प्रेम करने वाली है और सदा सत्य बोलती है।
परिवार
काम से पीड़ित लोग जड़ और चेतन पदार्थों के सम्बन्ध में स्वभावतः विवेक-शून्य हो जाया करते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्री यदि प्रसन्न रहे तो सारा कुल प्रसन्न रहता है और यदि स्त्री दुःखी रहती है तो सब कुछ बुरा लगता है।
परिवार
गृहस्थी के संचय में और स्वार्थ की उपासना में तो सारी दुनिया मरती है।
परिवार
जो पत्नि अपने पति का अपमान करती है, उसे लोक परलोक में कहीं शान्ति नहीं मिल सकती है।
परिवार
जो घर के काम-धन्धे में निपुण है, जो संतानवती है, जो मात्र पति को ही सब कुछ समझती है और जो पतिव्रता है, वही सच्ची भार्या है।
परिवार
जिसकी पत्नी अनुकूल है, उसका स्वर्ग यहीं है और जिसकी पत्नी प्रतिकूल है उसका नरक यहीं है।
परिवार
पति और पत्नी का एक दूसरे पर मृत्यु पर्यन्त पूर्ण विश्वास हो, संक्षेप में यही उनके लिए श्रेष्ठ धर्म है।
परिवार
अनुराग के बिना विवाह का कोई अर्थ नहीं होता है।
परिवार
विवाह एक जुआ के समान है, जिसमें पुरुष को अपनी स्वतंत्रता एवं स्त्री को अपनी प्रसन्नता दाँव पर लगाना पड़ती है।
परिवार
पूर्वजों की कीर्ति की रक्षा, देवपूजन, अतिथि सत्कार, बन्धु बान्धवों की सहायता और आत्मोन्नति ये गृहस्थ के पाँच कर्म हैं।
परिवार
जो लोग अपनी स्त्री के चरणों की अर्चना में ही लगे रहते हैं, वे कभी भी महत्त्व को प्राप्त नहीं कर सकते हैं और जो महान् कार्यों के करने की अभिलाषा रखते हैं, वे ऐसे निकृष्ट प्रेम के पाश में नहीं फँसते हैं।
परिवार